महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना
एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना
युधिष्ठिर उवाच
भीमसेन यमौ चोभौ पाञ्चालि च निबोधत ।
नास्ति भूतस्य नाशो वै पश्यतास्मान् वनेचरान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— भीमसेन, नकुल-सहदेव और द्रौपदी! तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो। यह निश्चय है कि पूर्वकृत कर्मोंका बिना भोगे कभी नाश नहीं होता। देखो, उन्हींके कारण आज हम राजकुमार होकर भी वन-वनमें भटक रहे हैं ॥ १ ॥
दुर्बलाः क्लेशिताः स्मेति यद् ब्रुवामेतरेतरम् ।
अशक्येऽपि व्रजामो यद् धनंजयदिदृक्षया ॥ २ ॥
यद्यपि हमलोग दुर्बल हैं, क्लेशमें पड़े हुए हैं, तथापि जो एक-दूसरेसे उत्साहपूर्वक बातें करते हैं और जहाँ जाना सम्भव नहीं उस मार्गपर भी आगे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें एक ही कारण है, हम सबके हृदयमें अर्जुनको देखनेके लिये प्रबल उत्कण्ठा है ॥ २ ॥
तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ।
यच्च वीरं न पश्यामि धनंजयमुपान्तिकात् ॥ ३ ॥
इतना प्रयास करनेपर भी मैं वीर धनंजयको जो अबतक अपने समीप नहीं देख पा रहा हूँ, इसकी चिन्ता मेरे सम्पूर्ण अंगोंको उसी प्रकार दग्ध कर रही है, जैसे आग रूईके ढेरको जलाती रहती है ॥ ३ ॥
तस्य दर्शनतृष्णं मां सानुजं वनमास्थितम् ।
याज्ञसेन्याः परामर्शः स च वीर दहत्युत ॥ ४ ॥
उसीके दर्शनकी प्यास लेकर मैं भाइयोंसहित इस वनमें आया हूँ। वीर भीमसेन! दुःशासनने जो द्रौपदीके केश पकड़ लिये थे, वह घटना याद आकर मुझे और भी शोकसे दग्ध कर देती है ॥ ४ ॥
नकुलात् पूर्वजं पार्थं न पश्याम्यमितौजसम् ।
अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ५ ॥
वृकोदर! भयंकर धनुष धारण करनेवाले अजेय वीर अमिततेजस्वी अर्जुनको जो नकुलसे पहले उत्पन्न हुआ है, मैं अबतक नहीं देख रहा हूँ, इसके कारण मुझे बड़ा संताप हो रहा है ॥ ५ ॥
तीर्थानि चैव रम्याणि वनानि च सरांसि च ।
चरामि सह युष्माभिस्तस्य दर्शनकाङ्क्षया ॥ ६ ॥
अर्जुनको देखनेकी ही अभिलाषासे मैं तुमलोगोंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें, रमणीय वनोंमें और सुन्दर सरोवरोंके तटपर विचर रहा हूँ ॥ ६ ॥
पञ्चवर्षाण्यहं वीरं सत्यसंधं धनंजयम् ।
यन्न पश्यामि बीभत्सुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ७ ॥
भीमसेन! आज पाँच वर्ष हो गये, मैं अपने वीर भाई सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनके दर्शनसे वंचित हो गया हूँ। इसके कारण मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है ॥ ७ ॥
तं वै श्यामं गुडाकेशं सिंहविक्रान्तगामिनम् ।
न पश्यामि महाबाहुं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ८ ॥
वृकोदर! सिंहके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले, निद्राविजयी, श्यामवर्ण, महाबाहु अर्जुनको नहीं देख पा रहा हूँ, इसलिये मेरे मनमें बड़ा संताप हो रहा है ॥ ८ ॥
कृतास्त्रं निपुणं युद्धेऽप्रतिमानं धनुष्मताम् ।
