महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना
वैशम्पायन उवाच
ततस्तानि महार्हाणि दिव्यानि भरतर्षभ ।
बहूनि बहुरूपाणि विरजांसि समाददे ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ, तदनन्तर भीमसेनने अनेक प्रकारके बहुमूल्य, दिव्य और निर्मल बहुत-से सौगन्धिक कमल संगृहीत कर लिये ॥ १ ॥
ततो वायुर्महान् शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणः ।
प्रादुरासीत् खरस्पर्शः संग्राममभिचोदयन् ॥ २ ॥
इसी समय गन्धमादन पर्वतपर तीव्र वेगसे बड़े जोरकी आँधी उठी, जो नीचे कंकड़-बालूकी वर्षा करनेवाली थी। उसका स्पर्श तीक्ष्ण था। वह किसी भारी संग्रामकी सूचना देनेवाली थी ॥ २ ॥
पपात महती चोल्का सनिर्घाता महाभया ।
निष्प्रभश्चाभवत् सूर्यश्छन्नरश्मिस्तमोवृतः ॥ ३ ॥
वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ अत्यन्त भयदायक भारी उल्कापात होने लगा। सूर्य अन्धकारसे आवृत हो प्रभाशून्य हो गये। उनकी किरणें आच्छादित हो गयीं ॥ ३ ॥
निर्घातश्चाभवद् भीमो भीमे विक्रममास्थिते ।
चचाल पृथिवी चापि पांसुवर्षं पपात च ॥ ४ ॥
जिस समय भीम राक्षसोंके साथ युद्धमें भारी पराक्रम दिखा रहे थे, उस समय पृथ्वी हिलने लगी, आकाशमें भीषण गर्जना होने लगी और धूलकी वर्षा आरम्भ हो गयी ॥ ४ ॥
सलोहिता दिशश्चासन् खरवाचो मृगद्विजाः ।
तमोवृतमभूत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण दिशाएँ लाल हो गयी, मृग और पक्षी कठोर शब्द करने लगे, सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और किसीको कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५ ॥
अन्ये च बहवो भीमा उत्पातास्तत्र जज्ञिरे ।
तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
उवाच वदतां श्रेष्ठः कोऽस्मानभिभविष्यति ।
सज्जीभवत भद्रं वः पाण्डवा युद्धदुर्मदाः ॥ ७ ॥
यथारूपाणि पश्यामि स्वभ्यग्रो नः पराक्रमः ।
एवमुक्त्वा ततो राजा वीक्षाञ्चक्रे समन्ततः ॥ ८ ॥
इसके सिवा और भी बहुत-से भयानक उत्पात वहाँ प्रकट होने लगे। यह अद्भुत घटना देखकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिरने कहा—'कौन हम लोगोंको पराजित कर सकेगा? रणोन्मत्त पाण्डवो! तुम्हारा भला हो, तुम युद्धके लिये तैयार हो जाओ। मैं जैसे लक्षण देख रहा हूँ, उससे पता लगता है कि हमारे लिये पराक्रम दिखानेका समय अत्यन्त निकट आ गया है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने चारों ओर दृष्टिपात किया ॥ ६—८ ॥
अपश्यमानो भीमं तु धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
ततः कृष्णां यमौ चापि समीपस्थावरिंदमः ॥ ९ ॥
पप्रच्छ भ्रातरं भीमं भीमकर्माणमाहवे ।
कच्चित् क्व भीमः पाञ्चालि किंचित् कृत्यं चिकीर्षति ॥ १० ॥
जब भीम नहीं दिखायी दिये, तब शत्रुदमन धर्मनन्दन युधिष्ठिरने द्रौपदी तथा पास ही बैठे हुए नकुल-सहदेवसे अपने भाई भीमके सम्बन्धमें, जो रणभूमिमें भयानक कर्म करनेवाले थे, पूछा—'पांचाल-राजकुमारी! भीमसेन कहाँ है? क्या वे कोई काम करना चाहते हैं? ॥ ९-१० ॥
कृतवानपि वा वीरः साहसं साहसप्रियः ।
इमे ह्यकस्मादुत्पाता महासमरदर्शनाः ॥ ११ ॥
'अथवा साहसप्रेमी वीरवर भीमने कोई साहसका कार्य तो नहीं कर डाला? यह अकस्मात् प्रकट हुए उत्पात महान् युद्धके सूचक हैं ॥ ११ ॥
दर्शयन्तो भयं तीव्रं प्रादुर्भूताः समन्ततः ।
तं तथावादिनं कृष्णा प्रत्युवाच मनस्विनी ।
