महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन
अर्जुन उवाच
ततोऽश्मवर्षं सुमहत् प्रादुरासीत् समन्ततः ।
नगमात्रैः शिलाखण्डैस्तन्मां दृढमपीडयत् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**महाराज! तदनन्तर चारों ओरसे पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा आरम्भ हो गयी। वृक्षोंके बराबर ऊँचे शिलाखण्ड रणभूमिमें गिरने लगे, इससे मुझे बड़ी पीड़ा हुई ॥ १ ॥
तदहं वज्रसंकाशैर्महेन्द्रास्त्रप्रचोदितैः ।
अचूर्यणं वेगवद्भिः शरजालैर्महाहवे ॥ २ ॥
तब मैंने महेन्द्रास्त्रसे अभिमन्त्रित वज्रतुल्य वेगवान् बाणोंद्वारा उस महासमरमें गिरनेवाले समस्त शिला-खण्डोंको चूर-चूर कर दिया ॥ २ ॥
चूर्ण्यमानेऽश्मवर्षे तु पावकः समजायत ।
तत्राश्मचूर्णान्यपतन् पावकप्रकरा इव ॥ ३ ॥
पत्थरोंकी वर्षाके चूर्ण होते ही सब ओर आग प्रकट हो गयी। फिर तो वहाँ आगकी चिनगारियोंके समूहकी भाँति पत्थरका चूर्ण पड़ने लगा ॥ ३ ॥
ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षं महत्तरम् ।
धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीन्ममान्तिके ॥ ४ ॥
तदनन्तर मेरे बाणोंसे वह पत्थरोंकी वर्षा शान्त होनेपर महत्तर जल-वृष्टि आरम्भ हो गयी। मेरे पासही सर्पोंके* समान मोटी जलधाराएँ गिरने लगीं ॥ ४ ॥
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवीर्याः सहस्रशः ।
आवृण्वन् सर्वतो व्योम दिशश्चोपविशस्तथा ॥ ५ ॥
आकाशसे प्रचण्ड शक्तिशालिनी सहस्रों धाराएँ बरसने लगीं, जिन्होंने न केवल आकाशको ही, अपितु सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओंको भी सब ओरसे ढक लिया ॥ ५ ॥
धाराणां च निपातेन वायौर्विस्फूर्जितेन च ।
गर्जितेन च दैत्यानां न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥
धाराओंकी वर्षा, हवाके झकोरों और दैत्योंकी गर्जनासे कुछ भी जान नहीं पड़ता था ॥ ६ ॥
धारा दिवि च सम्बद्धा वसुधायां च सर्वशः ।
व्यामोहयन्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥ ७ ॥
स्वर्गसे लेकर पृथ्वीतक एक सूत्रमें आबद्ध-सी होकर पृथ्वीपर सब ओर जलकी धाराएँ लगातार गिर रही थीं, जिन्होंने वहाँ मुझे मोहमें डाल दिया था ॥ ७ ॥
तत्रोपदिष्टमिन्द्रेण दिव्यमस्त्रं विशोषणम् ।
दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत् तेन तज्जलम् ॥ ८ ॥
तब मैंने वहाँ देवराज इन्द्रके द्वारा प्राप्त हुए दिव्य विशोषणास्त्रका प्रयोग किया, जो अत्यन्त तेजस्वी और भयंकर था। उससे वर्षाका वह सारा जल सूख गया ॥ ८ ॥
हतेऽश्मवर्षे च मया जलवर्षे च शोषिते ।
मुमुचुर्दानवा मायामग्निं वायुं च भारत ॥ ९ ॥
भारत! जब मैंने पत्थरोंकी वर्षा शान्त कर दी और पानीकी वर्षाको भी सोख लिया, तब दानवलोग मुझपर मायामय अग्नि और वायुका प्रयोग करने लगे ॥ ९ ॥
ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः ।
शैलेन च महास्त्रेण वायोर्वेगमधारयम् ॥ १० ॥
फिर तो मैंने वारुणास्त्रसे वह सारी आग बुझा दी और महान् शैलास्त्रका प्रयोग करके मायामय वायुका वेग कुण्ठित कर दिया ॥ १० ॥
तस्यां प्रतिहतायां ते दानवा युद्धदुर्मदाः ।
प्राकुर्वन् विविधां मायां यौगपद्येन भारत ॥ ११ ॥
भारत! उस मायाका निवारण हो जानेपर वे रणोन्मत्त दानव एक ही समय अनेक प्रकारकी मायाका प्रयोग करने लगे ॥ ११ ॥
ततो वर्षं प्रादुरभूत् सुमहल्लोमहर्षणम् ।
अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वायोस्तथाश्मनाम् ॥ १२ ॥
फिर तो भयानक अस्त्रोंकी तथा अग्नि, वायु और पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी ॥ १२ ॥
सा तु मायामयी वृष्टिः पीडयामास मां युधि ।
अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १३ ॥
उस मायामयी वर्षाने युद्धमें मुझे बड़ी पीड़ा दी। तदनन्तर चारों ओर महाभयानक अन्धकार छा गया ॥ १३ ॥
तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च ।
हरयो विमुखाश्चासन् प्रास्खलच्चापि मातलिः ॥ १४ ॥
घोर एवं दुःसह तिमिरराशिसे सम्पूर्ण लोकोंके आच्छादित हो जानेपर मेरे रथके घोड़े युद्धसे विमुख हो गये और मातलि भी लड़खड़ाने लगे ॥ १४ ॥
हस्ताद्धि रश्मयश्चास्य प्रतोदः प्रापतद् भुवि ।
असकृच्चाह मां भीतः क्वासीति भरतर्षभ ॥ १५ ॥
उनके हाथसे घोड़ोंके लगाम और चाबुक पृथ्वीपर गिर पड़े और वे भयभीत होकर बार-बार मुझसे पूछने लगे— 'भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तुम कहाँ हो?' ॥ १५ ॥
मां च भीराविशत् तीव्रा तस्मिन् विगतचेतसि ।
स च मां विगतज्ञानः संत्रस्तमिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥
मातलिके बेसुध होनेपर मेरे मनमें भी अत्यन्त भय समा गया। तब सुध-बुध खोये हुए मातलिने मुझ भयभीत योद्धासे इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥
सुराणामसुराणां च संग्रामः सुमहानभूत् ।
अमृतार्थं पुरा पार्थ स च दृष्टो मयानघ ॥ १७ ॥
'निष्पाप कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओं और दैत्योंमें अत्यन्त घोर संग्राम हुआ था, जिसे मैंने अपनी आँखों देखा है ॥ १७ ॥
शम्बरस्य वधे घोरः संग्रामः सुमहानभूत् ।
सारथ्यं देवराजस्य तत्रापि कृतवानहम् ॥ १८ ॥
'शम्बरासुरके वधके समय भी अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ था। उसमें भी मैंने देवराज इन्द्रके सारथिका कार्य सँभाला था ॥ १८ ॥
तथैव वृत्रस्य वधे संगृहीता हया मया ।
वैरोचनेर्महायुद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ॥ १९ ॥
'इसी प्रकार वृत्रासुरके वधके समय भी मैंने ही घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ली थी। विरोचनकुमार बलिका अत्यन्त भयंकर महासंग्राम भी मेरा देखा हुआ है ॥ १९ ॥
एते मया महाघोराः संग्रामाः पर्युपासिताः ।
न चापि विगतज्ञानोऽभूतपूर्वोऽस्मि पाण्डव ॥ २० ॥
'ये बड़े-बड़े भयानक युद्ध मैंने देखे हैं, उनमें भाग लिया है, परंतु पाण्डुनन्दन! आजसे पहले कभी भी मैं इस प्रकार अचेत नहीं हुआ था ॥ २० ॥
पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् ।
न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षयात् ॥ २१ ॥
'जान पड़ता है, विधाताने आज समस्त प्रजाका संहार निश्चित किया है, अवश्य ऐसी ही बात है। जगत्के संहारके अतिरिक्त अन्य समयमें ऐसे भयानक युद्धका होना सम्भव नहीं है' ॥ २१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
मोहयिष्यन् दानवानामहं मायाबलं महत् ॥ २२ ॥
अब्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजयोर्बलम् ।
अस्त्राणां च प्रभावं वै धनुषो गाण्डिवस्य च ॥ २३ ॥
अद्यास्त्रमाययैतेषां मायामेतां सुदारुणाम् ।
विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ॥ २४ ॥
मातलिका यह वचन सुनकर मैंने स्वयं ही अपने-आपको सँभाला और दानवोंके उस महान् मायाबलका निवारण करते हुए भयभीत मातलिसे कहा—‘सूत! आप डरें मत। स्थिरतापूर्वक रथपर बैठे रहें और देखें, मेरी इन भुजाओंमें कितना बल है? मेरे गाण्डीव धनुष तथा अस्त्रोंका कैसा प्रभाव है? आज मैं अपने अस्त्रोंकी मायासे इन दानवोंकी इस भयंकर माया तथा घोर अन्धकारका विनाश किये देता हूँ’ ॥ २२—२४ ॥
एवमुक्त्वाहमसृजमस्त्रमायां नराधिप ।
मोहिनीं सर्वभूतानां हिताय त्रिदिवौकसाम् ॥ २५ ॥
नरेश्वर! ऐसा कहकर मैंने देवताओंके हितके लिये अस्त्रसम्बन्धिनी मायाकी सृष्टि की, जो समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली थी ॥ २५ ॥
पीड्यमानासु मायासु तासु तास्वसुरोत्तमाः ।
पुनर्बहुविधा मायाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ॥ २६ ॥
उससे असुरोंकी वे सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं। तब उन अमित तेजस्वी दानवराजाओंने पुनः नाना प्रकारकी मायाएँ प्रकट कीं ॥ २६ ॥
पुनः प्रकाशमभवत् तमसा ग्रस्यते पुनः ।
भवत्यदर्शनो लोकः पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥
इससे कभी तो प्रकाश छा जाता था और कभी सब कुछ अन्धकारमें विलीन हो जाता था। कभी सम्पूर्ण जगत् अदृश्य हो जाता और कभी जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥
सुसंगृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः ।
व्यचरत् स्यन्दनाग्र्येण संग्रामे लोमहर्षणे ॥ २८ ॥
तदनन्तर प्रकाश होनेपर मातलिने घोड़ोंको काबूमें करके अपने श्रेष्ठ रथके द्वारा उस रोमांचकारी संग्राममें विचरना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥
ततः पर्यपतन्नुग्रा निवातकवचा मयि ।
तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्वं यमसादनम् ॥ २९ ॥
तब भयानक निवातकवच चारों ओरसे मेरे ऊपर टूट पड़े। उस समय मैंने अवसर देख-देखकर उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ २९ ॥
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके ।
नापश्यं सहसा सर्वान् दानवान् माययाऽऽवृतान् ॥ ३० ॥
वह युद्ध निवातकवचोंके लिये विनाशकारी था। अभी युद्ध हो ही रहा था कि सहसा सारे दानव अन्तर्धानी मायासे छिप गये। अतः मैं किसीको भी देख न सका ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि मायायुद्धे एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें मायायुद्धविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७१ ।।
* कोशोंमें 'अक्ष' शब्दका अर्थ 'सर्प' भी मिलता है।