कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
२२ कथासरित्सागर
२२ कथासरित्सागर
द्वितीयस्तरङ्गः
वररुचेर्विन्ध्यवासिनी प्रति गमनम्
ततः स मर्त्यवपुषा पुष्पदन्त परिभ्रमन्।
नाम्ना वररुचि किञ्च कात्यायन इति श्रुतः ॥१॥
पारं सम्प्राप्य विद्यानां कृत्वा मन्त्रस्य मन्त्रिनाम्।
खिन्नः समाययौ द्रष्टुं कदाचिद् विन्ध्यवासिनीम् ॥२॥
तपसाराधिता देवी स्वप्नावद्यान सा च तम्।
प्राहिणोद्विन्ध्यकान्तारं काणभूतिमवेक्षितुम् ॥३॥
व्याघ्रवानरसङ्कीर्णं निस्तोयपरुषद्रुम।
श्मशानं च स प्रांशु न्यग्रोधतरुमैक्षत ॥४॥
वररुचेः काणभूतिना समागमः
ददर्श च समीपेऽस्य पिशाचानां शतवृतम्।
काणभूतिं पिशाचं च वर्ष्मणा सालसन्निभम् ॥५॥
स काणभूतिना दृष्ट्वा कृतपाद्यापसंग्रहः।
कात्यायनो जगादैनमुपविष्टः क्षणान्तरम् ॥६॥
सदाचारो भवानेवं कथमेतां गतिं गतः।
उच्छ्रखा कृतसौहार्दं काणभूतिस्तमब्रवीत् ॥७॥
काणभूतिवक्त्रिता शिवोक्ता कथा
स्वतो मे नास्ति विज्ञानं किं तु शर्वा गया श्रुतम्।
उज्जयिन्यां श्मशाने यच्छृणु तत्कथयामि त ॥८॥
कपाल्यु श्मशानेषु कस्माद्देव ! रतिस्तव।
इति पृष्टस्ततो देव्या भगवानिदमब्रवीत् ॥९॥
पुरा कल्पक्षये वृत्ते जातं जलमयं जगत्।
मया ततो निमिषोदं रक्तबिन्दुनिपातितः ॥१०॥
अण्डान्तस्तदभूदण्डं तस्माद्देवाहृतात्पुमान्।
निरगच्छत्तत सृष्टा सर्गाप प्रवृत्तिमया ॥११॥
तौ च प्रजापतीनन्यान सृष्टवन्तौ प्रजाश्च ते।
अतः पितामहः प्रोक्तः स पुमा जगति प्रिये ! ॥१२॥
एवं चराचरं सृष्ट्वा विश्वं दर्पमगादसौ।
पुरुषास्तन मूर्धानमथतस्याहमच्छिदम् ॥१३॥
प्रथम लम्बक १३
प्रथम लम्बक १३
द्वितीय तरंग
वररुचि (पुष्पदन्त) की कथा
मानव-शरीर धारण किये हुए पुष्पदन्त नामक गण वररुचि¹ एवं कात्यायन के नाम
से प्रसिद्ध हुआ ॥१॥
समस्त विद्याओं का पूर्ण अध्ययन तथा सम्राट् नन्द का मन्त्रित्व करके वह (कात्यायन)
एक बार खिन्न होकर विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए आया ॥२॥
तपस्या से आराधित विन्ध्यवासिनी देवी ने स्वप्न में वररुचि को एक आदेश दिया।
उस आदेश के अनुसार वह काणभूति का दर्शन के लिए विन्ध्यारण्य में गया ॥३॥
बाघ और वानरों से भरे हुए, फल-रहित एवं सूखे वृक्षों से व्याप्त उस विन्ध्यारण्य में
उसने अत्यन्त ऊँचे और विस्तृत बरगद वृक्ष को देखा ॥४॥
पुष्पदन्त ने उस वटवृक्ष के पास सैकड़ों पिशाचों से घिरे हुए साक्षाद्यक्ष के समान स्तम्भ
काणभूति को देखा ॥५॥
काणभूति ने कात्यायन को देखकर उसके चरण छूकर प्रणाम किया और कुछ समय के
उपरान्त विश्राम कर लेने पर कात्यायन ने काणभूति से पूछा ॥६॥
