सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकनवतितमोऽध्यायः

महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाषमाणे तु धौम्ये कौरवनन्दन ।
लोमशः स महातेजा ऋषिस्तत्राजगाम ह ॥ १ ॥
तं पाण्डवाग्रजो राजा सगणो ब्राह्मणाश्च ते ।
उपातिष्ठन्महाभागं दिवि शक्रमिवामराः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कौरवनन्दन! जब धौम्य ऋषि इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय महातेजस्वी महर्षि लोमश वहाँ आये। जैसे स्वर्गमें इन्द्रके आनेपर समस्त देवता उठकर खड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार ज्येष्ठ पाण्डव राजा युधिष्ठिर, उनके समुदायके अन्य लोग तथा वे ब्राह्मण भी उन महाभाग लोमशको आया देख उनके स्वागतके लिये उठकर खड़े हो गये ॥ १-२ ॥

समभ्यर्च्य यथान्यायं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
पप्रच्छागमने हेतुमटने च प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
धर्मनन्दन युधिष्ठिरने यथायोग्य उनका पूजन करके उन्हें आसनपर बिठाया और वहाँ आने तथा वनमें घूमनेका प्रयोजन पूछा ॥ ३ ॥
स पृष्टः पाण्डुपुत्रेण प्रीयमाणो महामनाः ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा हर्षयन्निव पाण्डवान् ॥ ४ ॥
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर महामना महर्षि लोमश बड़े प्रसन्न हुए और अपनी मधुर वाणीद्वारा पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए-से बोले— ॥ ४ ॥
संचरन्नस्मि कौन्तेय सर्वाँल्लोकान् यदृच्छया ।
गतः शक्रस्य भवनं तत्रापश्यं सुरेश्वरम् ॥ ५ ॥
‘कुन्तीनन्दन! मैं यों ही इच्छानुसार सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करता हूँ। एक दिन मैं इन्द्रके भवनमें गया और वहाँ देवराज इन्द्रसे मिला ॥ ५ ॥
तव च भ्रातरं वीरमपश्यं सव्यसाचिनम् ।
शक्रस्यार्धासनगतं तत्र मे विस्मयो महान् ॥ ६ ॥
‘वहाँ मैंने तुम्हारे वीर भ्राता सव्यसाची अर्जुनको भी देखा, जो इन्द्रके आधे सिंहासनपर बैठे हुए थे। वहाँ उन्हें इस दशामें देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ६ ॥
आसीत् पुरुषशार्दूल दृष्ट्वा पार्थं तथागतम् ।
आह मां तत्र देवेशो गच्छ पाण्डुसुतान् प्रति ॥ ७ ॥
‘पुरुषसिंह युधिष्ठिर! तुम्हारे भाई अर्जुनको इन्द्रके सिंहासनपर बैठा देख जब मैं आश्चर्यचकित हो रहा था, उसी समय देवराज इन्द्रने मुझसे कहा—‘मुने! तुम पाण्डवोंके पास जाओ’ ॥ ७ ॥
सोऽहमभ्यागतः क्षिप्रं दिदृक्षुस्त्वां सहानुजम् ।
वचनात् पुरुहूतस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥ ८ ॥
‘उन इन्द्रके आदेशसे मैं भाइयोंसहित तुम्हें देखनेके लिये शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ। इसके लिये इन्द्रने तो मुझसे कहा ही था, महात्मा अर्जुनने भी अनुरोध किया था ॥ ८ ॥
आख्यास्ये ते प्रियं तात महत् पाण्डवनन्दन ।
ऋषिभिः सहितो राजन् कृष्णया चैव तच्छृणु ॥ ९ ॥
यत् त्वयोक्तो महाबाहुरस्त्रार्थं भरतर्षभ ।
तदस्त्रमाप्तं पार्थेन रुद्रादप्रतिमं विभो ॥ १० ॥
‘तात! पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! मैं तुम्हें बड़ा प्रिय समाचार सुनाऊँगा। राजन्! तुम इन महर्षियों और द्रौपदीके साथ मेरी बात सुनो। भरतकुलभूषण विभो! तुमने महाबाहु अर्जुनको दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये जो आदेश दिया था, उसके

