महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१७२-
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
निवातकवचोंका संहार
अर्जुन उवाच
अदृश्यमानास्ते दैत्या योधयन्ति स्म मायया ।
अदृश्येनास्त्रवीर्येण तानप्यहमयोधयम् ॥ १ ॥
अर्जुन बोले— राजन्! इस प्रकार अदृश्य रहकर ही वे दैत्य मायाद्वारा युद्ध करने लगे तथा मैं भी अपने अस्त्रोंकी अदृश्य शक्तिके द्वारा ही उनका सामना करने लगा ॥ १ ॥
गाण्डीवमुक्ता विशिखाः सम्यगस्त्रप्रचोदिताः ।
अच्छिन्दन्नुत्तमाङ्गानि यत्र यत्र स्म तेऽभवन् ॥ २ ॥
मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाण विधिवत् प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंसे प्रेरित हो जहाँ-जहाँ वे दैत्य थे, वहीं जाकर उनके सिर काटने लगे ॥ २ ॥
ततो निवातकवचा वध्यमाना मया युधि ।
संहृत्य मायां सहसा प्राविशन् पुरमात्मनः ॥ ३ ॥
जब मैं इस प्रकार युद्धक्षेत्रमें उनका संहार करने लगा, तब वे निवातकवच दानव अपनी मायाको समेटकर सहसा नगरमें घुस गये ॥ ३ ॥
व्यपयातेषु दैत्येषु प्रादुर्भूते च दर्शने ।
अपश्यं दानवांस्तत्र हतान् शतसहस्रशः ॥ ४ ॥
दैत्योंके भाग जानेसे जब वहाँ सब कुछ स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब मैंने देखा, लाखों दानव वहाँ मरे पड़े थे ॥ ४ ॥
विनिष्पिष्टानि तत्रैषां शस्त्राण्याभरणानि च ।
शतशः स्म प्रदृश्यन्ते गात्राणि कवचानि च ॥ ५ ॥
हयानां नान्तरं ह्यासीत् पदाद् विचलितुं पदम् ।
उत्पत्य सहसा तस्थुरन्तरिक्षगमास्ततः ॥ ६ ॥
उनके अस्त्र-शस्त्र और आभूषण भी पिसकर चूर्ण हो गये थे। दानवोंके शरीरों और कवचोंके सौ-सौ टुकड़े दिखायी देते थे। वहाँ दैत्योंकी इतनी लाशें पड़ी थी कि घोड़ोंके लिये एकके बाद दूसरा पैर रखनेके लिये कोई स्थान नहीं रह गया था। अतः वे अन्तरिक्षचारी अश्व वहाँसे सहसा उछलकर आकाशमें खड़े हो गये ॥ ५-६ ॥
ततो निवातकवचा व्योम संछाद्य केवलम् ।
अदृश्या ह्यत्यवर्तन्त विसृजन्तः शिलोच्चयान् ॥ ७ ॥
तदनन्तर निवातकवचोंने अदृश्यरूपसे ही आक्रमण किया और केवल आकाशको आच्छादित करके पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ७ ॥
अन्तर्भूमिगताश्चान्ये हयानां चरणान्यथ ।
व्यगृह्णन् दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! कुछ भयंकर दानवोंने, जो पृथ्वीके भीतर घुसे हुए थे, मेरे घोड़ोंके पैर तथा रथके पहिये पकड़ लिये ॥ ८ ॥
विनिगृह्य हरीनश्वान् रथं च मम युध्यतः ।
सर्वतो मामविध्यन्त सरथं धरणीधरैः ॥ ९ ॥
इस प्रकार युद्ध करते समय मेरे हरे रंगके घोड़ों तथा रथको पकड़कर उन दानवोंने रथसहित मेरे ऊपर सब ओरसे शिलाखण्डोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥
पर्वतैरुपचीयद्भिः पतमानैस्तथापरैः ।
स देशो यत्र वर्ताम गुहेव समपद्यत ॥ १० ॥
नीचे पर्वतोंके ढेर लग रहे थे और ऊपरसे नयी-नयी चट्टानें पड़ रही थीं। इससे वह प्रदेश जहाँ हमलोग मौजूद थे, एक गुफाके समान बन गया ॥ १० ॥
पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः ।
अगच्छं परमामार्ति मातलिस्तदलक्षयत् ॥ ११ ॥
एक ओर तो मैं शिलाखण्डोंसे आच्छादित हो रहा था, दूसरी ओर मेरे घोड़े पकड़ लिये जानेसे रथकी गति कुण्ठित हो गयी थी। इस विवशताकी दशामें मुझे बड़ी पीड़ा होने लगी, जिसे मातलिने जान लिया ॥ ११ ॥
लक्षयित्वा च मां भीतमिदं वचनमब्रवीत् ।
अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय ॥ १२ ॥