न पश्यामि कुरुश्रेष्ठ तेन तप्ये वृकोदर ॥ ९ ॥
कुरुश्रेष्ठ भीमसेन! अस्त्रविद्यामें प्रवीण, युद्धकुशल और अनुपम धनुर्धर उस अर्जुनको नहीं देखता हूँ, इस कारण मुझे बड़ा कष्ट होता है ॥ ९ ॥
चरन्तमरिसंघेषु काले क्रुद्धमिवान्तकम् ।
प्रभिन्नमिव मातङ्गं सिंहस्कन्धं धनंजयम् ॥ १० ॥
जो युद्धके समय शत्रुओंके समूहमें कुपित यमराजकी भाँति विचरता है, जिसके कंधे सिंहके समान हैं तथा जो मदकी धारा बहानेवाले मत्त गजराजके समान शोभा पाता है, उस वीर धनंजयसे अबतक भेंट न हो सकी; इसका मुझे बड़ा दुःख है ॥ १० ॥
यः स शक्रादनवरो वीर्येण द्रविणेन च ।
यमयोः पूर्वजः पार्थः श्वेताश्वोऽमितविक्रमः ॥ ११ ॥
दुःखेन महताविष्टस्तं न पश्यामि फाल्गुनम् ।
अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ १२ ॥
वृकोदर! जो पराक्रम और सम्पत्तिमें देवराज इन्द्रसे तनिक भी कम नहीं है, जिसके रथके घोड़े श्वेत रंगके हैं, जो नकुल-सहदेवसे अवस्थामें बड़ा है, जिसके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है तथा जो उग्र धनुर्धर एवं अजेय है, उस वीरवर अर्जुनके दर्शनसे मैं वंचित हूँ; इसके लिये मुझे महान कष्ट हो रहा है। मैं चिन्ताकी आगमें जला जा रहा हूँ ॥ ११-१२ ॥
सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीयसा ।
ऋजुमार्गप्रपन्नस्य शर्मदाताभयस्य च ॥ १३ ॥
स तु जिह्मप्रवृत्तस्य माययाभिजिघांसतः ।
अपि वज्रधरस्यापि भवेत् कालविषोपमः ॥ १४ ॥
जो छोटे लोगोंके आक्षेप करनेपर भी सदा क्षमाशील होनेके कारण उस आक्षेपको सह लेता है तथा सरल मार्गसे अपनी शरणमें आनेवाले लोगोंको सुख पहुँचाकर उन्हें अभयदान देता है, वही अर्जुन, जब कोई कुटिल मार्गका आश्रय ले छल-कपटसे उसपर आघात करना चाहता है तब वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उसके लिये काल और विषके समान भयंकर हो जाता है ।। १३-१४ ।।
शत्रोरपि प्रपन्नस्य सोऽनृशंसः प्रतापवान् ।
दाताभयस्य बीभत्सुरमितात्मा महाबलः ।। १५ ।।
सर्वेषामाश्रयोऽस्माकं रणेऽरीणां प्रमर्दिता ।
आहर्ता सर्वरत्नानां सर्वेषां नः सुखावहः ।। १६ ।।
यदि शत्रु भी शरणमें आ जाय तो वह प्रतापी वीर उसके प्रति दयालु हो जाता और उसे निर्भय कर देता है। वह महाबली महामना अर्जुन ही हमलोगोंका सहारा है। वही समरांगणमें हमारे शत्रुओंको रौंद डालनेकी शक्ति रखता है। उसीने हमारे लिये सब प्रकारके रत्न लाकर सुलभ किये थे और वही हम सबको सदा सुख पहुँचानेवाला है ।। १५-१६ ।।
रत्नानि यस्य वीर्येण दिव्याण्यासन् पुरा मम ।
बहूनि बहुजातीनि यानि प्राप्तः सुयोधनः ।। १७ ।।
जिसके पराक्रमसे हमारे पास पहले अनेक प्रकारकी असंख्य रत्नराशि संचित हो गयी थी, जिसे सुयोधनने ले लिया ।। १७ ।।
यस्य बाहुबलाद् वीर सभा चासीत् पुरा मम ।
सर्वरत्नमयी ख्याता त्रिषु लोकेषु पाण्डव ।। १८ ।।
वीर भीमसेन! जिसके बाहुबलसे पहले मेरे अधिकारमें सम्पूर्ण रत्नोंकी बनी हुई त्रिभुवनविख्यात सभा थी ।। १८ ।।
वासुदेवसमं वीर्ये कार्तवीर्यसमं युधि ।
अजेयममितं युद्धे तं न पश्यामि फाल्गुनम् ।। १९ ।।
