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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण

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पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण

मार्कण्डेय उवाच

शिवा भार्या त्वङ्गिरसः शीलरूपगुणान्विता ।
तस्याः सा प्रथमं रूपं कृत्वा देवी जनाधिप ॥ १ ॥
जगाम पावकाभ्याशं तं चोवाच वराङ्गना ।
मामग्ने कामसंतप्तां त्वं कामयितुमर्हसि ॥ २ ॥
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय ।
अहमङ्गिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन ।
शिष्टाभिः प्रहिता प्राप्ता मन्त्रयित्वा विनिश्चयम् ॥ ३ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सद्गुणोंसे सम्पन्न थी। सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली—'अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ। मेरा नाम शिवा है। दूसरी ऋषि-पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है' ॥ १—३ ॥

अग्निरुवाच

कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितराः कथम् ।
यास्त्वया कीर्तिताः सर्वाः सप्तर्षीणां प्रियाः स्त्रियः ॥ ४ ॥

**अग्निने पूछा—**देवि! तुम तथा दूसरी सप्तर्षियोंकी सभी प्यारी स्त्रियाँ, जिनके विषयमें अभी तुमने चर्चा की है, कैसे जानती हैं कि मैं तुमलोगोंके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ ॥ ४ ॥

शिवोवाच

अस्माकं त्वं प्रियो नित्यं बिभीमस्तु वयं तव ।
त्वच्चित्तमिङ्गितैर्ज्ञात्वा प्रेषितास्मि तवान्तिकम् ॥ ५ ॥
मैथुनायेह सम्प्राप्ता कामं प्राप्तं द्रुतं चर ।
जामयो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन ॥ ६ ॥

शिवा बोली—अग्निदेव! तुम हमें सदा ही प्रिय रहे हो; परंतु हमलोग तुमसे सदा डरती आ रही हैं। इन दिनों तुम्हारी चेष्टाओंसे मनकी बात जानकर मेरी सखियोंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मैं समागमकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। तुम स्वतः प्राप्त हुए काम-सुखका शीघ्र उपभोग करो। हुताशन! वे भगिनीस्वरूपा सखियाँ मेरी राह देख रही हैं, अतः मैं शीघ्र चली जाऊँगी ।। ५-६ ।।

मार्कण्डेय उवाच

ततोऽग्निरुपयेमे तां शिवां प्रीतिमुदायुतः ।
प्रीत्या देवी समायुक्ता शुक्रं जग्राह पाणिना ।। ७ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तब अग्निदेवने प्रेम और प्रसन्नताके साथ उस शिवाको हृदयसे लगाया। (शिवाके रूपमें) 'स्वाहा' देवीने प्रेमपूर्वक अग्निदेवसे समागम करके उनके वीर्यको हाथमें ले लिया ।। ७ ।।

अचिन्तयन्ममेदं ये रूपं द्रक्ष्यन्ति कानने ।
ते ब्राह्मणीनामनृतं दोषं वक्ष्यन्ति पावक ।। ८ ।।
तत्पश्चात् उसने कुछ सोचकर कहा—'अग्निकुलनन्दन!' जो लोग वनमें मेरे इस रूपको देखेंगे वे ब्राह्मण-पत्नियोंको झूठा दोष लगायेंगे ।। ८ ।।

तस्मादेतद् रक्ष्यमाणा गरुडी सम्भवाम्यहम् ।
वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति ।। ९ ।।
‘अतः मैं इस रहस्यको गुप्त रखनेके लिये ‘गरुडी’ पक्षिणीका रूप धारण कर लेती हूँ। इस प्रकार मेरा इस वनसे सुखपूर्वक निकलना सम्भव हो सकेगा’ ।। ९ ।।

मार्कण्डेय उवाच

सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात् ।
अपश्यत् पर्वतं श्वेतं शरस्तम्बैः सुसंवृतम् ।। १० ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर वह तत्काल गरुडीका रूप धारण करके उस महान् वनसे बाहर निकल गयी। आगे जानेपर उसने सरकंडोंके समूहसे आच्छादित श्वेतपर्वतके शिखरको देखा ।। १० ।।

दृष्टिविषैः सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्भुतैः ।
रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा ।। ११ ।।
राक्षसीभिश्च सम्पूर्णमनेकैश्र्व मृगद्विजैः ।
सात सिरोंवाले अद्भुत नाग, जिनकी दृष्टिमें ही विष भरा था, उस पर्वतकी रक्षा करते थे। इनके सिवा राक्षस, पिशाच, भयानक भूतगण, राक्षसी-समुदाय तथा अनेक पशु-पक्षियोंसे भी वह पर्वत भरा हुआ था ।। ११ १/२ ।।
(नदीप्रस्रवणोपेतं नानातरुसमाचितम् ।)

सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम् ।। १२ ।।
प्राक्षिपत् काञ्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता शुभा ।
अनेकानेक नदी और झरने वहाँ बहते थे, तथा नाना प्रकारके वृक्ष उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। शुभस्वरूपा स्वाहा देवीने सहसा उस दुर्गम शैलशिखरपर जाकर एक सुवर्णमय कुण्डमें शीघ्रतापूर्वक उस शुक्र (वीर्य)-को डाल दिया ।। १२ १/२ ।।
सप्तानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम् ।। १३ ।।
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामयामास पावकम् ।
दिव्यरूपमरुन्धत्याः कर्तुं न शकितं तया ।। १४ ।।
तस्यास्तपःप्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च ।
षट्कृत्वस्तत् तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरूत्तम ।। १५ ।।
कुरुश्रेष्ठ! उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति-शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छः बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई ।। १३–१५ ।।
तस्मिन् कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहया तदा ।
तत् स्कन्नं तेजसा तत्र संवृतं जनयत् सुतम् ।। १६ ।।
ऋषिभिः पूजितं स्कन्नमनयत् स्कन्दतां ततः ।
षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रमः ।। १७ ।।
अग्निदेवकी कामना रखनेवाली स्वाहाने प्रतिपदाको उस कुण्डमें उनका वीर्य डाला था। स्कन्दित (स्खलित) हुए उस वीर्यने वहाँ एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। ऋषियोंने उसका बड़ा सम्मान किया। वह स्कन्दित होनेके कारण स्कन्द कहलाया। उसके छः सिर, बारह कान, बारह नेत्र और बारह भुजाएँ थीं ।। १६-१७ ।।

एकग्रीवैकजठरः कुमारः समपद्यत ।
द्वितीयायामभिव्यक्तस्तृतीयायां शिशुर्बभौ ॥ १८ ॥
परंतु उस कुमारका कण्ठ और पेट एक-एक ही था। वह द्वितीयाको अभिव्यक्त हुआ और तृतीयाको शिशुरूपमें सुशोभित होने लगा ॥ १८ ॥
अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतश्चतुर्थ्यामभवद् गुहः ।
लोहिताभ्रेण महता संवृतः सह विद्युता ॥ १९ ॥
लोहिताभ्रे सुमहति भाति सूर्य इवोदितः ।
चतुर्थीको वे कुमार स्कन्द सभी अंग-उपांगोंसे सम्पन्न हो गये। उस समय कुमार लाल रंगके विशाल बिजलीयुक्त बादलसे आच्छादित थे। अतः अरुण रंगके मेघोंकी विशाल घटाके भीतर उदित हुए सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ॥ १९ १/२ ॥
गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं लोमहर्षणम् ॥ २० ॥
न्यस्तं यत् त्रिपुरघ्नेन सुरारिविनिकृन्तनम् ।
तद् गृहीत्वा धनुः श्रेष्ठं ननाद बलवांस्तदा ॥ २१ ॥
त्रिपुरनाशक भगवान् शिवने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले जिस विशाल तथा रोमाञ्चकारी श्रेष्ठ धनुषको रख छोड़ा था उसे बलवान् स्कन्दने उठा लिया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २०-२१ ॥
सम्मोहयन्निवेमान् स त्रीँल्लोकान् सचराचरान् ।

तस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिःस्वनम् ॥ २२ ॥
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह ।
तावापतन्तौ सम्प्रेक्ष्य स बालोऽर्कसमद्युतिः ॥ २३ ॥
द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्तिं चान्येन पाणिना ।
अपरेणाग्निदायादस्ताम्रचूडं भुजेन सः ॥ २४ ॥
महाकायमुपश्लिष्टं कुक्कुटं बलिनां वरम् ।
गृहीत्वा व्यनदद् भीमं चिक्रीड च महाभुजः ॥ २५ ॥
ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्च्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज़ वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गे)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे ॥ २२—२५ ॥

द्वाभ्यां भुजाभ्यां बलवान् गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् ।
प्राध्मापयत भूतानां त्रासनं बलिनामपि ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् उन बलवान् वीरने दोनों हाथोंमें उत्तम शंख लेकर बजाया, जो बलवान् प्राणियोंको भी भयभीत कर देनेवाला था ॥ २६ ॥

