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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।

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सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वेमां धर्मसंयुक्तां धर्मराजः कथां शुभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तमृषिं मार्कण्डेयमिदं तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह धर्मयुक्त शुभ कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन मार्कण्डेयमुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथमग्निर्वर्न यातः कथं चाप्यङ्गिराः पुरा ।
नष्टेऽग्नौ हव्यमवहदग्निर्भूत्वा महाद्युतिः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—मुने! पूर्वकालमें अग्निदेवने किस कारणसे जलमें प्रवेश किया था? और अग्निके अदृश्य हो जानेपर महातेजस्वी अंगिरा ऋषिने किस प्रकार अग्नि होकर देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेका कार्य किया? ॥ २ ॥

अग्निर्यदा त्वेक एव बहुत्वं चास्य कर्मसु ।
दृश्यते भगवन् सर्वमेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
भगवन्! जब अग्निदेव एक ही हैं, तब विभिन्न कर्मोंमें उनके अनेक रूप क्यों दिखायी देते हैं? मैं यह सब कुछ जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

कुमारश्च यथोत्पन्नो यथा चाग्नेः सुतोऽभवत् ।
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गायां कृत्तिकासु च ॥ ४ ॥
कुमार कार्तिकेयकी उत्पत्ति कैसे हुई? वे अग्निके पुत्र कैसे हुए? भगवान् शंकरने तथा गंगादेवी और कृत्तिकाओंसे उनका जन्म कैसे सम्भव हुआ? ॥ ४ ॥

एतदिच्छाम्यहं त्वत्तः श्रोतुं भार्गवसत्तम ।
कौतूहलसमाविष्टो याथातथ्यं महामुने ॥ ५ ॥
भृगुकुलतिलक महामुने! मैं आपके मुखसे यह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ, इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ५ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा क्रुद्धो हुतवहस्तपस्तप्तुं वनं गतः ॥ ६ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! इस विषयमें जानकार लोग उस प्राचीन इतिहासको दोहराया करते हैं, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार अग्निदेव कुपित हो तपस्याके लिये जलमें प्रविष्ट हुए थे? ।। ६ ।।
यथा च भगवानग्निः स्वयमेवाङ्गिराऽभवत् ।
संतापयंश्च प्रभया नाशयंस्तिमिरणि च ॥ ७ ॥
कैसे स्वयं महर्षि अंगिरा ही भगवान् अग्नि बन गये और अपनी प्रभासे अन्धकारका निवारण करते हुए जगत्‌को ताप देने लगे? ।। ७ ।।
पुराङ्गिरा महाबाहो चचार तप उत्तमम् ।
आश्रमस्थो महाभागो हव्यवाहं विशेषयन् ।
तथा स भूत्वा तु तदा जगत् सर्वं व्यकाशयत् ॥ ८ ॥
महाबाहो! प्राचीन कालकी बात है, महाभाग अंगिरा ऋषि अपने आश्रममें ही रहकर उत्तम तपस्या करने लगे। वे अग्निसे भी अधिक तेजस्वी होनेके लिये यत्नशील थे। अपने उद्देश्यमें सफल होकर वे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करने लगे ।। ८ ।।
तपश्चरंस्तु हुतभुक् संतप्तस्तस्य तेजसा ।
भृशं ग्लानश्च तेजस्वी न च किंचित् प्रजज्ञिवान् ॥ ९ ॥
उन्हीं दिनों अग्निदेव भी तपस्या कर रहे थे। वे तेजस्वी होकर भी अंगिराके तेजसे संतप्त हो अत्यन्त मलिन पड़ गये। परंतु इसका कारण क्या है? यह कुछ भी उनकी समझमें नहीं आया ।। ९ ।।
अथ संचिन्तयामास भगवान् हव्यवाहनः ।
अन्योऽग्निरिह लोकानां ब्रह्मणा सम्प्रकल्पितः ॥ १० ॥
तब भगवान् अग्निने यह सोचा—'हो-न-हो, ब्रह्माजीने इस जगत्‌के लिये किसी दूसरे अग्निदेवताका निर्माण कर लिया है' ।। १० ।।
अग्नित्वं विप्रणष्टं हि तप्यमानस्य मे तपः ।
कथमग्निः पुनरहं भवेयमिति चिन्त्य सः ॥ ११ ॥
अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापयन्तं महामुनिम् ।
'जान पड़ता है, तपस्यामें लग जानेसे मेरा अग्नित्व नष्ट हो गया। अब मैं पुनः किस प्रकार अग्नि हो सकता हूँ?' यह विचार करते हुए उन्होंने देखा कि महामुनि अंगिरा अग्निकी ही भाँति प्रकाशित हो सम्पूर्ण जगत्‌को ताप दे रहे ।। ११ १/२ ।।
सोपासर्पच्छनैर्भीतस्तमुवाच तदाङ्गिराः ॥ १२ ॥
शीघ्रमेव भवस्वाग्निस्त्वं पुनर्लोकभावनः ।
विज्ञातश्चासि लोकेषु त्रिषु संस्थानचारिषु ॥ १३ ॥
यह देख वे डरते-डरते धीरेसे उनके पास गये। उस समय उनसे अंगिरा मुनिने कहा—'देव! आप पुनः शीघ्र ही लोकभावन अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हो जाइये; क्योंकि तीनों

