कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक २९९
अष्टम लम्बक २९९
सखियों की बातें सुनकर महल्लिका बोली—'क्या तुमलोगों ने उसे देखा है और
क्या तुम्हारा मन उस पर आया है ? यह सुनकर वे सब बोलीं—'हाँ उस नयन से हम लोगों ने
देखा है। कौन ऐसी स्त्री है जिसका मन उसे देखकर हाथ से न निकल जाता हो ॥२९८ २९९॥
तब महल्लिका उनसे कहने लगी— यदि ऐसी बात है, तो मैं पिता से कहूँगी
कि वह तुम लोगों को भी उसके लिए दे दे। इससे तुम लोगों के साथ मेरा वियोग
भी न होगा और हम लोगों का सहवास भी बना रहेगा। ऐसा कहती हुई महल्लिका
से घबराई हुई सखियां बोलीं—'नहीं सखि ऐसा न करना। यह ठीक नहीं।
इससे हम लोगों को लज्जा है। ऐसा कहती हुई सखियों से असुरराज की कन्या फिर
बोली—॥३०-३२॥
'इसमें अनुचित क्या है? क्या उसे एकमात्र मुझसे ही विवाह करना है ? उसे सभी
दैत्यों और दानवों के राजा अपनी अपनी कन्याएँ देंगे और भी अनेक राजाओं की विवाहित कन्याएँ
मर्त्यलोक में हैं तथा बहुत-सी विद्याधर-कन्याओं से भी वह दग्गी विवाह करेगा ॥३ ३ ३ ४॥
उनके बीच तुम भी यदि उससे विवाहित हो जाओगी तो मेरी क्या हानि है, बल्कि हम
सब सखियाँ मिलकर आनन्द के साथ रहेंगी। तुम लोगों को लज्जा क्यों है यह सब तो
मैं कहूँगी ॥३ ५ ३ ६॥
तुम पर आसक्त चित्तवाली उसकी जब यह स्वतन्त्र बातचीत हो रही थी तब मैं उसी
अदृश्य रूप में तुम्हारे पास चला आया ॥३७॥
प्रहस्त के मुख से यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने शय्या पर जागते-जागते ही रात
बिताई ॥३८॥
प्रातः काल ही सुनीथ मय और सब मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ असुरराज प्रह्लाद से मिलने
के लिए उसकी सभा में गया ॥३९॥
तब दैत्यराज प्रह्लाद ने आदर के साथ सुनीथ से कहा—'मैं अपनी कन्या महल्लिका को
इस सूर्यप्रभ के लिए देता हूँ ॥४१ ॥
क्योंकि इसका भी आतिथ्य-सत्कार और तुम्हारा भी प्रिय मुझे करना है।' यह सुनकर
सुनीथ ने प्रह्लाद की बात का सादर समर्थन किया ॥४११॥
तदनन्तर, अपने प्रकाश से रत्न-स्तम्भो की कान्ति बढ़ाती हुई मध्य में जलती हुई विवाह-
वेदी पर सूर्यप्रभ को बैठाकर प्रह्लाद ने उसे अपनी कन्या महल्लिका दे दी ॥४१२ ४१३॥
महल्लिकां तां स्वसुतां प्रादात् सूर्यप्रभाय सः।
प्रह्लादात्सुरसाम्राज्यसमृद्धिमिवविभूतिभिः ॥३१३॥
ददौ सप्तलराधीशः स दुहित्रे वराय च।
त्रिदशावजयानीतान् सुमेरुशिखरोपमान् ॥३१४॥
तात ता अपि दत्स्वस्मै सखीर्मे द्वादश प्रियाः।
एव महल्लिका स्वैरं प्रह्लादं सा तदाब्रवीत् ॥३१५॥
पुत्रि मद्भ्रातृषीमास्तास्तेन बन्दीकृता यतः।
मम दातुं न युज्यन्ते इति सोऽपि जगाद ताम् ॥३१६॥
कृतोद्वाहोत्सवश्चास्मिन् याते सूर्यप्रभो दिने।
विवेश वासकं नक्तं स महल्लिकया सह ॥३१७॥
सर्वकामोपचाराढ्यं तत्र च सुरतोत्सवम्।
अनया समन.प्रीतिसौख्यं सोऽनुबभूव च ॥३१८॥
प्रातर्गतं च प्रह्लादं सभां तस्मिन् सहानुगे।
अभीलो दानवाधीशः प्रह्लादादीनभाषत ॥३१९॥
अद्य युष्माभिरखिलैरागन्तव्यं गृहे मम।
तत्रातिथ्यं यतः सूर्यप्रभस्यास्य करोम्यहम् ॥३२०॥
सुतां कसावतीं तस्मै ददामि यदि वा हितम्।
एतत्तद्वचनं सर्वे तथेति प्रतिपेदिरे ॥३२१॥
ततो द्वितीयं पातालमेतस्मिन्नेव क्षणे च ते।
सर्वे जग्मुः समं सूर्यप्रभेण समयादिना ॥३२२॥
तत्राभीलो ददौ तस्मै सुतां सूर्यप्रभाय ताम्।
कसावतीं प्रप्रियया दत्तारमानमपि स्वयम् ॥३२३॥
कृत्वा विवाहं प्रह्लादगृहे भुक्त्वासुरान्वितः।
निन्ये भोगापचारेण दिनं सूर्यप्रभाय तत् ॥३२४॥
द्वितीयेऽह्नि तथैवैतान् कुराहाख्योऽसुरेश्वरः।
निमन्त्र्य सर्वाननयत् पञ्चमं स्वरसातलम् ॥३२५॥
तत्र सूर्यप्रभाय स्वां नाम्ना च कुमुदावलीम्।
प्रादादुपगतातिथ्यहृतार्विधियदारमजाम् ॥३२६॥
तत्र सर्वे गमनरतभोगैर्नीत्वा दिनं च तत्।
यागतं कुमुदावत्या भेव सूर्यप्रभा निशि ॥३२७॥