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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१६६-

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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना

वैशम्पायन उवाच

ततो रजन्यां व्युष्टायां धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैरवन्दत धनंजयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल उठकर समस्त भाइयोंसहित अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु सर्ववादित्रनिःस्वनः ।
बभूव तुमुलः शब्दस्त्वन्तरिक्षे दिवौकसाम् ॥ २ ॥
इसी समय अन्तरिक्षमें देवताओंके सम्पूर्ण वाद्योंकी तुमुल ध्वनि गूँज उठी ॥ २ ॥

रथनेमिस्वनश्चैव घण्टाशब्दश्च भारत ।
पृथग् व्यालमृगाणां च पक्षिणामिव सर्वशः ॥ ३ ॥
भारत! रथके पहियोंकी घर्घराहट, घण्टानाद तथा सर्प, मृग एवं पक्षियोंके कोलाहल सब ओर पृथक्-पृथक् सुनायी दे रहे थे ॥ ३ ॥

(रवोन्मुखास्ते ददृशुः प्रीयमाणाः कुरूद्वहाः ।
मरुद्भिरन्वितं शक्रमापतन्तं विहायसा ॥)
ते समन्तादनुययुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
विमानैः सूर्यसंकाशैर्देवराजमरिंदमम् ॥ ४ ॥
पाण्डवोंने प्रसन्नतापूर्वक उस ध्वनिकी ओर आँख उठाकर देखा, तो उन्हें देवराज इन्द्र दृष्टिगोचर हुए जो सम्पूर्ण मरुद्गण आदि देवताओंके साथ आकाशमार्गसे आ रहे थे। गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा शत्रुदमन देवराजको चारों ओरसे घेरकर उन्हींके पथका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४ ॥

ततः स हरिभिर्युक्तं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ।
मेघनादिनमारुह्य श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ५ ॥
पार्थानभ्याजगामाथ देवराजः पुरंदरः ।
थोड़ी ही देरमें हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए, मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले, जाम्बूनद नामक सुवर्णसे अलंकृत रथपर आरूढ़ देवराज इन्द्र पाण्डवोंके पास आ पहुँचे। उस समय वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे अत्यन्त उद्भासित हो रहे थे ॥ ५ १/२ ॥

आगत्य च सहस्राक्षो रथादववरोह वै ॥ ६ ॥

तं दृष्ट्वैव महात्मानं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् देवराजमुपागमत् ॥ ७ ॥

निकट आनेपर सहस्रलोचन इन्द्र रथसे उतर गये। उन महामना देवराजको देखते ही भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर उनके पास गये ॥ ६-७ ॥
पूजयामास चैवाथ विधिवद् भूरिदक्षिणः ।
यथार्हममितात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ८ ॥
यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर शास्त्रवर्णित पद्धतिसे अमितबुद्धि इन्द्रका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया ॥ ८ ॥
धनंजयश्च तेजस्वी प्रणिपत्य पुरंदरम् ।
भृत्यवत् प्रणतस्तस्थौ देवराजसमीपतः ॥ ९ ॥
तेजस्वी अर्जुन भी इन्द्रको प्रणाम करके उनके समीप सेवककी भाँति विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ९ ॥
आप्यायत महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
धनंजयमभिप्रेक्ष्य विनीतं स्थितमन्तिके ॥ १० ॥
जटिलं देवराजस्य तपोयुक्तमकल्मषम् ।
हर्षेण महताऽऽविष्टः फाल्गुनस्याथ दर्शनात् ॥ ११ ॥

महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अर्जुनको देवराजके समीप विनीतभावसे स्थित देख बड़े प्रसन्न हुए। अर्जुनके सिरपर जटा बँध गयी थी। वे देवराजके आदेशके अनुसार तपस्यामें लगे रहते थे; अतः सर्वथा निष्पाप हो गये थे। अर्जुनको देखनेसे उन्हें महान् हर्ष हुआ था ।। १०-११ ।।

वभूव परमप्रीतो देवराजं च पूजयन् ।
तं तथादीनमनसं राजानं हर्षसम्प्लुतम् ।। १२ ।।
उवाच वचनं धीमान् देवराजः पुरंदरः ।
त्वमिमां पृथिवीं राजन् प्रशासिष्यसि पाण्डव ।
स्वस्ति प्राप्नुहि कौन्तेय काम्यकं पुनराश्रमम् ।। १३ ।।
अतः देवराजका पूजन करके वे बड़े प्रसन्न हुए। उदारचित्त राजा युधिष्ठिरको इस प्रकार हर्षमें मग्न देखकर परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्रने कहा—पाण्डुनन्दन! तुम इस पृथ्वीका शासन करोगे। कुन्तीकुमार! अब तुम पुनः काम्यक वनके कल्याणकारी आश्रममें चले जाओ ।। १२-१३ ।।

अस्त्राणि लब्धानि च पाण्डवेन
सर्वाणि मत्तः प्रयतेन राजन् ।
कृतप्रियश्चास्मि धनंजयेन
जेतुं न शक्यस्त्रिभिरेष लोकैः ।। १४ ।।
‘राजन्! पाण्डुनन्दन अर्जुनने एकाग्रचित्त होकर मुझसे सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये हैं। साथ ही इन्होंने मेरा बड़ा प्रिय कार्य सम्पन्न किया है। तीनों लोकोंके समस्त प्राणी इन्हें युद्धमें परास्त नहीं कर सकते’ ।। १४ ।।

एवमुक्त्वा सहस्राक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
जगाम त्रिदिवं हृष्टः स्तूयमानो महर्षिभिः ।। १५ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर इन्द्र महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए सानन्द स्वर्गलोकको चले गये ।। १५ ।।

धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम् ।
शक्रेण य इदं विद्वानधीयीत समाहितः ।। १६ ।।
संवत्सरं ब्रह्मचारी नियतः संशितव्रतः ।
स जीवेद्धि निराबाधः स सुखी शरदां शतम् ।। १७ ।।
धनाध्यक्ष कुबेरके घरमें टिके हुए पाण्डवोंका जो इन्द्रके साथ समागम हुआ था, उस प्रसंगको जो विद्वान् एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन पढ़ता है और संयम-नियमसे रहकर कठोर व्रतका आश्रय ले एक वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह सब प्रकारकी बाधाओंसे रहित हो सौ वर्षोंतक सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि इन्द्रागमने
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें इन्द्रागमनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं)