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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१०६-

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षडधिकशततमोऽध्यायः

राजा सगरका संतानके लिये तपस्या करना और शिवजीके द्वारा वरदान पाना

लोमश उवाच

तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
गच्छध्वं विबुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब लोकपितामह ब्रह्माजीने अपने पास आये हुए सब देवताओंसे कहा—'देवगण! इस समय तुम सब लोग इच्छानुसार अभीष्ट स्थानको चले जाओ ॥ १ ॥

महता कालयोगेन प्रकृतिं यास्यतेऽर्णवः ।
ज्ञातींश्च कारणं कृत्वा महाराजो भगीरथः ॥ २ ॥
पूरयिष्यति तोयौघैः समुद्रं निधिमम्भसाम् ।
‘अब दीर्घकालके पश्चात् समुद्र फिर अपनी स्वाभाविक अवस्थामें आ जायगा। महाराज भगीरथ अपने कुटुम्बी जनों (प्रपितामहों)-के उद्धारका उद्देश्य लेकर जलनिधि समुद्रको पुनः अगाध जलराशिसे भर देंगे' ॥ २ १/२ ॥

पितामहवचः श्रुत्वा सर्वे विबुधसत्तमाः ।
कालयोगं प्रतीक्षन्तो जग्मुश्चापि यथागतम् ॥ ३ ॥
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही चले गये ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं वै ज्ञातयो ब्रह्मन् कारणं चात्र किं मुने ।
कथं समुद्रः पूर्णश्च भगीरथप्रतिश्रयात् ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—'ब्रह्मन्! भगीरथके कुटुम्बीजन समुद्रकी पूर्तिमें निमित्त क्योंकर बने? मुने! उनके निमित्त बननेका कारण क्या है? और भगीरथके आश्रयसे किस प्रकार समुद्रकी पूर्ति हुई? ॥ ४ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ।
कथ्यमानं त्वया विप्र राज्ञां चरितमुत्तमम् ॥ ५ ॥
तपोधन! विप्रवर! मैं यह प्रसंग, जिसमें राजाओंके उत्तम चरित्रका वर्णन है, आपके मुखसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मराज्ञा महात्मना ।
कथयामास माहात्म्यं सगरस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महात्मा धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर विप्रवर लोमशने महात्मा राजा सगरका माहात्म्य बतलाया ।। ६ ।।

लोमश उवाच

इक्ष्वाकूणां कुले जातः सगरो नाम पार्थिवः ।
रूपसत्त्वबलोपेतः स चापुत्रः प्रतापवान् ॥ ७ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! इक्ष्वाकुवंशमें सगर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे रूप, धैर्य और बलसे सम्पन्न तथा बड़े प्रतापी थे, परंतु उनके कोई पुत्र न था ।। ७ ।।

स हैहयान् समुत्साद्य तालजङ्घांश्च भारत ।
वशे च कृत्वा राजन्यान् स्वराज्यमन्वशासत ॥ ८ ॥
भारत! उन्होंने हैहय तथा तालजंघ नामक क्षत्रियोंका संहार करके सब राजाओंको अपने वशमें कर लिया और अपने राज्यका शासन करने लगे ।। ८ ।।

तस्य भार्ये त्वभवतां रूपयौवनदर्पिते ।
वैदर्भी भरतश्रेष्ठ शैब्या च भरतर्षभ ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा सगरके दो पत्नियाँ थीं, वैदर्भी और शैब्या। उन दोनोंको ही अपने रूप और यौवनका बड़ा अभिमान था ।। ९ ।।

स पुत्रकामो नृपतिस्तप्यते स्म महत्तपः ।
पत्नीभ्यां सह राजेन्द्र कैलासं गिरिमाश्रितः ॥ १० ॥
स तप्यमानः सुमहत् तपो योगसमन्वितः ।
आससाद महात्मानं त्र्यक्षं त्रिपुरमर्दनम् ॥ ११ ॥
शंकरं भवमीशानं शूलपाणिं पिनाकिनम् ।
त्र्यम्बकं शिवमुग्रेशं बहुरूपमुमापतिम् ॥ १२ ॥
राजेन्द्र! राजा सगर अपनी दोनों पत्नियोंके साथ कैलास पर्वतपर जाकर पुत्रकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या करने लगे। योगयुक्त होकर महान् तपमें लगे हुए महाराज सगरको त्रिपुरनाशक, त्रिनेत्रधारी, शंकर, भव, ईशान, शूलपाणि, पिनाकी, त्र्यम्बक, उग्रेश, बहुरूप और उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध महात्मा भगवान् शिवका दर्शन हुआ ।। १०—१२ ।।