लोकों तथा स्थावर-जंगम प्राणियोंमें आपकी प्रसिद्धि है ॥ १२-१३ ॥
त्वमग्निः प्रथमं सृष्टो ब्रह्मणा तिमिरापहः ।
स्वस्थानं प्रतिपद्यस्व शीघ्रमेव तमोनुद ॥ १४ ॥
'ब्रह्माजीने आपको ही अन्धकारनाशक प्रथम अग्निके रूपमें उत्पन्न किया है। तिमिरपुञ्जको दूर भगानेवाले देवता! आप शीघ्र ही अपना स्थान ग्रहण कीजिये' ॥ १४ ॥

अग्निरुवाच

नष्टकीर्तिरहं लोके भवान् जातो हुताशनः ।
भवन्तमेव ज्ञास्यन्ति पावकं न तु मां जनाः ॥ १५ ॥
**अग्निदेव बोले—**मुने! संसारमें मेरी कीर्ति नष्ट हो गयी है। अब आप ही अग्निके पदपर प्रतिष्ठित हैं। आपको ही लोग अग्नि समझेंगे, आपके सामने मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा ॥ १५ ॥

निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव ।
भविष्यामि द्वितीयोऽहं प्राजापत्यक एव च ॥ १६ ॥
मैं अपना अग्नित्व आपमें ही रख देता हूँ, आप ही प्रथम अग्निके पदपर प्रतिष्ठित होइये। मैं द्वितीय प्राजापत्य नामक अग्नि होऊँगा ॥ १६ ॥

अंगिरा उवाच

कुरु पुण्यं प्रजास्वर्ग्यं भवाग्निस्तिमिरपहः ।
मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा ॥ १७ ॥
**अङ्गिराने कहा—**अग्निदेव! आप प्रजाको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुण्यकर्म (देवताओंके पास हविष्य पहुँचानेका कार्य) सम्पन्न कीजिये और स्वयं ही अन्धकारनिवारक अग्निपदपर प्रतिष्ठित होइये; साथ ही मुझे अपना पहला पुत्र स्वीकार कर लीजिये ॥ १७ ॥

मार्कण्डेय उवाच

तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाकरोत् ।
राजन् बृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरसः सुतः ॥ १८ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! अंगिराका यह वचन सुनकर अग्निदेवने वैसा ही किया। उन्हें अपना प्रथम पुत्र मान लिया। फिर अंगिराके भी बृहस्पति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १८ ॥

ज्ञात्वा प्रथमजं तं तु वह्नेराङ्गिरसं सुतम् ।
उपेत्य देवाः पप्रच्छुः कारणं तत्र भारत ॥ १९ ॥
भरतनन्दन! अंगिराको अग्निदेवका प्रथम पुत्र जानकर सब देवता उनके पास आये और इसका कारण पूछने लगे ॥ १९ ॥

स तु पृष्टस्तदा देवैस्ततः कारणमब्रवीत् ।
प्रत्यगृह्णंस्तु देवाश्च तद् वचोऽङ्गिरसस्तदा ॥ २० ॥

देवताओंके पूछनेपर अंगिराने उन्हें कारण बताया और देवताओंने अंगिराके उस कथनपर विश्वास करके उसे यथार्थ माना ॥ २० ॥
तत्र नानाविधानग्नीन् प्रवक्ष्यामि महाप्रभान् ।
कर्मभिर्बहुभिः ख्यातान् नानार्थान् ब्राह्मणेष्विह ॥ २१ ॥

अब मैं महान् कान्तिमान् विविध अग्नियोंका, जो ब्राह्मणग्रंथोक्त विधि-वाक्योंमें अनेक कर्मोंद्वारा विभिन्न प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये विख्यात हैं, वर्णन करूँगा ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे
सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें अंगिरसके प्रसंगमें दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१७ ॥