महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 754)
वासुदेवेति यं प्राहुः कपिलं मुनिपुङ्गवम् ।
स चक्षुर्विकृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन् ।। ३२ ।।
ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन् स सागरान् ।
मुनिप्रवर कपिल वे ही भगवान् विष्णु हैं जिन्हें वासुदेव कहते हैं। उन महातेजस्वीने विकराल आँखें करके अपना तेज उनपर छोड़ दिया और मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंको जला दिया ।। ३२ ½ ।।
तान् दृष्ट्वा भस्मसाद् भूतान् नारदः सुमहातपाः ।। ३३ ।।
सगरान्तिकमागच्छत् तच्च तस्मै न्यवेदयत् ।
स तच्छ्रुत्वा वचो घोरं राजा मुनिमुखोद्गतम् ।। ३४ ।।
मुहूर्तं विमना भूत्वा स्थाणोर्वाक्यमचिन्तयत् ।
(स पुत्रनिधनोद्भूतदुःखेन समभिप्लुतः ।
आत्मानमात्मनाऽऽश्वास्य हयमेवान्वचिन्तयत् ।।)
अंशुमन्तं समाहूय असमञ्जःसुतं तदा ।। ३५ ।।
पौत्रं भरतशार्दूल इदं वचनमब्रवीत् ।
षष्टिस्तानि सहस्राणि पुत्राणाममितौजसाम् ।। ३६ ।।
कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः ।
तव चापि पिता तात परित्यक्तो मयानघ ।
धर्मं संरक्षमाणेन पौराणां हितमिच्छता ॥ ३७ ॥
उन्हें भस्म हुआ देख महातपस्वी नारदजी राजा सगरके समीप आये और उनसे सब समाचार निवेदित किया। मुनिके मुखसे निकले हुए इस घोर वचनको सुनकर राजा सगर दो घड़ीतक अनमने हो महादेवजीके कथनपर विचार करते रहे। पुत्रकी मृत्युजनित वेदनासे अत्यन्त दुखी हो स्वयं ही अपने-आपको सान्त्वना दे उन्होंने अश्वको ही ढूँढनेका विचार किया। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर असमञ्जसके पुत्र अपने पौत्र अंशुमान्को बुलाकर यह बात कही—'तात! मेरे अमिततेजस्वी साठ हजार पुत्र मेरे ही लिये महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निमें पड़कर नष्ट हो गये। अनघ! पुरवासियोंके हितकी रक्षा रखकर धर्मकी रक्षा करते हुए मैंने तुम्हारे पिताको भी त्याग दिया है' ॥ ३३—३७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं राजशार्दूलः सगरः पुत्रमात्मजम् ।
त्यक्तवान् दुस्त्यजं वीरं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ ३८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—तपोधन! नृपश्रेष्ठ सगरने किसलिये अपने दुस्त्यज वीर पुत्रका त्याग किया था, यह मुझे बताइये ॥ ३८ ॥
लोमश उवाच
असमञ्जा इति ख्यातः सगरस्य सुतो ह्यभूत् ।
यं शैब्या जनयामास पौराणां स हि दारकान् ॥ ३९ ॥
(क्रीडतः सहसाऽऽसाद्य तत्र तत्र महीपते ।)
गलेषु क्रोशतो गृह्य नद्यां चिक्षेप दुर्बलान् ।
ततः पौराः समाजग्मुर्भयशोकपरिप्लुताः ॥ ४० ॥
सगरं चाभ्यभाषन्त सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ।
त्वं नस्त्राता महाराज परचक्रादिभिर्भयात् ॥ ४१ ॥
लोमशजीने कहा—राजन्! सगरका वह पुत्र जिसे रानी शैब्याने उत्पन्न किया था, असमञ्जसके नामसे विख्यात हुआ। वह जहाँ-तहाँ खेल-कूदमें लगे हुए पुरवासियोंके दुर्बल बालकोंके समीप सहसा पहुँच जाता और चीखते-चिल्लाते रहनेपर भी उनका गला पकड़कर उन्हें नदीमें फेंक देता था। तब समस्त पुरवासी भय और शोकमें मग्न हो राजा सगरके पास आये और हाथ जोड़े खड़े हो इस प्रकार कहने लगे—'महाराज! आप शत्रुसेना आदिके भयसे हमारी रक्षा करनेवाले हैं ॥ ३९—४१ ॥
असमञ्जोभयाद् घोरात् ततो नस्त्रातुमर्हसि ।
पौराणां वचनं श्रुत्वा घोरं नृपतिसत्तमः ॥ ४२ ॥
मुहूर्तं विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् ।
असमञ्जाः पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम् ॥ ४३ ॥
‘अतः असमंजसके घोर भयसे आप हमारी रक्षा करें!’ पुरवासियोंका यह भयंकर वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सगर दो घड़ीतक अनमने होकर बैठे रहे। फिर मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले—‘आज मेरे पुत्र असमंजसको मेरे घरसे बाहर निकाल दो’ ॥ ४२-४३ ॥
यदि वो मत्प्रियं कार्यमेतच्छीघ्रं विधीयताम् ।