इस प्रकार मुझे भयभीत हुआ देख मातलिने कहा—'अर्जुन! अर्जुन! तुम डरो मत। इस समय वज्रास्त्रका प्रयोग करो' ॥ १२ ॥
ततोऽहं तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरयम् ।
देवराजस्य दयितं भीममस्त्रं नराधिप ॥ १३ ॥
महाराज! मातलिका वह वचन सुनकर मैंने देवराजके परम प्रिय तथा भयंकर अस्त्र वज्रका प्रयोग किया ॥ १३ ॥
अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च ।
अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शान्यायसान् निशितान् शरान् ॥ १४ ॥
अविचल स्थानका आश्रय ले गाण्डीव धनुषको वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित करके मैंने लोहेके तीखे बाण छोड़े, जिनका स्पर्श वज्रके समान कठोर था ॥ १४ ॥
ततो मायाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् ।
ते वज्रचोदिता बाणा वज्रभूताः समाविशन् ॥ १५ ॥
तदनन्तर वज्रास्त्रसे प्रेरित हुए वे वज्रस्वरूप बाण पूर्वोक्त सारी मायाओं तथा निवातकवच दानवोंके भीतर घुस गये ॥ १५ ॥
ते वज्रवेगविहता दानवाः पर्वतोपमाः ।
इतरेतरमाश्लिष्य न्यपतन् पृथिवीतले ॥ १६ ॥
फिर तो वज्रके वेगसे मारे गये वे पर्वताकार दानव एक-दूसरेका आलिंगन करते हुए धराशायी हो गये ॥ १६ ॥
अन्तर्भूमौ च येऽगृह्णन् दानवा रथवाजिनः ।
अनुप्रविश्य तान् बाणाः प्राहिण्वन् यमसादनम् ॥ १७ ॥
पृथ्वीके भीतर घुसकर जिन दानवोंने मेरे रथके घोड़ोंको पकड़ रखा था, उनके शरीरमें भी घुसकर मेरे बाणोंने उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ १७ ॥
हतैर्निवातकवचैर्निरस्तैः पर्वतोपमैः ।
समाच्छाद्यत देशः स विकीर्णैरिव पर्वतः ॥ १८ ॥
वहाँ मरकर गिरे हुए पर्वताकार निवातकवच इधर-उधर बिखरे हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। वहाँका सारा प्रदेश उनकी लाशोंसे पट गया था ॥ १८ ॥
न हयानां क्षतिः काचिन्न रथस्य न मातलेः ।
मम चादृश्यत तदा तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १९ ॥
उस समयके युद्धमें न तो घोड़ोंको कोई हानि पहुँची, न रथका ही कोई सामान टूटा, न मातलिको ही चोट लगी और न मेरे ही शरीरमें कोई आघात दिखायी दिया, यह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ १९ ॥
ततो मां प्रहसन् राजन् मातलिः प्रत्यभाषत ।
नैतदर्जुन देवेषु त्वयि वीर्यं यदीक्ष्यते ॥ २० ॥
तब मातलिने हँसते हुए मुझसे कहा—‘अर्जुन! तुममें जो पराक्रम दिखायी देता है, वह देवताओंमें भी नहीं है’ ॥ २० ॥
हतेष्वसुरसंघेषु दारास्तेषां तु सर्वशः ।
प्राक्रोशन् नगरे तस्मिन् यथा शरदि सारसाः ॥ २१ ॥
उन असुरसमूहोंके मारे जानेपर उनकी सारी स्त्रियाँ उस नगरमें जोर-जोरसे करुण क्रन्दन करने लगीं, मानो शरत्कालमें सारस पक्षी बोल रहे हों ॥ २१ ॥
ततो मातलिना सार्धमहं तत् पुरमभ्ययाम् ।
त्रासयन् रथघोषेण निवातकवचस्त्रियः ॥ २२ ॥
तब मैं मातलिके साथ रथकी घर्घरहाटसे निवातकवचोंकी स्त्रियोंको भयभीत करता हुआ उस दैत्य-नगरमें गया ॥ २२ ॥
तान् दृष्ट्वा दशसाहस्रान् मयूरसदृशान् हयान् ।
रथं च रविसंकाशं प्राद्रवन् गणशः स्त्रियः ॥ २३ ॥
मोरके समान सुन्दर उन दस हजार घोड़ोंको तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य रथको देखते ही झुंड-की-झुंड दानवस्त्रियाँ इधर-उधर भाग चलीं ॥ २३ ॥
ताभिराभरणैः शब्दस्त्रासिताभिः समीरितः ।
शिलानामिव शैलेषु पतन्तीनामभूत् तदा ॥ २४ ॥
उन डरी हुई निशाचरियोंके आभूषणोंके द्वारा उत्पन्न हुआ शब्द पर्वतोंपर पड़ती हुई शिलाओंके समान जान पड़ता था ॥ २४ ॥