द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं बहुशो निजघान ह ।
कीडन् भाति महासेनस्त्रींल्लोकान् वदनैः पिबन् ॥ २७ ॥
फिर वे दो भुजाओंसे आकाशको बार-बार पीटने लगे। इस प्रकार क्रीडा करते हुए कुमार महासेन ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपने मुखोंसे तीनों लोकोंको पी जायेंगे ॥ २७ ॥

पर्वताग्रेऽप्रमेयात्मा रश्मिमानुदये यथा ।
स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्भुतविक्रमः ॥ २८ ॥
व्यलोकयदमेयात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः ।
स पश्यन् विविधान् भावांश्चकार निनदं पुनः ॥ २९ ॥
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन् बहुधा जनाः ।
भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययुः ॥ ३० ॥
अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अद्भुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। भाँति-भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः बालोचित कोलाहल करने लगे। उनकी इस

गर्जनाको सुनकर बहुत-से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये। फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली।। २८—३०।।
ये तु तं संश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जनाः।
तानप्याहुः पारिषदान् ब्राह्मणाः सुमहाबलान्॥ ३१॥
उस समय जिन-जिन नाना वर्णवाले जीवोंने उन स्कन्ददेवकी शरण ली, उन सबको ब्राह्मणोंने उनका महाबलवान् पार्षद बताया है॥ ३१॥
स तूत्थाय महाबाहुरुपसान्त्व्य च तान् जनान्।
धनुर्विकृष्य व्यसृजद् बाणान् श्वेते महागिरौ॥ ३२॥
उन महाबाहुने उठकर उन सब प्राणियोंको सान्त्वना दी और महापर्वत श्वेतपर खड़े-खड़े धनुष खींचकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी॥ ३२॥
बिभेद स शरैः शैलं क्रौञ्चं हिमवतः सुतम्।
तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम्॥ ३३॥
उन बाणोंद्वारा उन्होंने हिमालयके पुत्र क्रौञ्च पर्वतको विदीर्ण कर दिया। उसी छिद्रमें होकर हंस और गृध्र पक्षी मेरु पर्वतको जाते हैं॥ ३३॥
स विशीर्णोऽपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान् रुवन्।
तस्मिन् निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं तदा॥ ३४॥
स्कन्दके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो वह क्रौञ्च पर्वत अत्यन्त आर्तनाद करता हुआ गिर पड़ा। उस समय उसके गिरनेपर दूसरे पर्वत भी जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे॥ ३४॥
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि बलिनां वरः।
न प्राच्यवदमेयात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत्॥ ३५॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ और अमित आत्मबलसे सम्पन्न कुमार उन अत्यन्त आर्त पर्वतोंके उस चीत्कारको सुनकर भी विचलित नहीं हुए, अपितु हाथसे शक्तिको उठाकर सिंहनाद करने लगे॥ ३५॥
सा तदा विमला शक्तिः क्षिप्ता तेन महात्मना।
बिभेद शिखरं घोरं श्वेतस्य तरसा गिरेः॥ ३६॥
उन महात्माने उस समय अपनी चमचमाती हुई शक्ति चलायी और उसके द्वारा श्वेत गिरिके भयानक शिखरको बड़े वेगसे विदीर्ण कर डाला॥ ३६॥
स तेनाभिहतो दीर्णो गिरिः श्वेतोऽचलैः सह।
उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मनः॥ ३७॥
इस प्रकार कार्तिकेयद्वारा शक्तिके आघातसे विदीर्ण होकर श्वेत पर्वत उन महात्माके भयसे डर गया और (दूसरे) पर्वतोंके साथ इस पृथ्वीको छोड़कर आकाशमें उड़ गया॥ ३७॥
ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः।

आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्बलवती बभौ ॥ ३८ ॥
इससे पृथ्वीको बड़ी पीड़ा हुई। वह सब ओरसे फट गयी और पीड़ित हो कार्तिकेयजीकी ही शरणमें जानेपर पुनः बलवती हो शोभा पाने लगी ॥ ३८ ॥
पर्वताश्च नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गताः ।
अथैनमभजल्लोकः स्कन्दं शुक्लस्य पञ्चमीम् ॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् पर्वतोंने भी उन्हींके चरणोंमें मस्तक झुकाया और वे फिर पृथ्वीपर आ गये। तभीसे लोग प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीको स्कन्ददेवका पूजन करने लगे ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसे कुमारोत्पत्तौ
पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आङ्गिरसोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारोत्पत्तिविषयक दो सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/३ श्लोक हैं)