एवमुक्ता नरेन्द्रेण सचिवास्ते नराधिप ॥ ४४ ॥
यथोक्तं त्वरिताश्चक्रुर्यथाऽऽज्ञापितवान् नृपः ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा पुत्रो महात्मना ॥ ४५ ॥
पौराणां हितकामेन सगरेण विवासितः ।
अंशुमांस्तु महेष्वासो यदुक्तः सगरेण हि ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ४६ ॥
‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है तो मेरी इस आज्ञाका शीघ्र पालन होना चाहिये।’ राजन्! महाराज सगरके ऐसा कहनेपर मन्त्रियोंने शीघ्र वैसा ही किया, जैसा उनका आदेश था। युधिष्ठिर! पुरवासियोंके हित चाहनेवाले महात्मा सगरने जिस प्रकार अपने पुत्रको निर्वासित किया था, वह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया। अब महाधनुर्धर अंशुमान्से राजा सगरने जो कुछ कहा, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, मेरे मुखसे सुनो ॥ ४४—४६ ॥
सगर उवाच
पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च ।
अलाभेन तथाश्वस्य परितप्यामि पुत्रक ॥ ४७ ॥
**सगर बोले—**बेटा! तुम्हारे पिताको त्याग देनेसे, अन्य पुत्रोंकी मृत्यु हो जानेसे तथा यज्ञसम्बन्धी अश्वके न मिलनेसे मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥ ४७ ॥
तस्माद् दुःखाभिसंतप्तं यज्ञविघ्नाच्च मोहितम् ।
हयस्यानयनात् पौत्र नरकान्मां समुद्धर ॥ ४८ ॥
अतः पौत्र! यज्ञमें विघ्न पड़ जानेसे मैं मोहित और दुःखसे संतप्त हूँ। तुम अश्वको ले आकर नरकसे मेरा उद्धार करो ॥ ४८ ॥
अंशुमानेवमुक्तस्तु सगरेण महात्मना ।
जगाम दुःखार्त् तं देशं यत्र वै दारिता मही ॥ ४९ ॥
महात्मा सगरके ऐसा कहनेपर अंशुमान् बड़े दुःखसे उस स्थानपर गये जहाँ पृथ्वी विदीर्ण की गयी थी ॥ ४९ ॥
स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह ।
अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ॥ ५० ॥
उन्होंने उसी मार्गसे समुद्रमें प्रवेश किया और महात्मा कपिल तथा यज्ञिय अश्वको देखा ।। ५० ।।
स दृष्ट्वा तेजसो राशिं पुराणमृषिसत्तमम् ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदयत् ।। ५१ ।।
तेजोराशि मुनिप्रवर पुराणपुरुष कपिलजीका दर्शन करके अंशुमान्ने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया और उनसे अपना कार्य बताया ।। ५१ ।।
ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् ।
उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत ।। ५२ ।।
भरतवंशी महाराज! इससे धर्मात्मा कपिलजी अंशुमान्पर प्रसन्न हो गये और बोले—'मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ' ।। ५२ ।।
स वव्रे तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् ।
द्वितीयं वरकं वव्रे पितॄणां पावनेच्छया ।। ५३ ।।
अंशुमान्ने पहले तो यज्ञकार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ उस अश्वके लिये प्रार्थना की और दूसरा वर अपने पितरोंको पवित्र करनेकी इच्छासे माँगा ।। ५३ ।।
तमुवाच महातेजाः कपिलो मुनिपुङ्गवः ।
ददानि तव भद्रं ते यद् यत् प्रार्थयसेऽनघ ।। ५४ ।।
त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम् ।
त्वया कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वया पिता ॥ ५५ ॥
तब मुनिश्रेष्ठ महातेजस्वी कपिलने अंशुमान्से कहा—'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जो कुछ माँगते हो वह सब तुम्हें दूँगा। तुममें क्षमा, धर्म और सत्य सब कुछ प्रतिष्ठित है। तुम-जैसे पौत्रको पाकर राजा सगर कृतार्थ हैं और तुम्हारे पिता तुम्हींसे वस्तुतः पुत्रवान् हैं ॥ ५४-५५ ॥
तव चैव प्रभावेण स्वर्गं यास्यन्ति सागराः ।
(शलभत्वं गता ह्येते मम क्रोधहुताशने ।)
पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति ॥ ५६ ॥
पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम् ।
हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव ॥ ५७ ॥