प्रिया प्रियं चिकीर्षन्ती महिषी चारुहासिनी ॥ १२ ॥
'ये चारों ओर तीव्र भयका प्रदर्शन करते हुए प्रकट हो रहे हैं।' धर्मराज युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख मनोहर मुसकानवाली मनस्विनी महारानी पतिप्रिया द्रौपदीने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे इस प्रकार उत्तर दिया ॥
द्रौपद्युवाच
यत् तत् सौगन्धिकं राजन्नाहृतं मातरिश्वना ।
तन्मया भीमसेनस्य प्रीतयाद्योपपादितम् ॥ १३ ॥
अपि चोक्तो मया वीरो यदि पश्येर्बहून्यपि ।
तानि सर्वाण्युपादाय शीघ्रमागम्यतामिति ॥ १४ ॥
द्रौपदी बोली—राजन्! आज जो सौगन्धिक पुष्प वायु उड़ा लायी थी, उसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक भीमसेनको दिया और उन वीरशिरोमणिसे यह भी कहा कि 'यदि इसी
तरहके बहुत-से पुष्प तुम्हें दिखायी दें, तो उन सबको लेकर शीघ्र यहाँ लौट आना।' ॥ १३-१४ ॥
स तु नूनं महाबाहुः प्रियार्थं मम पाण्डवः ।
प्रागुदीचीं दिशं राजंस्तान्याहर्तुमितो गतः ॥ १५ ॥
महाराज! मालूम होता है कि वे महाबाहु पाण्डुकुमार निश्चय ही मेरा प्रिय करनेके लिये उन्हीं फूलोंको लानेके निमित्त यहाँसे पूर्वोत्तर दिशाको गये हैं ॥ १५ ॥
उक्तस्त्वेवं तया राजा यमाविदमथाब्रवीत् ।
गच्छाम सहितास्तूर्णं येन यातो वृकोदरः ॥ १६ ॥
द्रौपदीके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिरने नकुल-सहदेवसे इस प्रकार कहा—'अब हम लोग भी एक साथ शीघ्र ही उस मार्गपर चलें' जिससे भीमसेन गये हैं ॥ १६ ॥
वहन्तु राक्षसा विप्रान् यथाश्रान्तान् यथाकृशान् ।
त्वमप्यमरसंकाश वह कृष्णां घटोत्कच ॥ १७ ॥
'देवताओंके समान तेजस्वी घटोत्कच! तुम्हारे साथी राक्षस लोग इन ब्राह्मणोंको, जो जैसे थके और दुर्बल हों, उसके अनुसार कंधेपर बिठाकर ले चलें और तुम भी द्रौपदीको ले चलो ॥ १७ ॥
व्यक्तं दूरमितो भीमः प्रविष्ट इति मे मतिः ।
चिरं च तस्य कालोऽयं स च वायुसमो जवे ॥ १८ ॥
तरस्वी वैनतेयस्य सदृशो भुवि लंघने ।
उत्पतेदपि चाकाशं निपतेच्च यथेच्छकम् ॥ १९ ॥
'यह स्पष्ट जान पड़ता है कि भीमसेन यहाँसे बहुत दूर चले गये हैं, मेरा यही विश्वास है। क्योंकि उनको गये बहुत समय हो गया है तथा वे वेगमें वायुके समान हैं और इस पृथ्वीको लाँघनेमें गरुड़के समान शीघ्रगामी हैं। वे आकाशमें छलाँग मार सकते हैं और इच्छानुसार कहीं भी कूद सकते हैं ॥ १८-१९ ॥
तमन्वियाम भवतां प्रभावाद् रजनीचराः ।
पुरा स नापराध्नोति सिद्धानां ब्रह्मवादिनाम् ॥ २० ॥
'निशाचरो! भीमसेन ब्रह्मवादी सिद्धोंका कुछ अपराध न कर पावें, इसके पहले ही तुम्हारे प्रभावसे हम उन्हें ढूँढ़ निकालें' ॥ २० ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे हैडिम्बप्रमुखास्तदा ।
उद्देशज्ञाः कुबेरस्य नलिन्या भरतर्षभ ॥ २१ ॥
आदाय पाण्डवांश्चैव तांश्च विप्राननेकशः ।
लोमशेनैव सहिताः प्रययुः प्रीतमानसाः ॥ २२ ॥
जनमेजय! तब कुबेरके उस सरोवरका पता जाननेवाले उन घटोत्कच आदि सब राक्षसोंने 'तथास्तु' कहकर पाण्डवों तथा उन अनेकानेक ब्राह्मणोंको कंधेपर बैठाकर
लोमशजीके साथ वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान किया ।। २१-२२ ।।
ते सर्वे त्वरिता गत्वा ददृशुः शुभकाननाम् ।
पद्मसौगन्धिकवतीं नलिनीं सुमनोरमाम् ।। २३ ।।
उन सबने शीघ्रतापूर्वक जाकर सुन्दर वनस्थलीसे सुशोभित वह अत्यन्त मनोरम सरोवर देखा, जिसमें सौगन्धिक कमल थे ।। २३ ।।
तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे मनस्विनम् ।