जो पराक्रममें भगवान् श्रीकृष्ण और युद्धमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; तथा जो समरभूमिमें एक होकर भी असंख्य-सा प्रतीत होता है, उस अजेय वीर अर्जुनको मैं बहुत दिनोंसे नहीं देख पाता हूँ ।। १९ ।।
संकर्षणं महावीर्यं त्वां च भीमापराजितम् ।
अनुयातः स्ववीर्येण वासुदेवं च शत्रुहा ।। २० ।।
भीमसेन! शत्रुनाशक अर्जुन अपने पराक्रमसे महाबली बलरामकी, तुझ अपराजित वीरकी और वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी समानता कर सकता है ।। २० ।।
यस्य बाहुबले तुल्यः प्रभावे च पुरंदरः ।
जवे वायुर्मुखे सोमः क्रोधे मृत्युः सनातनः ।। २१ ।।
ते वयं तं नरव्याघ्रं सर्वे वीर दिदृक्षवः ।
प्रवेक्ष्यामो महाबाहो पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २२ ॥
महाबाहो! जो बाहुबल और प्रभावमें देवराज इन्द्रके समान है, जिसके वेगमें वायु, मुखमें चन्द्रमा और क्रोधमें सनातन मृत्युका निवास है, उसी नरश्रेष्ठ अर्जुनको देखनेके लिये उत्सुक होकर हम सब लोग आज गन्धमादन पर्वतकी घाटियोंमें प्रवेश करेंगे ॥ २१-२२ ॥
विशाला बदरी यत्र नरनारायणाश्रमः ।
तं सदाध्युषितं यक्षैर्द्रक्ष्यामो गिरिमुत्तमम् ॥ २३ ॥
कुबेरनलिनीं रम्यां राक्षसैर्भिसेविताम् ।
पद्भिरेव गमिष्यामस्तप्यमाना महत् तपः ॥ २४ ॥
गन्धमादन वही है, जहाँ विशाल बदरीका वृक्ष और भगवान् नर-नारायणका आश्रम है; उस उत्तम पर्वतपर सदा यक्षगण निवास करते हैं; हमलोग उसका दर्शन करेंगे। इसके सिवा, राक्षसोंद्वारा सेवित कुबेरकी सुरम्य पुष्करिणी भी है जहाँ हमलोग भारी तपस्या करते हुए पैदल ही चलेंगे ॥ २३-२४ ॥
न च यानवता शक्यो गन्तुं देशो वृकोदर ।
न नृशंसेन लुब्धेन नाप्रशान्तेन भारत ॥ २५ ॥
भरतनन्दन! वृकोदर! उस प्रदेशमें किसी सवारीसे नहीं जाया जा सकता तथा जो क्रूर, लोभी और अशान्त है, ऐसे मनुष्यके लिये श्रद्धाकी कमीके कारण उस स्थानपर जाना असम्भव है ॥ २५ ॥
तत्र सर्वे गमिष्यामो भीमार्जुनगवेषिणः ।
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशाः सार्धं विप्रैर्महाव्रतैः ॥ २६ ॥
भीमसेन! हम सब लोग अर्जुनकी खोज करते हुए तलवार बाँधकर अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो इन महान् व्रतधारी ब्राह्मणोंके साथ वहाँ चलेंगे ॥ २६ ॥
मक्षिकादंशमशकान् सिंहान् व्याघ्रान् सरीसृपान् ।
प्राप्नोत्यनियतः पार्थ नियतस्तान् न पश्यति ॥ २७ ॥
भीमसेन! जो अपने मन और इन्द्रियोंपर संयम नहीं रखता, ऐसे मनुष्यको वहाँ जानेपर मक्खी, डाँस, मच्छर, सिंह, व्याघ्र और सर्पोंका सामना करना पड़ता है, परंतु जो संयम-नियमसे रहनेवाला है, उसे उन जन्तुओंका दर्शनतक नहीं होता ॥ २७ ॥
ते वयं नियतात्मानः पर्वतं गन्धमादनम् ।
प्रवेक्ष्यामो मिताहारा धनंजयदिदृक्षवः ॥ २८ ॥
अतः हमलोग भी अर्जुनको देखनेकी इच्छासे अपने मनको संयममें रखकर स्वल्पाहार करते हुए गन्धमादनकी पर्वतमालाओंमें प्रवेश करेंगे ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ इकलीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४१ ।।