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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 677)

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त्रिनवतितमोऽध्यायः

ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रयान्तं कौन्तेयं ब्राह्मणा वनवासिनः ।
अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमब्रुवन् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको तीर्थयात्राके लिये उद्यत जान काम्य-कवनके निवासी ब्राह्मण उनके निकट आकर इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

राजंस्तीर्थानि गन्तासि पुण्यानि भ्रातृभिः सह ।
ऋषिणा चैव सहितो लोमशेन महात्मना ॥ २ ॥
‘महाराज! आप अपने भाइयों तथा महात्मा लोमश मुनिके साथ पुण्यतीर्थोंमें जानेवाले हैं ॥ २ ॥

अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव ।
अस्माभिर्हि न शक्यानि त्वदृते तानि कौरव ॥ ३ ॥
‘कुरुकुलतिलक पाण्डुनन्दन! हमें भी अपने साथ ले चलें। महाराज! आपके बिना हमलोग उन तीर्थोंकी यात्रा नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

श्वापदैरुपसृष्टानि दुर्गाणि विषमाणि च ।
अगम्यानि नरैरल्पैस्तीर्थानि मनुजेश्वर ॥ ४ ॥
‘मनुजेश्वर! वे सभी तीर्थ हिंसक जन्तुओंसे भरे पड़े हैं। दुर्गम और विषम भी हैं। थोड़े-से मनुष्य वहाँकी यात्रा नहीं कर सकते ॥ ४ ॥

भवतो भ्रातरः शूरा धनुर्धरवराः सदा ।
भवद्भिः पालिताः शूरैर्गच्छामो वयमप्युत ॥ ५ ॥
‘आपके भाई शूरवीर हैं और सदा श्रेष्ठ धनुष धारण किये रहते हैं। आप-जैसे शूरवीरोंसे सुरक्षित होकर हम भी उन तीर्थोंकी यात्रा पूरी कर लेंगे ।। ५ ।।
भवत्प्रसादाद्धि वयं प्राप्नुयाम सुखं फलम् ।
तीर्थानां पृथिवीपाल वनानां च विशाम्पते ॥ ६ ॥
‘भूपाल! प्रजानाथ! आपके प्रसादसे हमलोग भी उन तीर्थों और वनोंकी यात्राका फल अनायास ही पा लेंगे ।। ६ ।।
तव वीर्यपरित्राताः शुद्धास्तीर्थपरिप्लुताः ।
भवेम धूतपाप्मानस्तीर्थसंदर्शनान्नृप ॥ ७ ॥
‘नरेश्वर! आपके बल-पराक्रमसे सुरक्षित हो हम भी तीर्थोंमें स्नान करके शुद्ध हो जायँगे और उन तीर्थोंके दर्शनसे हमारे सब पाप धुल जायँगे ।। ७ ।।
भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भारत ।
अष्टकस्य च राजर्षेर्लोमपादस्य चैव ह ॥ ८ ॥
भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव ।

ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ॥ ९ ॥
‘भूपाल! भरतनन्दन! आप भी तीर्थोंमें नहाकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षि अष्टक, लोमपाद और भूमण्डलमें सर्वत्र विदित सम्राट् वीरवर भरतको मिलनेवाले दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त कर लेंगे ।। ८-९ ।।

प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् ।
गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन् ॥ १० ॥
त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ।
यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित् प्रीतिर्जनाधिप ॥ ११ ॥
कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ।
‘महीपाल! प्रभास आदि तीर्थों, महेन्द्र आदि पर्वतों, गंगा आदि नदियों तथा प्लक्ष आदि वृक्षोंका हम आपके साथ दर्शन करना चाहते हैं। जनेश्वर! यदि आपके मनमें ब्राह्मणोंके प्रति कुछ प्रेम है तो आप हमारी बात शीघ्र मान लीजिये; इससे आपका कल्याण होगा ।। १०-११ १/२ ।।

तीर्थानि हि महाबाहो तपोविघ्नकरैः सदा ॥ १२ ॥
अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि ।
‘महाबाहो! तपस्यामें विघ्न डालनेवाले बहुत-से राक्षस उन तीर्थोंमें भरे पड़े हैं, उनसे आप हमारी रक्षा करनेमें समर्थ हैं' ।। १२ १/२ ।।

तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता ॥ १३ ॥
यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः ।
विधिवत् तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप ॥ १४ ॥
धूतपाप्मा सहास्माभिर्लोमशेनाभिपालितः ।
‘नरेश्वर! आप पापरहित हैं, धौम्य मुनि, परम बुद्धिमान् नारदजी तथा महातपस्वी देवर्षि लोमशने जिन-जिन तीर्थोंका वर्णन किया है, उन सबमें आप महर्षि लोमशजीसे सुरक्षित हो हमारे साथ विधिपूर्वक भ्रमण करें' ।। १३-१४ १/२ ।।

स राजा पूज्यमानस्तैर्हर्षादश्रुपरिप्लुतः ॥ १५ ॥
भीमसेनादिभिर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारितः ।
बाढमित्यब्रवीत् सर्वांस्तानृषीन् पाण्डवर्षभः ॥ १६ ॥
लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् ।
पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने वीर भ्राता भीमसेन आदिसे घिरकर खड़े थे। उन ब्राह्मणोंद्वारा इस प्रकार सम्मानित होनेपर उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भर आये। उन्होंने देवर्षि लोमश तथा पुरोहित धौम्यजीकी आज्ञा लेकर उन सब ऋषियोंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ।। १५-१६ १/२ ।।

