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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

दशम लम्बक १४७

दशम लम्बक १४७
तब मैंने स्नान करनेवाले अपने मित्र को हास्य-विनोद से डराने के लिए उस सर्प को
मन्त्र के बल से किनारे पर बाँध दिया ॥८७॥
स्नान करके तुरन्त किनारे पर आया हुआ मित्र निश्चल बैठे हुए उस सर्प को सहसा
देखकर मूर्च्छित हो गया ॥८८॥
मैंने ध्यान से यह जानकर चिरकाल के पश्चात् मित्र को चेतन किया। तब मेरे द्वारा
डराये गये उसन मित्र ज्ञान पर भी क्रोध से मुझे शाप दिया ॥८९॥
'जा तू भी ऐसा ही तीन फणोवाला साँप हो जा। मेर अनुनय-विनय पर उस मित्र ने
मेरे शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥९०॥
साप बनकर कूँएँ में गिरे हुए तुझे जो उबारेगा समय पर उसी का उपकार करके तू
शाप मुक्त होगा' ॥९१॥
इस प्रकार सर्प बने और कुएँ में गिरे हुए मुझे तुमने निकाला है। अब मैं जाता हूँ।
तुम्हारे स्मरण करने पर प्रत्युपकार करके मैं शाप से छूट जाऊँगा' ऐसा कहकर सर्प के चले
जाने पर उस स्त्री ने अपना वृत्तान्त सुनाया ॥९२-९३॥
दुष्टा स्त्री की आत्मकथा
मैं राजा के सेवक एक क्षत्रिय-पुत्र की भार्या हूँ। मेरा पति शूरवीर और त्यागी है।
युवा है, सुन्दर और आत्ममानी है ॥९४॥
तो भी पापिनी मैं ने दूसरे पुरुष का प्रणय कर लिया। यह जानकर मेरे पति ने मुझे
मारने का विचार किया ॥९५॥
अपनी एक सहेली से यह जानकर उसी समय मैं घर से भागी और रात को इस बन
में प्रवेश करके इस कुएँ में गिरी और तुमसे उबारी गई ॥९६॥
अब तुम्हारी ही कृपा से कहीं जाकर जीवन बिताती हूँ और वह दिन भी आय कि मैं
आपका प्रत्युपकार कर सकूँ। —बोधिसत्त्व से ऐसा कहकर वह दुष्टा वहाँ से घोषकर्दम नामक
राजा के नगर को गई और उसके परिवारवालों से मित्रता करके राजा की महारानी के पास
सेविका बनकर रहने लगी ॥९७-९९॥
उस स्त्री के साथ भाषण करने से उस बोधिसत्त्व की सिद्धि नष्ट हो जाने के कारण उस
बन में फल-मूलों की भी उत्पत्ति नष्ट हो गई ॥१००॥

ततः क्षुत्तृष्णया क्लान्तः प्राक्तं सिंहं समस्मरत्।
स्मृतागतः स चैतस्य व्यधाद्वृत्तिं मृगामिषैः ॥१०१॥
कञ्चित्कालं स तन्मांसैः प्रकृतिस्थं विधाय तम्।
केसरी सोऽब्रवीत् क्षीणः सशापो मे व्रजाम्यहम् ॥१०२॥
इत्युक्त्वा सिंहतां मुक्त्वा भूत्वा विद्याधरश्च सः।
जगाम तदनुज्ञातस्तमामन्त्र्य निजं पदम् ॥१०३॥
ततः स बोधिसत्त्वांशो वृत्तिम्लानः पुनः खगम्।
सस्मार स्वर्णचूडं तमुपागात् सोऽपि तत्स्मृतः ॥१०४॥
आवेदितार्तिस्तेनाऽसौ गत्वानीय खगः क्षणात्।
रत्नाभरणसम्पूर्णां ददौ तस्मै करण्डिकाम् ॥१०५॥
उवाच चैतेनार्थेन वृत्तिः स्याच्छाश्वती तव।
मम जातश्च शापान्तः स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥१०६॥
इत्युक्त्वा सोऽपि भूत्वैव विद्याधरकुमारकः।
स्वलोकं नभसा गत्वा प्राप राज्यं निजात् पितुः ॥१०७॥
सोऽपि रत्नानि विक्रेतुं बोधिसत्त्वः परिभ्रमन्।
तत्प्राप नगरं यत्र सा स्त्री कूपोद्धृता स्थिता ॥१०८॥
तत्रैकस्याश्च वृद्धाया ब्राह्मण्या विजने गृहे।
निधाय तान्याभरणान्यापणं यावदेति सः ॥१०९॥
तावद्ददर्श तामेव वने कूपात् समुद्धृताम्।
स्त्रियं सम्मुखमायान्तीं सापि स्त्री पश्यति स्म तम् ॥११०॥
सम्भाषणे श्रुतान्योन्यमथ सा स्त्री कथाक्रमात्।
स्वं राजमहिषीपार्श्वस्थितमस्मै न्यवेदयत् ॥१११॥
सोऽपि पृष्टस्ववृत्तान्तस्तया सत्यं शशंस ताम्।
रत्नाभरणसम्प्राप्तिं स्वर्णचूडखगाद्बहु ॥११२॥
नीत्वा चाभरणं तस्मै वृद्धावदमन्यदर्शयत्।
सापि गत्वा शठा राज्ञ्यै स्वस्वामिन्यै शशंस तत् ॥११३॥
तस्याश्च राज्ञ्या गृहान्तः स्वर्णचूलेन पक्षिणा।
नीतं छलेन पश्यन्त्या एवाभरणभाण्डकम् ॥११४॥
तच्च सा स्वपुरप्राप्तं राज्ञी तस्या मुखात् स्त्रियाः।
श्रुत्वा विदिततच्छाया राजानं तं न्यजिज्ञपत् ॥११५॥