'हे काणभूते ! ऐसे सदाचारी होकर तुम ऐसी हीन गति को कैसे प्राप्त हुए ?' कात्यायन
के स्नेहपूर्ण प्रश्न को सुनकर काणभूति ने कहा ॥७॥
मुझे स्वयं यह ज्ञात नहीं है कि मैं इस गति को कैसे प्राप्त हुआ किन्तु उज्जयिनी नगरी
के—श्मशान में—शिवजी से जो मैंने सुना है, वह तुम्हें कहता हूँ, सुनो ॥८॥
एक बार पार्वती के यह पूछने पर कि 'भगवन् ! कपाल-मुंडों से और श्मशानों से तुम्हें
अधिक प्रेम क्यों है ?' शिवजी ने उत्तर दिया ॥९॥
'प्राचीनकाल में प्रलय उपस्थित होने पर सारा संसार जलमय हो गया था। उस समय
मैंने अपनी जांघ को चीरकर उस जल में रक्त की एक बूँद डाल दी ॥१०॥
वह रक्त-बिन्दु जल के भीतर अण्ड के रूप में परिणत हो गया। उसे फाड़ने पर उसमें से
एक पुरुष निकला। उस पुरुष को देखकर सृष्टि के लिए मैंने प्रकृति की रचना की ॥११॥
इस प्रकार उस दाता ने अष्टादश प्रजापतियों को जन्म दिया और उन प्रजापतियों ने
अन्य प्रजाओं का उत्पादन किया। इसलिए, हे देवि ! वह प्रथम पुरुष सबसे पुराना होने के
कारण जगत् में पितामह के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥१२॥
इस प्रकार चर और अचर-विश्व का सर्जन कर उस पुरुष का यह दर्प हो गया कि 'मैंने
इतनी बड़ी रचना कर डाली।' उसके दर्प से क्रुद्ध होकर मैंने उस पुराण-पुरुष का सिर काट
डाला ॥१३॥
१. वररुचि प्राचीन महावैयाकरण हैं। उसका दूसरा नाम कात्यायन भी है जो उनके
गोत्र से सम्बन्ध रखता है। इस नाम के अनेक विद्वान् हुए हैं। इसका विवेचन परिशिष्ट प्रकरण
में दिया गया है।
१४ कथासरित्सागर
१४ कथासरित्सागर
ततोऽनुतापेन मया महाव्रतमगृह्यत।
अतः कपाल-पाणित्वं श्मशानप्रियता च मे ॥१४॥
किं यत्तन्मे कपालात्म जगद्देवि ! करे स्थितम्।
पूर्वोक्ताण्डकपाले द्वे रोदसी¹ परिकीर्तिते ॥१५॥
इत्युक्ते शम्भुना तत्र श्रोष्यामीति सकौतुकम्।
स्थितं मयि ततो भूयः पार्वती पतिमभ्यधात् ॥१६॥
स पुष्पदन्त नियतं बाह्यनात्मानुपश्यति।
तदाकर्ण्याब्रवीद्देवी मामुद्दिश्य महेश्वरः ॥१७॥
पिशाचो दृश्यते योऽयमद्य यक्षवणानुगः।
यक्षो मित्रमभून्नास्य रक्षः स्थूरशिरा इति ॥१८॥
सङ्गतं तन पापेन निरीक्ष्यैनं धनाधिपः।
विन्ध्याटव्यां पिशाचत्वमादिशद् धनदेश्वरः ॥१९॥
भ्रात्रास्य दीर्घजङ्घेन पतित्वा पादयोस्ततः।
शापान्तं प्रति विज्ञप्तो वदति स्म धनाधिपः ॥२०॥
शापावतीर्णादाकर्ण्य पुष्पदन्तान्महाकथाम्।
उक्त्वा माल्यवते तां च शापात्प्राप्ताय मर्त्यताम् ॥२१॥
ताभ्यां गणाभ्यां सहितः शापेनेन तरिष्यसि।
इतीह धनदेनास्य शापान्तो विनिश्चितस्तदा ॥२२॥
स्वया च पुष्पदन्तस्य स एवेति स्मरप्रिये।
एतच्छ्रुत्वा वचः शम्भोः सहर्षोऽहमिहागतः ॥२३॥
