महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१३१-
एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना
श्येन उवाच
धर्मात्मानं त्वाहुरेकं सर्वे राजन् महीक्षितः ।
सर्वधर्मविरुद्धं त्वं कस्मात् कर्म चिकीर्षसि ॥ १ ॥
विहितं भक्षणं राजन् पीड्यमानस्य मे क्षुधा ।
मा रक्षीर्धर्मलोभेन धर्ममुत्सृष्टवानसि ॥ २ ॥
**तब बाजने कहा—**राजन्! समस्त भूपाल केवल आपको ही धर्मात्मा बताते हैं। फिर आप यह सम्पूर्ण धर्मोंसे विरुद्ध कर्म कैसे करना चाहते हैं। महाराज! मैं भूखसे कष्ट पा रहा हूँ और कबूतर मेरा आहार नियत किया गया है। आप धर्मके लोभसे इसकी रक्षा न करें। वास्तवमें इसे आश्रय देकर आपने धर्मका परित्याग ही किया है ।। १-२ ।।
राजोवाच
संत्रस्तरूपस्त्राणार्थी त्वत्तो भीतो महाद्विज ।
मत्सकाशमनुप्राप्तः प्राणगृध्नु॒रयं द्विजः ॥ ३ ॥
एवमभ्यागतस्येह कपोतस्याभयार्थिनः ।
अप्रदाने परं धर्मं कथं श्येन न पश्यसि ॥ ४ ॥
**राजा बोले—**पक्षिराज! यह कबूतर तुमसे डरकर घबराया हुआ है और अपने प्राण बचानेकी इच्छासे मेरे समीप आया है। यह अपनी रक्षा चाहता है। बाज! इस प्रकार अभय चाहनेवाले इस कबूतरको यदि मैं तुमको नहीं सौंप रहा हूँ, यह तो परम धर्म है। इसे तुम कैसे नहीं देख रहे हो? ।। ३-४ ।।
प्रस्पन्दमानः सम्भ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते ।
मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ॥ ५ ॥
यो हि कश्चिद् द्विजान् हन्याद् गां वा लोकस्य मातरम् ।
शरणागतं च त्यजते तुल्यं तेषां हि पातकम् ॥ ६ ॥
बाज! देखो तो यह बेचारा कबूतर किस प्रकार भयसे व्याकुल हो थर-थर काँप रहा है। इसने अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये ही मेरी शरण ली है। ऐसी दशामें इसे त्याग देना बड़ी ही निन्दाकी बात है। जो मनुष्य ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, जो जगन्माता गौका वध करता है तथा जो शरणमें आये हुए को त्याग देता है, इन तीनोंको समान पाप लगता है ।। ५-६ ।।
श्येन उवाच
आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते ।
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः ॥ ७ ॥
बाजने कहा—महाराज! सब प्राणी आहारसे ही उत्पन्न होते हैं, आहारसे ही उनकी वृद्धि होती है और आहारसे ही जीवित रहते हैं ॥ ७ ॥
शक्यते दुस्त्यजेऽप्यर्थे चिररात्राय जीवितुम् ।
न तु भोजनमुत्सृज्य शक्यं वर्तयितुं चिरम् ॥ ८ ॥
जिसको त्यागना बहुत कठिन है, उस अर्थके बिना भी मनुष्य बहुत दिनोंतक जीवित रह सकता है, परंतु भोजन छोड़ देनेपर कोई भी अधिक समयतक जीवन धारण नहीं कर सकता ॥ ८ ॥
भक्ष्याद् वियोजितस्याद्य मम प्राणा विशाम्पते ।
विसृज्य कायमेष्यन्ति पन्थानमकुतोभयम् ॥ ९ ॥
प्रमृते मयि धर्मात्मन् पुत्रदारादि नङ्क्ष्यति ।
रक्षमाणः कपोतं त्वं बहून् प्राणान् न रक्षसि ॥ १० ॥
प्रजानाथ! आज आपने मुझे भोजनसे वंचित कर दिया है, इसलिये मेरे प्राण इस शरीरको छोड़कर अकुतोभय-पथ (मृत्यु)-को प्राप्त हो जायँगे। धर्मात्मन्! इस प्रकार मेरी मृत्यु हो जानेपर मेरे स्त्री-पुत्र आदि भी (असहाय होनेके कारण) नष्ट हो जायँगे। इस तरह आप एक कबूतरकी रक्षा करके बहुत-से प्राणियोंकी रक्षा नहीं कर रहे हैं ॥ ९-१० ॥
धर्मं यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्म तत् ।
अविरोधात् तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥ ११ ॥
सत्यपराक्रमी नरेश! जो धर्म दूसरे धर्मका बाधक हो वह धर्म नहीं, कुधर्म है। जो दूसरे किसी धर्मका विरोध न करके प्रतिष्ठित होता है वही वास्तविक धर्म है ॥
विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम् ।
न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ॥ १२ ॥