वित्रस्ता दैत्यनार्यस्ताः स्वानि वेश्मान्यथाविशन् ।
बहुरत्नविचित्राणि शातकुम्भमयानि च ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् वे भयभीत हुई दैत्यनारियाँ अपने-अपने घरोंमें घुस गयीं। उनके महल सोनेके बने हुए थे और अनेक प्रकारके रत्नोंसे उनकी विचित्र शोभा होती थी ॥ २५ ॥
तदद्भुताकारमहं दृष्ट्वा नगरमुत्तमम् ।
विशिष्टं देवनगरादपृच्छं मातलिं ततः ॥ २६ ॥
वह उत्तम एवं अद्भुत नगर देवपुरीसे भी श्रेष्ठ दिखायी देता था। तब उसे देखकर मैंने मातलिसे पूछा— ॥ २६ ॥
इदमेवंविधं कस्माद् देवा नावासयन्त्युत ।
पुरंदरपुराद्धीदं विशिष्टमिति लक्षये ॥ २७ ॥
‘सारथे! देवतालोग ऐसा नगर क्यों नहीं बसाते हैं? यह नगर तो मुझे इन्द्रपुरीसे भी बढ़कर दिखायी देता है’ ॥ २७ ॥
मातलिरुवाच
आसीदिदं पुरा पार्थ देवराजस्य नः पुरम्
ततो निवातकवचैरितः प्रच्याविताः सुराः ॥ २८ ॥
**मातलि बोले—**पार्थ! पूर्वकालमें यह नगर हमारे देवराजके ही अधिकारमें था। फिर निवातकवचोंने आकर देवताओंको यहाँसे निकाल दिया ॥ २८ ॥
तपस्तप्त्वा महत् तीव्रं प्रसाद्य च पितामहम्
इदं वृतं निवासाय देवेभ्यश्चाभयं युधि ॥ २९ ॥
उन्होंने अत्यन्त तीव्र तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको प्रसन्न किया और उनसे अपने रहनेके लिये यही नगर माँग लिया। साथ ही यह भी माँगा कि ‘हमें युद्धमें देवताओंसे भय न हो’ ॥ २९ ॥
ततः शक्रेण भगवान् स्वयम्भूरिति चोदितः
विधत्तां भगवानन्तमात्मनो हितकाम्यया ॥ ३० ॥
तब इन्द्रने भगवान् ब्रह्माजीसे इस प्रकार निवेदन किया—‘प्रभो! अपने (और हमारे) हितके लिये आप ही इन दानवोंका अन्त कीजिये’ ॥ ३० ॥
तत उक्तो भगवता दिष्टमत्रेति भारत
भवितान्तस्त्वमप्येषां देहेनान्येन शत्रुहन् ॥ ३१ ॥
भरतनन्दन! उनके ऐसा कहनेपर भगवान् ब्रह्माने कहा—'शत्रुदमन देवराज! इसमें दैवका यही विधान है कि तुम्हीं दूसरा शरीर धारण करके इन दानवोंका अन्त कर सकोगे' ॥ ३१ ॥
तत एषां वधार्थाय शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव
न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वया ॥ ३२ ॥
(अर्जुन! तुम्हीं इन्द्रके दूसरे स्वरूप हो।) इन दैत्योंके वधके लिये ही इन्द्रने तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान किये हैं। आज जो ये दानव तुम्हारे हाथों मारे गये हैं, इन्हें देवता नहीं मार सकते थे ॥ ३२ ॥
कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत
एषामन्तकः प्राप्तस्तत् त्वया च कृतं तथा ॥ ३३ ॥
भारत! समयके फेरसे ही तुम इनका विनाश करनेके लिये यहाँ आ पहुँचे हो और तुमने जैसा दैवका विधान था, उसके अनुसार इनका संहार कर डाला है ॥ ३३ ॥
दानवानां विनाशाय अस्त्राणां परमं बलम्
ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ॥ ३४ ॥
पुरुषोत्तम! देवराज इन्द्रने इन दानवोंके विनाशके उद्देश्यसे ही तुम्हें परम उत्तम अस्त्रबलकी प्राप्ति करायी है ॥ ३४ ॥
अर्जुन उवाच
ततः प्रशाम्य नगरं दानवांश्च निहत्य तान्
पुनर्मातलिना सार्धमगच्छं देवसद्म तत् ॥ ३५ ॥
अर्जुन कहते हैं— महाराज! इस प्रकार उन दानवोंका संहार करके नगरमें शान्ति स्थापित करनेके पश्चात् मैं मातलिके साथ पुनः उस देवलोकको लौट आया ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि निवातकवचयुद्धे
द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें निवातकवचयुद्धविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