इत्थं मे शापदोषोऽयं पुष्पदन्तागमावधिः।
इत्युक्त्वा विरते तस्मिन् काणभूतो च तत्क्षणम् ॥२४॥
स्मृत्वा वररुचिर्जातिं सुप्तोत्थित इवावदत्।
स एष पुष्पदन्तोऽहं मत्तस्तां च कथां शृणु ॥२५॥
इत्येवं ग्रन्थसंख्यानि सप्त सप्त महाकथाः।
कात्यायनन कथिताः काणभूतिस्ततोऽब्रवीत् ॥२६॥
देव ! रुद्रावतारस्त्वं कोऽन्यो वेत्ति कथामिमाम्।
त्वत्प्रसादाद् गतप्रायः स शापो मे शरीरतः ॥२७॥
१ द्यावापृथिव्यौ रोदस्यौ—इत्यमरः।
प्रथम लम्बक १७
प्रथम लम्बक १७
उस हत्या के लिए मम पश्चात्ताप हुआ और तब मैंने यह महान् व्रत धारण किया कि
सबदा कपाल धारण करूँगा और श्मशान में निवास करूँगा ॥१४॥
हे देवि ! दूसरी बात यह भी है कि यह कपाल-रूपी समस्त संसार सदा मेरे हाथ में
रहता है। पहले कहा हुआ अण्डा और यह कपाल दोनों ही आकाश और पृथ्वी कहे
जाते हैं ॥१५॥
शिवजी के इस प्रकार कहने पर 'फिर मैं भी कौतूहल से सुनूँगा'—ऐसा सोच ही रहा था
कि—पार्वती ने पुनः शंकरजी से कहा ॥१६॥
वह पुष्पवन्त गण कितने दिनों में लौटकर हमारे पास आवेगा ? —पार्वती का यह
प्रश्न सुनकर महादेव ने मुझे लक्ष्य करके कहा ॥१७॥
यहाँ कुबेर का अनुचर, जो यह पिशाच दीख रहा है, उसका मित्र स्थूलशिरा नामक
यक्ष है ॥१८॥
धनपति कुबेर ने उस यक्ष (काणभूति) का इस पापी राक्षस (स्थूलशिरा) की संगति
में देखकर शाप दिया कि 'तू विन्ध्यारण्य में पिशाच बनेगा' ॥१९ ॥
इसके बड़े भाई वीर्यजंघ ने जब कुबेर के चरणों में पड़कर शाप का अन्त करने की प्रार्थना
की तब कुबेर ने कहा ॥२० ॥
शाप से पृथ्वी पर अवतीर्ण पुष्पवन्त गण के द्वारा जब यह महाकथा को सुनेगा और
इसी प्रकार शाप से मनुष्यता को प्राप्त कर माल्यवान् को समस्त कथा प्रदान करेगा
(सुनाएगा ॥२१॥)
तब उन दोनों शाप-मुक्त गणों के साथ इस काणभूति का भी शाप-मोचन होगा। इस प्रकार
कुबेर ने शाप का अन्त किया ॥२२॥
‘हे प्रिये ! काणभूति से मिलते ही पुष्पवन्त के शाप का अन्त हो जायगा ऐसा तुमने
कहा था इसे स्मरण करो । शिव के इस वचन [को सुन कर मैं हर्ष के साथ यहाँ
आया ॥२३॥
इस प्रकार मेरा शापबोध पुष्पवन्त के मिलने तक था ।
ऐसा कहकर काणभूति के मौन होने पर उसी समय पूर्वजन्म का स्मरण करके वररुचि
मानों नींद से जगा और बोला—'मैं वही पुष्पवन्त हूँ। मुझसे वह कथा सुनो । ॥२४ २५॥
इस प्रकार कात्यायन ने सात लाख श्लोकों में सात महाकथाएँ काणभूति से कहीं ।
उन्हें सुनकर काणभूति ने कहा ॥२६॥
हे देव ! तुम सचमुच रुद्र के अवतार हो। उनके अतिरिक्त इन कथाओं को अन्य कौन
जानता है। तुम्हारी कृपा से मेरे शरीर से पिशाचत्व का शाप निकल रहा है ॥२७॥
तद् ब्रूहि निजवृत्तान्तं जन्मनः प्रभृति प्रभो।