ततः स पाण्डवश्रेष्ठो भ्रातृभिः सहितो वशी ॥ १७ ॥

द्रौपद्या चानवद्याङ्ग्या गमनाय मनो दधे ।
तदनन्तर मन-इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरने भाइयों तथा सुन्दर अंगोंवाली द्रौपदीके साथ यात्रा करनेका मन-ही-मन निश्चय किया ॥ १७ १/२ ॥
अथ व्यासो महाभागस्तथा पर्वतनारदौ ॥ १८ ॥
काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः ।
तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चक्रे यथाविधि ।
सत्कृतास्ते महाभाग युधिष्ठिरमथाब्रुवन् ॥ १९ ॥
इतनेहीमें महाभाग व्यास, पर्वत और नारद आदि मनीषीजन काम्यकवनमें पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये आये। राजा युधिष्ठिरने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। उनसे सत्कार पाकर वे महाभाग महर्षि महाराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले ॥ १८-१९ ॥

ऋषय ऊचुः
युधिष्ठिर यमौ भीम मनसा कुरुतार्जवम् ।
मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ ॥ २० ॥
ऋषियोंने कहा—युधिष्ठिर! भीमसेन! नकुल! और सहदेव! तुमलोग तीर्थोंके प्रति मनसे श्रद्धापूर्वक सरलभाव रखो। मनसे शुद्धिका सम्पादन करके शुद्धचित्त होकर तीर्थोंमें जाओ ॥ २० ॥
शरीरनियमं प्राहुर्ब्राह्मणा मानुषं व्रतम् ।
मनोविशुद्धां बुद्धिं च दैवमाहुर्व्रतं द्विजाः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणलोग शरीर-शुद्धिके नियमको 'मानुषव्रत' बताते हैं और मनके द्वारा शुद्ध की हुई बुद्धिको 'दैवव्रत' कहते हैं ॥ २१ ॥
मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप ।
मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ ॥ २२ ॥
नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है। सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो ॥ २२ ॥
ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमव्रतैः ।
दैवं व्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥ २३ ॥
तुम मानसिक और शारीरिक नियमव्रतोंसे शुद्ध हो। दैवव्रतका आश्रय ले यात्रा करोगे तो तीर्थोंका तुम्हें यथावत् फल प्राप्त होगा ॥ २३ ॥
ते तथेति प्रतिज्ञाय कृष्णया सह पाण्डवाः ।
कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे मुनिभिर्दिव्यमानुषैः ॥ २४ ॥
महर्षियोंके ऐसा कहनेपर द्रौपदीसहित पाण्डवोंने 'बहुत अच्छा' कहकर (उनकी आज्ञाएँ शिरोधार्य कीं और उनके बताये हुए नियमोंका पालन करनेकी) प्रतिज्ञा की।

तत्पश्चात् उन दिव्य और मानव महर्षियोंने उन सबके लिये स्वस्तिवाचन किया ॥ २४ ॥
लोमशस्योपसंगृह्य पादौ द्वैपायनस्य च ।
नारदस्य च राजेन्द्र देवर्षेः पर्वतस्य च ॥ २५ ॥
धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभिः ।
मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्ततः ॥ २६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर महर्षि लोमश, द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और पर्वतके चरणोंका स्पर्श करके वनवासी ब्राह्मणों, पुरोहित धौम्य और लोमश आदिके साथ वीर पाण्डव तीर्थयात्राके लिये निकले। मार्गशीर्षकी पूर्णिमा व्यतीत होनेपर जब पुष्य नक्षत्र आया तब उसी नक्षत्रमें उन्होंने यात्रा प्रारम्भ की ॥ २५-२६ ॥
कठिनानि समादाय चीराजिनजटाधराः ।
अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्ततः ॥ २७ ॥
उन सबने शरीरपर फटे-पुराने वस्त्र या मृगचर्म धारण कर रखे थे। उनके मस्तकपर जटाएँ थीं। उनके अंग अभेद्य कवचोंसे ढके हुए थे। वे सूर्यप्रदत्त बटलोई आदि पात्र लेकर वहाँ तीर्थोंमें विचरण करने लगे ॥ २७ ॥
इन्द्रसेनादिभिर्भृत्यै रथैः परिचतुर्दशैः ।
महानसव्यापृतैश्च तथान्यैः परिचारकैः ॥ २८ ॥
उनके साथ इन्द्रसेन आदि चौदहसे अधिक सेवक रथ लिये पीछे-पीछे जा रहे थे। रसोईके काममें संलग्न रहनेवाले अन्यान्य सेवक भी उनके साथ थे ॥ २८ ॥
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः ।
प्राङ्मुखाः प्रययुर्वीराः पाण्डवा जनमेजय ॥ २९ ॥
जनमेजय! वीर पाण्डव आवश्यक अस्त्र-शस्त्र ले कमरमें तलवार बाँधकर पीठपर तरकस कसे हुए हाथोंमें बाण लिये पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