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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१६२ कथासरित्सागर

१६२ कथासरित्सागर
तन्मयावश्यगन्तव्यं प्राप्तुं तां राजकन्यकाम्।
इत्युक्त्वा स हयारूढः प्रतस्थे तत्क्षणं ततः ॥२७॥
अन्वगात् स च तं तूष्णीमनिच्छन्नपि गोमुखः।
अकुर्वन् वचनं भृत्योनुगम्यः परं प्रभुः ॥२८॥
तावद्वत्सेश्वरोऽप्यागात् कृताखेटो निजां पुरीम्।
मन्वानः स तमायान्तं सुतं स्वबलमध्यगम् ॥२९॥
स्वबलं तच्च तस्यागात् मरुभूत्यादिभिः सह।
पुरीं तामेव मत्वा तं सैन्यमध्यस्थितं प्रभुम् ॥३०॥
तत्र प्राप्ता विचिन्वन्तस्ते बुद्ध्वा तमनागतम्।
वत्सेश्वरादयो जग्मुः सर्वे रत्नप्रभान्तिकम् ॥३१॥
सा चादौ तच्छ्रुतवार्ता ध्यात्वा निजविद्यया।
आख्यातमितोदन्ता खिन्नं श्वशुरमब्रवीत् ॥३२॥
कर्पूरिकां राजसुतां तापस्या कथितां वने।
आर्यपुत्रो गतः प्राप्तुं पुरं कर्पूरसम्भवम् ॥३३॥
शीघ्रं च कृतकार्यं सन्निहैष्यति सगोमुखः।
तदलं चिन्तयैतद्धि विद्यातोऽधिगतं मया ॥३४॥
इत्युक्त्वाऽश्वासयत्सा तं वत्सेशं सपरिच्छदम्।
रत्नप्रभा या विद्यां च भर्तुः प्रायुङ्क्त तस्य सा ॥३५॥
नरवाहनदत्तस्य पथि क्लेशोपशान्तये।
नेर्ष्या भर्तृहितैषिण्यो गणयन्ति हि सुस्त्रियः ॥३६॥
तावच्च दूरमध्वानं स ययौ वाजिपृष्ठगः।
नरवाहनदत्तोऽस्यामटव्यां गोमुखान्वितः ॥३७॥
अथाकस्मादुपेतयात्र कुमारी पथ्युवाच तम्।
अहं मायावती नाम विद्या रत्नप्रभेरिता ॥३८॥
रक्षाम्यदृश्या मार्गे त्वां निश्चिन्तस्तद्व्रजाधुना।
इत्युक्त्वा रूपिणी विद्या तिरोऽभूत् साऽस्य पश्यतः ॥३९॥
तत्प्रभावात् ततः शान्तक्षुत्तृष्णः पथि स व्रजन्।
नरवाहनदत्तस्तां स्तुवन् रत्नप्रभां प्रियाम् ॥४०॥
सायं स्वच्छसरः प्राप्य वने स्वादुतरैः फलैः।
जलैश्चाहारपानादि स्नातश्चक्रे सगोमुखः ॥४१॥

इसलिए, मुझे उसे प्राप्त करने के लिए अवश्य जाना पड़ेगा। ऐसा कहकर घोड़े पर चढ़
कर युवराज आगे चल पड़ा ॥२७॥
वह गोमुख न चाहता हुआ भी उसके पीछे चल पड़ा। कहना न माननेवाले स्वामी का
भी सेवकों को विवश होकर अनुगमन करना ही चाहिए ॥२८॥
उधर वत्सराज भी शिकार खेलकर अपनी नगरी को लौटा। वह समझ रहा था कि सेना
आदि के मध्य युवराज भी आया होगा। नगरी में पहुँचकर महल पर जब युवराज का पता
नहीं चला। तब वे उदयन आदि सब रत्नप्रभा के समीप गये ॥ २९॥
पहले तो रत्नप्रभा भी व्याकुल हुई किन्तु अपनी विद्या में ध्यान देकर उसके द्वारा अपने
प्रिय का समाचार जानकर व्याकुल श्वशुर से बोली ॥३०॥
वन में किसी तपस्विनी द्वारा कर्पूरिका नाम की राजकुमारी का पता पाकर आर्यपुत्र
उसे प्राप्त करने के लिए कर्पूरसम्भव नामक नगर में गये हैं, इसलिए आप लोग चिन्ता न
करें। यह मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से जाना है ॥३१-३४॥
ऐसा कहकर रत्नप्रभा ने परिवार-सहित वत्सराज को शान्ति प्रदान
की ॥३५॥
और फिर, रत्नप्रभा ने दूसरी विद्या का प्रयोग किया कि मार्ग में नरवाहनदत्त को किसी
प्रकार का कष्ट न हो। पति का हित चाहनेवाली अच्छी स्त्रियाँ ईर्ष्या को हृदय में स्थान नहीं
देतीं ॥३६॥
इधर काठ की पीठ पर बैठा हुआ नरवाहनदत्त गोमुख के साथ जंगल का बहुत-सा
मार्ग पार कर गया ॥३७॥
तब अकस्मात् ही मार्ग में एक कुमारी ने आकर कहा—मैं मातङ्गी नाम
की विद्या हूँ। रत्नप्रभा द्वारा प्रेषित हूँ। मार्ग में अङ्गारक से तुम्हारी रक्षा करनी
है। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। ऐसा कहकर वह विद्या उसके देखते-देखते ही अदृश्य
हो गई ॥३८-३९॥
तब उस विद्या के प्रभाव से अन्धकार में रविनगर के लिए चल पड़ा और रत्नप्रभा की
प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त आगे चला ॥४०॥
सायंकाल वन में एक निर्मल तालाब दिखा। वहाँ नरवाहनदत्त ने गोमुख के साथ
उतर कर आह्निक शौचेन्द्रादि का आहार कर सन्ध्यावन्दनादि किया ॥४१॥