ददृशुर्निहतांश्चैव यक्षांश्च विपुलेक्षणान् ।। २४ ।।
भिन्नकायाक्षिबाहूरून् संचूर्णितशिरोधरान् ।
तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् ।। २५ ।।
उसके तटपर मनस्वी महामना भीमको तथा उनके द्वारा मारे गये बड़े-बड़े नेत्रोंवाले यक्षोंको भी देखा—जिनके शरीर, नेत्र, भुजाएँ और जाँघें छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, गर्दन कुचल दी गयी थी, महात्मा भीम उस सरोवरके तटपर खड़े थे ।। २४-२५ ।।
सक्रोधं स्तब्धनयनं संदष्टदशनच्छदम् ।
उद्यम्य च गदां दोर्भ्यां नदीतीरेष्ववस्थितम् ।। २६ ।।
उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ था। उनकी आँखें स्तब्ध हो रही थीं। वे दोनों हाथोंसे गदा उठाये और दाँतोंसे ओठ दबाये नदीके तटपर खड़े थे ।। २६ ।।
प्रजासंक्षेपसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् ।
तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्य पुनः पुनः ।। २७ ।।
उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो प्रजाके संहारकालमें दण्ड हाथमें लिये यमराज खड़े हों। भीमसेनको उस अवस्थामें देखकर धर्मराजने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया ।। २७ ।।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेय किमिदं कृतम् ।
साहसं बत भद्रं ते देवानामथ चाप्रियम् ।। २८ ।।
और मधुर वाणीमें कहा—'कुन्तीनन्दन! यह तुमने क्या कर डाला? तुम्हारा कल्याण हो। खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारा यह कार्य साहसपूर्ण है और देवताओंके लिये अप्रिय है ।। २८ ।।
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
अनुशिष्य तु कौन्तेयं पद्मानि परिगृह्य च ।। २९ ।।
तस्यामेव नलिन्यां तु विजहुरमरोपमाः ।
एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलायुधाः ।। ३० ।।
प्रादुरासन् महाकायास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः ।
ते दृष्ट्वा धर्मराजानं महर्षिं चापि लोमशम् ।। ३१ ।।
नकुलं सहदेवं च तथान्यान् ब्राह्मणर्षभान् ।
विनयेन नताः सर्वे प्रणिपत्य च भारत ॥ ३२ ॥
सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः ।
विदिताश्च कुबेरस्य तत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ ३३ ॥
ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः ।
प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु ॥ ३४ ॥
‘यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो तो फिर ऐसा काम न करना।’ भीमसेनको ऐसा उपदेश देकर उन्होंने पूर्वोक्त सौगन्धिक कमल ले लिये और वे देवोपम पाण्डव उसी सरोवरके तटपर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। इसी समय शिलाओंको आयुधरूपमें ग्रहण किये, बहुत-से विशालकाय उद्यानक्षक वहाँ प्रकट हो गये। भारत! उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि लोमश, नकुल-सहदेव तथा अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विनयपूर्वक नतमस्तक होकर प्रणाम किया। फिर धर्मराज युधिष्ठिरने उन्हें सान्त्वना दी। इससे वे निशाचर (राक्षस) प्रसन्न हो गये। तदनन्तर वे कुरुप्रवर पाण्डव धनाध्यक्ष कुबेरकी जानकारीमें कुछ कालतक वहाँ आनन्दपूर्वक टिके रहे और गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ २९—३४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