विषयमें यह निवेदन करना है कि अर्जुनने भगवान् शंकरसे उनका अनुपम अस्त्र (पाशुपत) प्राप्त कर लिया है ॥ ९-१० ॥
यत् तद् ब्रह्मशिरो नाम तपसा रुद्रमागमत् ।
अमृतादुत्थितं रौद्रं तल्लब्धं सव्यसाचिना ॥ ११ ॥
‘जो ब्रह्मशिर नामक अस्त्र अमृतसे प्रकट होकर तपस्याके प्रभावसे भगवान् शंकरको मिला था, वही पाशुपतास्त्र सव्यसाची अर्जुनने प्राप्त कर लिया है ॥ ११ ॥
तत् समन्त्रं ससंहारं सप्रायश्चित्तमङ्गलम् ।
वज्रमस्त्राणि चान्यानि दण्डादीनि युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
‘युधिष्ठिर! रुद्र देवताका वह वज्रके समान दुर्भेद्य अस्त्र मन्त्र, उपसंहार, प्रायश्चित्त और मङ्गलसहित अर्जुनने पा लिया है। साथ ही, दण्ड आदि अन्य अस्त्र भी उन्होंने हस्तगत कर लिये हैं ॥ १२ ॥
यमात् कुबेराद् वरुणादिन्द्राच्च कुरुनन्दन ।
अस्त्राण्यधीतवान् पार्थो दिव्यान्यमितविक्रमः ॥ १३ ॥
‘कुरुनन्दन! अमित पराक्रमी अर्जुनने यम, कुबेर, वरुण और इन्द्रसे दिव्यास्त्रोंका अध्ययन किया है ॥ १३ ॥
विश्वावसोस्तु तनयाद् गीतं नृत्यं च साम च ।
वादित्रं च यथान्यायं प्रत्यविन्दद् यथाविधि ॥ १४ ॥
‘इतना ही नहीं, उन्होंने विश्वावसुके पुत्रसे नृत्य, गीत, सामगान और वाद्यकलाकी भी विधिपूर्वक यथोचित शिक्षा प्राप्त कर ली है ॥ १४ ॥
एवं कृतास्त्रः कौन्तेयो गान्धर्वं वेदमाप्तवान् ।
सुखं वसति बीभत्सुरनुजस्यानुजस्तव ॥ १५ ॥
‘इस प्रकार अस्त्रविद्यामें निपुणता प्राप्त करके कुन्तीकुमारने गान्धर्ववेद (संगीतविद्या) को भी प्राप्त कर लिया है। अब तुम्हारे छोटे भाई भीमसेनके छोटे भाई अर्जुन वहाँ बड़े सुखसे रह रहे हैं ॥ १५ ॥
यदर्थं मां सुरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् ।
तच्च ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध मे ॥ १६ ॥
‘युधिष्ठिर! देवश्रेष्ठ इन्द्रने मुझसे तुम्हारे लिये जो संदेश कहा था, उसे अब तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ १६ ॥
भवान् मनुष्यलोकेऽपि गमिष्यति न संशयः ।
ब्रूयाद् युधिष्ठिरं तत्र वचनान्मे द्विजोत्तम ॥ १७ ॥
आगमिष्यति ते भ्राता कृतास्त्रः क्षिप्रमर्जुनः ।
सुरकार्यं महत् कृत्वा यदशक्यं दिवौकसाम् ॥ १८ ॥
तपसापि त्वमात्मानं योजय भ्रातृभिः सह ।

तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥ १९ ॥
‘उन्होंने मुझसे कहा—द्विजोत्तम! इसमें संदेह नहीं कि आप घूमते-घामते मनुष्यलोकमें भी जायँगे; अतः मेरे अनुरोधसे आप राजा युधिष्ठिरके पास जाकर यह बात कह दीजियेगा—‘राजन्! तुम्हारे भाई अर्जुन अस्त्र-विद्यामें निपुण हो चुके हैं। अब वे देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य, जिसे देवता स्वयं नहीं कर सकते, सिद्ध करके शीघ्र तुम्हारे पास आ जायँगे; तबतक तुम भी अपने भाइयोंके साथ स्वयंको तपस्यामें लगाओ; क्योंकि तपस्यासे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तपस्यासे महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ १७—१९ ॥
अहं च कर्णं जानामि यथावद् भरतर्षभ ।
सत्यसंधं महोत्साहं महावीर्यं महाबलम् ॥ २० ॥
“भरतश्रेष्ठ! मैं कर्णको अच्छी तरह जानता हूँ। वह सत्यप्रतिज्ञ, अत्यन्त उत्साही, महापराक्रमी और महाबली है ॥ २० ॥
महाहवेष्वप्रतिमं महायुद्धविशारदम् ।
महाधनुर्धरं वीरं महास्त्रं वरवर्णिनम् ॥ २१ ॥
महेश्वरसुतप्रख्यमादित्यतनयं प्रभुम् ।
तथार्जुनमतिस्कन्दं सहजोलबणपौरुषम् ॥ २२ ॥
न स पार्थस्य संग्रामे कलामर्हति षोडशीम् ।
यच्चापि ते भयं कर्णान्मनसिस्थमरिंदम ॥ २३ ॥
तच्चाप्यपहरिष्यामि सव्यसाचिन्युपागते ।
यच्च ते मानसं वीर तीर्थयात्रामिमां प्रति ।
स महर्षिर्लोमशस्ते कथयिष्यत्यसंशयम् ॥ २४ ॥
“बड़े-बड़े संग्रामोंमें उसकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। वह महान् युद्धविशारद, महाधनुर्धर, अस्त्र-शस्त्रोंका महान् ज्ञाता, श्रेष्ठ, सुन्दर महेश्वरपुत्र कार्तिकेयके समान पराक्रमी, सूर्यदेवताका पुत्र और शक्तिशाली वीर है। इसी प्रकार मैं अर्जुनको भी जानता हूँ। वह कार्तिकेयसे भी बढ़कर है, उसमें स्वभावसे ही दुःसह पुरुषार्थ भरा हुआ है। युद्धमें कर्ण अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। शत्रुदमन! तुम्हारे मनमें जिस बातको लेकर कर्णसे भय बना रहता है, मैं अर्जुनके लौटनेपर तुम्हारे उस भयको भी दूर कर दूँगा। वीरवर! तीर्थयात्राके विषयमें जो तुम्हारा मानसिक संकल्प है, उसके विषयमें महर्षि लोमश निश्चय ही तुमसे सब कुछ बतावेंगे ॥
यच्च किंचित् तपोयुक्तं फलं तीर्थेषु भारत ।
ब्रह्मर्षिरेष ब्रूयात् ते तच्छ्रद्धेयं न चान्यथा ॥ २५ ॥
“भरतनन्दन! तीर्थोंमें जो कुछ तपस्यायुक्त फल प्राप्त होता है, वह सब ये ब्रह्मर्षि लोमश तुम्हें बतायेंगे, तुम्हें उसपर विश्वास करना चाहिये। उसमें अन्यथाबुद्धि नहीं करनी चाहिये” ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशसंवादे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें युधिष्ठिरलोमश-संवादविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