मां पवित्रय भूयोऽपि न गोप्यं यदि मादृशे ॥२८॥
ततो वररुचिस्तस्य प्रशस्तस्यानुरोधतः।
सर्वमाजन्मवृत्तान्तं विस्तरादिदमब्रवीत् ॥२९॥
कौशाम्ब्यां सोमदत्ताख्यो नाम्नाग्निशिख इत्यपि।
द्विजोऽभूत्तस्य भार्या च यज्ञादत्ताभिधामवत् ॥३०॥
मुनिकन्या च सा शापात्तस्यां जाताभवत्त्वहम्।
तस्यां तस्माद् द्विजवराद्येष जातोऽस्मि साम्प्रतं ॥३१॥
ततो ममातिबालस्य पिता पञ्चत्वमागतः।
अतिष्ठद् वर्द्धयन्ती तु माता मां कृच्छ्रकर्मभिः ॥३२॥
अथाभ्यगच्छतां विप्रौ द्वावस्मद्गृहमेकदा।
एकरात्रिनिवासात्थं दूराध्वपरिधूसरौ ॥३३॥
तिष्ठतांस्तत्र च तयोरभून्मुरजध्वनिः।
तंन मामब्रवीन्माता भर्तुः स्मृत्वा सगद्गदम् ॥३४॥
नृत्यत्येष पितुर्मित्रं तव नन्दो नटः सुतः।
अहमप्यवदं मातर्दृष्ट्वामद्व्रजाम्यहम् ॥३५॥
तवापि दर्शयिष्यामि सपाठं सर्वमेव तत्।
एतन्मद्वचनं श्रुत्वा विप्रौ तौ विस्मयं गतौ ॥३६॥
अवोचतां च मन्मातां हा पुत्रौ! नात्र संशयः।
सकृच्छ्रुतधरो बालः सर्वं च धारयेद्यदि ॥३७॥
जिज्ञासाधर्मयाभ्यां मे प्रातिशाख्य१मपाठ्यत।
तथैव तन्मया सर्वं पठितं पश्यतोस्तयोः ॥३८॥
ततस्ताभ्यां समं गत्वा दृष्ट्वा नाट्यं तथैव तत्।
गृहमत्याग्रतो मातुः समग्रं दर्शितं मया ॥३९॥
एवन्ध्रुतधरत्वेन मां निश्चित्य कथामिमाम्।
व्याडिनामा तयोरेको मन्मातुः प्रजतोऽब्रवीत् ॥४०॥
१ वैदिकं व्याकरणम्। २ व्याडि२यं संग्रहह्वयस्य ग्रन्थस्य प्रणेता एतद् वि
परिशिष्टे द्रष्टव्यम्।
प्रथम लम्बक १७
प्रथम लम्बक १७
इसलिए, हे भद्र ! तुम जन्म से लेकर आजतक का अपना समस्त वृतान्त यदि मुझ-जैसे
व्यक्ति से गोपनीय न हो तो कहो और मुझे पुनः पवित्र करो ॥२८॥
इसके अनन्तर नम्रतापूर्वक अनुरोध करते हुए काणभूति से वररुचि ने विस्तारपूर्वक
अपना वृतान्त कहना प्रारम्भ किया ॥२९॥
वररुचि की जन्म-कथा
कौशाम्बी नगरी में सोमदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उसे अग्निदत्त भी कहते थे।
उसकी पत्नी का नाम वसुदत्ता था॥३० ॥
वसुदत्ता पूर्वजन्म में मुनि कन्या थी जो शाप के कारण मानव जाति में उत्पन्न हुई थी।
उसी वसुदत्ता के गर्भ से मेरी उत्पत्ति हुई॥३१॥
मेरे शैशव में ही मेरे पिता परलोकवासी हो गये। अतः मेरी माता ने बड़े ही कष्टों
के साथ मेरा पालन-पोषण किया॥३२॥
एक बार हमारे घर में लम्बे मार्ग-श्रम से श्रान्त दो ब्राह्मण एक रात निवास के लिए
आये ॥३३॥
उनके हमारे यहाँ रहते हुए एक बार मृदंग की ध्वनि हुई। वह सुनकर मेरी माता अपने
पति का स्मरण करके गद्गद स्वर में बोली ॥३४॥
'बेटा ! तुम्हारे पिता का मित्र नन्द नाम का नट नाच रहा है। मैंने भी कहा 'माता !