'तुम्हारे ही प्रभावसे सगरके सारे पुत्र जो मेरी क्रोधाग्निमें शलभकी भाँति भस्म हो गये हैं, स्वर्गलोकमें चले जायँगे। तुम्हारा पौत्र भगवान् शंकरको संतुष्ट करके सगरपुत्रोंको पवित्र करनेके लिये स्वर्गलोकसे यहाँ गंगाजीको ले आयेगा। नरश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो। तुम इस यज्ञिय अश्वको ले जाओ ॥ ५६-५७ ॥
यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः ।
अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना ॥ ५८ ॥
आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मनः ।
सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः ॥ ५९ ॥
मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् ।
यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा ॥ ६० ॥
तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् ।
तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् ॥ ६१ ॥
'तात! महात्मा सगरका यज्ञ पूर्ण करो।' महात्मा कपिलके ऐसा कहनेपर अंशुमान् उस अश्वको लेकर महामना सगरके यज्ञमण्डपमें आये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उनसे सब समाचार निवेदन किया। सगरने भी स्नेहसे अंशुमान्का मस्तक सूँघा। अंशुमान्ने सगर-पुत्रोंका विनाश जैसा देखा और सुना था, वह सब बताया, साथ ही यह भी कहा कि 'यज्ञिय अश्व यज्ञमण्डपमें आ गया है।' यह सुनकर राजा सगरने पुत्रोंके मरनेका दुःख त्याग दिया ॥ ५८—६१ ॥
अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं क्रतुम् ।
समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वैः सभाजितः ॥ ६२ ॥
और अंशुमान्की प्रशंसा करते हुए अपने उस यज्ञको पूर्ण किया। यज्ञ पूर्ण हो जानेपर सब देवताओंने सगरका बड़ा सत्कार किया ॥ ६२ ॥
पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् ।
प्रशास्य सुचिरं कालं राज्यं राजीवलोचनः ॥ ६३ ॥
पौत्रे भारं समावेश्य जगाम त्रिदिवं तदा ।
अंशुमानपि धर्मात्मा महीं सागरमेखलाम् ॥ ६४ ॥
प्रशशास महाराज यथैवास्य पितामहः ।
तस्य पुत्रः समभवद् दिलीपो नाम धर्मवित् ॥ ६५ ॥
कमलके समान नेत्रोंवाले सगरने वरुणालय समुद्रको अपना पुत्र माना और दीर्घकालतक राज्यशासन करके अन्तमें अपने पौत्र अंशुमान्पर राज्यका सारा भार रखकर वे स्वर्गलोकको चले गये। महाराज! धर्मात्मा अंशुमान् भी अपने पितामहसगरके समान ही समुद्रसे घिरी हुई इस वसुधाका पालन करते रहे। उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम दिलीप था। वह भी धर्मका ज्ञाता था ॥ ६३-६५ ॥
तस्मै राज्यं समाधाय अंशुमानपि संस्थितः ।
दिलीपस्तु ततः श्रुत्वा पितॄणां निधनं महत् ॥ ६६ ॥
पर्यतप्यत दुःखेन तेषां गतिमचिन्तयत् ।
गङ्गावतरणे यत्नं सुमहच्चाकरोन्नृपः ॥ ६७ ॥
दिलीपको राज्य देकर अंशुमान् भी परलोक-वासी हुए। दिलीपके जब अपने पितरोंके महान् संहारका समाचार सुना, तब वे दुःखसे संतप्त हो उठे और उनकी सद्गतिका उपाय सोचने लगे। राजा दिलीपने गङ्गाजीको इस भूतलपर उतारनेके लिये महान् प्रयत्न किया ॥ ६६-६७ ॥
न चावतारयामास चेष्टमानो यथाबलम् ।
तस्य पुत्रः समभवच्छ्रीमान् धर्मपरायणः ॥ ६८ ॥
भगीरथ इति ख्यातः सत्यवागनसूयकः ।
अभिषिच्य तु तं राज्ये दिलीपो वनमाश्रितः ॥ ६९ ॥
(भगीरथं महात्मानं सत्यधर्मपरायणम् ।)
यथाशक्ति चेष्टा करनेपर भी वे गंगाको पृथ्वीपर उतार न सके। दिलीपके भगीरथ नामसे विख्यात एक पुत्र हुआ जो परम कान्तिमान्, धर्मपरायण, सत्यवादी और अदोषदर्शी था। सत्यधर्मपरायण महात्मा भगीरथका राज्याभिषेक करके दिलीप वनमें चले गये ॥ ६८-६९ ॥
तपःसिद्धिसमायोगात् स राजा भरतर्षभ ।
वनाज्जगाम त्रिदिवं कालयोगेन भारत ॥ ७० ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा दिलीप तपस्याजनक सिद्धिसे संयुक्त हो अन्तकाल आनेपर वनसे स्वर्गलोकको चले गये ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि
लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
अगस्त्यमाहात्म्यवर्णनविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७३ १/३ श्लोक हैं)