स तं दृष्ट्वैव वरदं पत्नीभ्यां सहितो नृपः ।
प्रणिपत्य महाबाहुः पुत्रार्थे समयाचत ॥ १३ ॥
तं प्रीतिमान् हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् ।
यस्मिन् वृत्तो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् ॥ १४ ॥

वरदायक भगवान् शिवको देखते ही महाबाहु राजा सगरने दोनों पत्नियोंसहित प्रणाम किया और पुत्रके लिये याचना की। तब भगवान् शिवने प्रसन्न होकर पत्नीसहित नृपश्रेष्ठ सगरसे कहा—‘राजन्! तुमने यहाँ जिस मुहूर्तमें वर माँगा है, उसका परिणाम यह होगा ।। १३-१४ ।।

षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः परमदर्पिताः ।
एकस्यां सम्भविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ।। १५ ।।
ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव ।
एको वंशधरः शूर एकस्यां सम्भविष्यति ।। १६ ।।
‘नरश्रेष्ठ! तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे अत्यन्त अभिमानी साठ हजार शूरवीर पुत्र होंगे, परंतु वे सब-के-सब एक ही साथ नष्ट हो जायँगे। भूपाल! तुम्हारी जो दूसरी पत्नी है, उसके गर्भसे एक ही शूरवीर वंशधर पुत्र उत्पन्न होगा’ ।। १५-१६ ।।
एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत ।
स चापि सगरो राजा जगाम स्वं निवेशनम् ।। १७ ।।
पत्नीभ्यां सहितस्तत्र सोऽतिहृष्टमनास्तदा ।

तस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने ।। १८ ।।
वैदर्भी चैव शैब्या च गर्भिण्यौ सम्बभूवतुः ।
ततः कालेन वैदर्भी गर्भालाबुं व्यजायत ।। १९ ।।
शैब्या च सुषुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् ।
तदालाबुं समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः ।। २० ।।
ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये। राजा सगर भी अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो पत्नियोंसहित अपने निवासस्थानको चले गये। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी वे दोनों कमलनयनी पत्नियाँ वैदर्भी और शैब्या गर्भवती हुईं। फिर समय आनेपर वैदर्भीने अपने गर्भसे एक तूँबी उत्पन्न की और शैब्याने देवताके समान सुन्दर रूपवाले एक पुत्रको जन्म दिया। राजा सगरने उस तूंबीको फेंक देनेका विचार किया ।। १७—२० ।।

अथान्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गम्भीरनिःस्वनाम् ।
राजन् मा साहसं कार्षीः पुत्रान् न त्यक्तुमर्हसि ।। २१ ।।
अलाबुमध्यान्निष्कृष्य बीजं यत्नेन गोप्यताम् ।
सोपस्वेदेषु पात्रेषु घृतपूर्णेषु भागशः ।। २२ ।।
इसी समय आकाशसे एक गम्भीर वाणी सुनायी दी—'राजन्! ऐसा दुःसाहस न करो। अपने इन पुत्रोंका त्याग करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। इस तूँबीमें से एक-एक बीजको निकालकर घीसे भरे हुए गरम घड़ोंमें अलग-अलग रक्खो और यत्नपूर्वक इन सबकी रक्षा करो ।। २१-२२ ।।

ततः पुत्रसहस्राणि षष्टिं प्राप्स्यसि पार्थिव ।
महादेवेन दिष्टं ते पुत्रजन्म नराधिप ।
अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ।। २३ ।।
'पृथ्वीपते! ऐसा करनेसे तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। नरश्रेष्ठ! महादेवजीने तुम्हारे लिये इसी क्रमसे पुत्रजन्म होनेका निर्देश किया है; अतः तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सगरसंततिकथने
षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसङ्गमें सगरसंततिवर्णनविषयक एक सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।