मैं उसका नाच देखने जाता हूँ। ॥३५॥
मैं उसका नाच देखकर उसके अक्षरशः कथोपकथन के साथ अभिनय करते हुए तुम्हें भी
दिखाऊँगा। मेरी यह बात सुनकर वे दोनों ब्राह्मण अति आश्चर्य्यान्वित हुए॥३६॥
उन्हें चकित देखकर मेरी माता बोली—'हे पुत्रो ! यह बालक एक बार जो कुछ सुन
लेता है, उसे हृदय में धारण कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं' ॥३७॥
उन्होंने मेरी परीक्षा के लिए प्रातिशाख्य१ (वैदिक व्याकरण) पढ़ाया और मैंने उनके
सामने ही उसे यथावत् सुना दिया॥३८॥
इसके अनन्तर मैंने उन दोनों के साथ जाकर नन्द नट का नाच देखा और घर आकर माता
के सामने सम्पूर्ण नाटक वैसा ही दिखा दिया जैसा देखा था॥३९॥
एक बार सुनकर स्मरण रखनेवाला मुझे जानकर उन दोनों अतिथियों में एक व्याडि२
नामक ब्राह्मण मेरी माता को प्रणाम करके बोला ॥४० ॥
१ वैदिक व्याकरण का एक ग्रन्थ जिसमें उच्चारण-सम्बन्धी वैदिक व्याकरण के
नियम लिखे हैं।
२ व्याडि ने व्याकरण-शास्त्र पर संग्रह नामक महाग्रन्थ लिखा है। इसका विवेचन,
परिशिष्ट प्रकरण में देखिए।—अनु
३
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर
धेतसाख्ये पुरे मातॄदेवस्वामिकरम्भकौ।
अभूतां भ्रातरौ विप्रावतिप्रीतौ परस्परम् ॥४१॥
तयोरेकस्य पुत्रोऽयमिन्द्रदत्तोऽपरस्य च।
अह व्याडि समुत्पन्नो मत्पितास्तं गतस्ततः ॥४२॥
तच्छोकादिन्द्रदत्तस्य पिता यातो महापंथम्।
अस्मज्जनन्योश्च ततः स्फुटितं हृदयं शुचा ॥४३॥
ततोऽनाथौ सति धनऽप्यावां विद्यानिकाङ्क्षिणौ।
गतौ प्रार्थयितुं स्वामिकुमारं तपसा ततः ॥४४॥
तपःस्थितौ च तत्रावां स स्वप्ने प्रभुरादिशत्।
अस्ति पाटलिकं नाम पुरं नन्दस्य भूपतेः ॥४५॥
तत्रास्ति चको वर्षाख्यो' विप्रस्तस्मादवाप्स्यथः।
कृत्स्नां विद्यामतस्तत्र युवाभ्यां गम्यतामिति ॥४६॥
अथावां तत्पुरं यातौ पृच्छन्तौस्तत्र चावयोः।
अस्तीह मूर्खो वर्षाख्यो विप्र इत्यवदज्जनः ॥४७॥
ततो दोलाधिरूढेन गत्वा चित्तेन तत्क्षणम्।
गृहमावामपश्याव वर्षस्य विधुरस्थिति ॥४८॥
मूषकैः कृतवल्मीकं भित्तिविस्मृतसञ्चरम्।
विच्छायं छविदा हीनं जन्मक्षत्रमिवापदाम् ॥४९॥
तत्र ध्यानस्थितं वर्षमालोक्याभ्यन्तरे तथा।
उपागतौ स्वस्तत्पत्नी विहितातिथ्यसत्क्रियाम् ॥५०॥
धूसरक्षामवपुषं विशीर्णमलिनाम्बराम्।
गुहरागागतां तस्य रूपिणीमिव दुर्गतिम् ॥५१॥
प्रणामपूर्वमावाभ्यां तस्य सोऽथ निवेदितः।
स्ववृत्तान्तश्च तद्भर्तुर्मोक्ष्यवार्ता च या श्रुता ॥५२॥