परस्परविरुद्ध प्रतीत होनेवाले धर्मोंमें गौरव-लाघवका विचार करके, जिसमें दूसरोंके लिये बाधा न हो उसी धर्मका आचरण करना चाहिये ॥ १२ ॥
गुरुलाघवमादाय धर्माधर्मविनिश्चये ।
यतो भूयांस्ततो राजन् कुरुष्व धर्मनिश्चयम् ॥ १३ ॥
राजन्! धर्म और अधर्मका निर्णय करते समय पुण्य और पापके गौरव-लाघवपर ही दृष्टि रखकर विचार कीजिये तथा जिसमें अधिक पुण्य हो उसीको आचरणमें लाने योग्य धर्म ठहराइये ॥ १३ ॥
राजोवाच
बहुकल्याणसंयुक्तं भाषसे विहगोत्तम ।
सुपर्णः पक्षिराट् किं त्वं धर्मज्ञश्चास्यसंशयम् ॥ १४ ॥
**राजाने कहा—**पक्षिश्रेष्ठ! तुम्हारी बातें अत्यन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त हैं। तुम साक्षात् पक्षिराज गरुड़ तो नहीं हो? इसमें संदेह नहीं कि तुम धर्मके ज्ञाता हो ॥ १४ ॥
तथा हि धर्मसंयुक्तं बहु चित्रं च भाषसे ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचिदिति त्वां लक्षयाम्यहम् ॥ १५ ॥
तुम जो बातें कह रहे हो वे बड़ी ही विचित्र और धर्मसंगत हैं। मुझे लक्षणोंसे ऐसा जान पड़ता है कि ऐसी कोई बात नहीं है जो तुम्हें ज्ञात न हो ॥ १५ ॥
शरणैषिपरित्यागं कथं साध्विति मन्यसे ।
आहारार्थं समारम्भस्तव चायं विहंगम ॥ १६ ॥
तो भी तुम शरणागतके त्यागको कैसे अच्छा मानते हो? यह मेरी समझमें नहीं आता। विहंगम! वास्तवमें तुम्हारा यह उद्योग केवल भोजन प्राप्त करनेके लिये है ॥
शक्यश्चाप्यन्यथा कर्तुमाहारोऽप्यधिकस्त्वया ।
गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा ।
त्वदर्थमद्य क्रियतां यच्चान्यदिह काङ्क्षसि ॥ १७ ॥
परंतु तुम्हारे लिये आहारका प्रबन्ध तो दूसरे प्रकारसे भी किया जा सकता है और वह इस कबूतरकी अपेक्षा अधिक हो सकता है। सूअर, हिरन, भैंसा या कोई उत्तम पशु अथवा अन्य जो कोई भी वस्तु तुम्हें अभीष्ट हो वह तुम्हारे लिये प्रस्तुत की जा सकती है ॥ १७ ॥
श्येन उवाच
न वराहं न चोक्षाणं न मृगान् विविधांस्तथा ।
भक्ष्यामि महाराज किं ममान्येन केनचित् ॥ १८ ॥
**बाज बोला—**महाराज! मैं न सूअर खाऊँगा, न कोई उत्तम पशु और न भाँति-भाँतिके मृगोंका ही आहार करूँगा। दूसरी किसी वस्तुसे भी मुझे क्या लेना है? ॥
यस्तु मे देवविहितो भक्षः क्षत्रियपुङ्गव ।
तमुत्सृज महीपाल कपोतमिममेव मे ॥ १९ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! विधाताने मेरे लिये जो भोजन नियत किया है वह तो यह कबूतर ही है; अतः भूपाल! इसीको मेरे लिये छोड़ दीजिये ॥ १९ ॥
श्येनः कपोतानत्तीति स्थितिरेशा सनातनी ।
मा राजन् सारमज्ञात्वा कदलीस्कन्धमाश्रय ॥ २० ॥
यह सनातन कालसे चला आ रहा है कि बाज कबूतरोंको खाता है। राजन्! धर्मके सारभूत तत्त्वको न जानकर आप केलेके खम्भे (-जैसे सारहीन धर्म) का आश्रय न लीजिये ॥ २० ॥
राजोवाच
राष्ट्रं शिबीनामृद्धं वै ददानि तव खेचर ।
यं वा कामयसे कामं श्येन सर्वं ददानि ते ॥ २१ ॥
राजाने कहा— विहंगम! मैं शिबिदेशका समृद्धिशाली राज्य तुम्हें सौंप दूँगा, और भी जिस वस्तुकी तुम्हें इच्छा होगी वह सब दे सकता हूँ ॥ २१ ॥
विनेमं पक्षिणं श्येन शरणार्थिनमागतम् ।
येनेमं वर्जयेथास्त्वं कर्मणा पक्षिसत्तम ।
तदाचक्ष्व करिष्यामि न हि दास्ये कपोतकम् ॥ २२ ॥
किंतु शरण लेनेकी इच्छासे आये हुए इस पक्षीको नहीं त्याग सकता। पक्षिश्रेष्ठ श्येन! जिस कामके करनेसे तुम इसे छोड़ सको, वह मुझे बताओ; मैं वही करूँगा, किंतु इस कबूतरको तो नहीं दूँगा ॥ २२ ॥
श्येन उवाच
उशीनर कपोते ते यदि स्नेहो नराधिप ।
आत्मनो मांसमुत्कृत्य कपोततुलया धृतम् ॥ २३ ॥
यदा समं कपोतेन तव मांसं नृपोत्तम ।
तदा देयं तु तन्मह्यं सा मे तुष्टिर्भविष्यति ॥ २४ ॥
बाज बोला— महाराज उशीनर! यदि आपका इस कबूतरपर स्नेह है तो इसीके बराबर अपना मांस काटकर तराजूमें रखिये। नृपश्रेष्ठ! जब वह तौलमें इस कबूतरके बराबर हो जाय तब वही मुझे दे दीजियेगा, उससे मेरी तृप्ति हो जायगी ॥ २३-२४ ॥