कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक १७७
अष्टम लम्बक १७७
इस प्रकार मानों दुःख से कहती हुई रानी की बात सुनकर उस मूर्ख राजा ने उसे विष्णु
भगवान् की माया मानकर विश्वास कर लिया ॥५०॥
और मन्त्री सेनापति आदि की स्त्रियों ने भी अपने-अपने पतियों से इसी प्रकार कहा और
उन लोगों ने भी उन्हें भगवान् की भावी हुई जानकर शान्ति प्राप्त की ॥५१॥
'इस प्रकार ये दुष्ट स्त्रियां झूठी बात बनाने में चतुर होती हैं और अपने-अपने पुरुष
को ठग लेती हैं किन्तु मैं ऐसा मूर्ख नहीं' ॥५२॥
यक्ष ने इस प्रकार अपनी पत्नी कहकर उसे हतप्रभ कर दिया। उस सन्यासी ने वृक्ष
के नीचे बैठे हुए उनकी सभी बातें सुन लीं। तब संन्यासी ने हाथ जोड़कर यक्ष से निवेदन किया
कि 'हे भगवन् ! मैं सन्यासी आपकी शरण में हूँ। आपकी बात मैने (चुपके-से) सुनली इसके
लिए क्षमा करें। सन्यासी के ऐसा कहने पर सच बोलने के कारण यक्ष उस पर प्रसन्न हो
गया ॥५३-५५॥
और बोला—'मैं सर्वस्वामागत नाम का यक्ष हूँ तुम्हारे लिए प्रसन्न हूँ। तू मुझसे वर
मांग' ॥५६॥
उस साधु ने भी कहा—'तुम अपनी पत्नी पर व्यर्थ क्रोध न करना यही मेरा वर है' ॥५७॥
तब वह यक्ष बोला—'मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिए, मैंने तुम्हे यह वर दिया और
दूसरा वर फिर मांगो' ॥५८॥
तब प्रव्राजक (साधु) बोला—'आज से तुम दोना स्त्री-पुरुष मुझे अपना पुत्र
मानो' ॥५९॥
यह सुनकर वह यक्ष स्त्री के साथ प्रत्यक्ष हुआ और बोला—'पुत्र तुम हम दोना के
पुत्र हो ॥६०॥
हमारी कृपा से तुम्हें कभी भी और कभी कष्ट न होगा। शास्त्रार्थ में झगड़े म और
जूए म तू सदा विजयी रहेगा' ॥६१॥
ऐसा कहकर अन्तर्धान हुए यक्ष को प्रणाम करके और रात्रि व्यतीत करके वह सन्यासी
पाटलिपुत्र को गया ॥६२॥
वहां जाकर उसने द्वारपाल द्वारा राजा सिंहदत्त को कश्मीर से आया हुआ शास्त्रार्थी
बताकर सूचित करा दिया ॥६३॥
तब राजा के द्वारा बुलाय जाने पर सभा म जाकर उसने वहाँ के राजपण्डितों को शास्त्र
चर्चा के लिए ललकारा ॥६४॥
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