पुत्रौ युवां मे का लज्जा शृणुतं कथयामि वाम्।
इत्युक्त्वा सावयोः साध्वी कथामेतामवर्णयत् ॥५३॥
वर्षचरितम्
शङ्करस्वामिनामात्र नगरेऽभूद्द्विजोत्तमः।
मद्भर्त्ता चोपवर्षश्च तस्य पुत्राविभावुभौ ॥५४॥
१ इन्द्रदत्तविषयेऽपि परिशिष्टेऽवलोकनीयम्। २ वर्षोऽयं पाणिनेश्चाध्याप इति
प्रवादः। तद्विषयेऽपि परिशिष्टे विवरणं द्रष्टव्यम्।
प्रथम लम्बक १९
प्रथम लम्बक १९
व्याडि की कथा
हे माता ! वेतस नामक नगर में देवस्वामी और करम्भक नाम के दो ब्राह्मण भाई थे
व परस्पर अत्यन्त प्रेमपूर्वक रहते थे ॥४१॥
उन दोनों में एक का पुत्र यह इन्द्रदत्त और दूसरे का पुत्र व्याडि नामक मैं हूँ। मेरे
जन्म के पश्चात् मेरे पिता का देहान्त हो गया ॥४२॥
भाई के शोक से इन्द्रदत्त के पिता भी स्वर्ग को प्रयाण कर गये। पतियों के शोक से हम
दोनों की माताओं के हृदय भी विदीर्ण हो गये—अर्थात् वे मर गईं ॥४३॥
इस प्रकार हम दोनों अनाथ हो गये। इस हाल पर भी विद्या-प्राप्ति की अभिलाषा से
हमलोग तपस्या द्वारा स्वामी कार्तिक को प्रसन्न करने गये ॥४४॥
तपस्या करते हुए हमलोगों को स्वप्न में स्वामी कार्तिक ने आदेश दिया कि राजा नन्द
का पाटलिपुत्र नामक एक नगर है ॥४५॥
उस नगर में वर्ष नाम का एक ब्राह्मण है। उसके समीप जाकर तुमलोग समस्त विद्याओं
को प्राप्त कर सकते हो, अतः तुम दोनों वहीं जाओ ॥४६॥
ऐसा जानकर हम दोनों पाटलिपुत्र गये। वहाँ पूछने पर ज्ञात हुआ कि यहाँ वर्ष नाम का
एक मूर्ख रहता है। ऐसा आश्चर्यजनक समाचार लोगों ने दिया ॥४७॥
तब भी संशयान्वित मन से उसी समय हमलोगों ने जाकर वर्ष के जीर्ण-शीर्ण और पुराने
घर को देखा ॥४८॥
वर्ष का घर चूहे के बिलों और छविविहीन भित्तियों के कारण टूटे-फूटे छप्परों से भी
हीन ऐसा लगता था मानो आपत्तियों का जन्मस्थान हो ॥४९॥
उस मकान के भीतर हमलोगों ने ध्यानमग्न वर्ष को देखा। उसके पश्चात् हम आतिथ्य
सत्कार करनेवाली उसकी स्त्री के समीप गये ॥५०॥
भूरे और रूखे शरीरवाली फटे पुराने और मलिन वस्त्र पहिने हुए मतिमती धृति के
समान उसकी स्त्री थी ॥५१॥
उसकी पत्नी को प्रणाम कर हमलोगों ने अपने आने का कारण और समाचार कहा
और यह भी कह दिया कि सारे नगर में आपके पति मूर्ख-रूप में कुख्यात हैं ॥५२॥
हमारी बातें सुनकर वर्ष की पत्नी ने कहा—पुत्रो ! तुम मेरे पुत्र के समान हो। तुमसे
लज्जा या संकोच करने की क्या आवश्यकता है। ऐसा कहकर उस पतिव्रता ने हमें यह कथा
सुनाई ