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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 93)

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अष्टमोऽध्यायः

व्यासजीका धृतराष्ट्रसे दुर्योधनके अन्यायको रोकनेके लिये अनुरोध

व्यास उवाच

धृतराष्ट्र महाप्राज्ञ निबोध वचनं मम ।
वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम् ॥ १ ॥
व्यासजीने कहा— महाप्राज्ञ धृतराष्ट्र! तुम मेरी बात सुनो, मैं तुम्हें समस्त कौरवोंके हितकी उत्तम बात बताता हूँ ॥ १ ॥

न मे प्रियं महाबाहो यद् गताः पाण्डवा वनम् ।
निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमैः ॥ २ ॥
महाबाहो! पाण्डवलोग जो वनमें भेजे गये हैं, यह मुझे अच्छा नहीं लगा है। दुर्योधन आदिने उन्हें छलपूर्वक जूएमें हराया है ॥ २ ॥

ते स्मरन्तः परिक्लेशान् वर्षे पूर्णे त्रयोदशे ।
विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धाः कौरवेयेषु भारत ॥ ३ ॥
भारत! वे तेरहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर अपनेको दिये हुए क्लेश याद करके कुपित हो कौरवोंपर विष उगलेंगे, अर्थात् विषके समान घातक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करेंगे ॥ ३ ॥

तदयं किं नु पापात्मा तव पुत्रः सुमन्दधीः ।
पाण्डवान् नित्यसंक्रुद्धो राज्यहेतोर्जिघांसति ॥ ४ ॥
ऐसा जानते हुए भी तुम्हारा यह पापात्मा एवं मूर्ख पुत्र क्यों सदा रोषमें भरा रहकर राज्यके लिये पाण्डवोंका वध करना चाहता है ॥ ४ ॥

वार्यतां साध्वयं मूढः शमं गच्छतु ते सुतः ।
वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन् प्राणान् विमोक्ष्यति ॥ ५ ॥
तुम इस मूढ़को रोको। तुम्हारा यह पुत्र शान्त हो जाय। यदि इसने वनवासी पाण्डवोंको मार डालनेकी इच्छा की तो यह स्वयं ही अपने प्राणोंको खो बैठेगा ॥ ५ ॥

यथा हि विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम् ।
यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधुर्भवानपि ॥ ६ ॥
जैसे ज्ञानी विदुर, भीष्म, मैं, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य हैं, वैसे ही साधुस्वभाव तुम भी हो ॥ ६ ॥

विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितः ।
अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन् प्रतिपद्यताम् ॥ ७ ॥

महाप्राज्ञ! स्वजनोंके साथ कलह अत्यन्त निन्दित माना गया है। वह अधर्म एवं अयश बढ़ानेवाला है; अतः राजन्! तुम स्वजनोंके साथ कलहमें न पड़ो ॥ ७ ॥
समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान् प्रति भारत ।
उपेक्ष्यमाणा सा राजन् महान्तमनयं स्पृशेत् ॥ ८ ॥
भारत! पाण्डवोंके प्रति इस दुर्योधनका जैसा विचार है, यदि उसकी उपेक्षा की गयी—उसका शमन न किया गया तो उसका वह विचार महान् अत्याचारकी सृष्टि कर सकता है ॥ ८ ॥
अथवायं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः ।
पाण्डवैः सहितो राजन्नेक एवासहायवान् ॥ ९ ॥
अथवा तुम्हारा यह मन्दबुद्धि पुत्र अकेला ही दूसरे किसी सहायकको लिये बिना पाण्डवोंके साथ वनमें जाय ॥ ९ ॥
ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः ।
यदि स्यात् कृतकार्योऽद्य भवेस्त्वं मनुजेश्वर ॥ १० ॥
मनुजेश्वर! वहाँ पाण्डवोंके संसर्गमें रहनेसे तुम्हारे पुत्रके प्रति उनके हृदयमें स्नेह हो जाय, तो तुम आज ही कृतार्थ हो जाओगे ॥ १० ॥
अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते ।
श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति ॥ ११ ॥
कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा।
भवान् वात्र क्षमं कार्यं पुरा वोऽर्थोऽभिवर्धते ॥ १२ ॥
किंतु महाराज! जन्मके समय किसी वस्तुका जैसा स्वभाव बन जाता है वह दूर नहीं होता। भले ही वह वस्तु अमृत ही क्यों न हो? यह बात मेरे सुननेमें आयी है। अथवा इस विषयमें भीष्म, द्रोण, विदुर या तुम्हारी क्या सम्मति है? यहाँ जो उचित हो, वह कार्य पहले करना चाहिये, उसीसे तुम्हारे प्रयोजनकी सिद्धि हो सकती है ॥ ११-१२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें व्यासवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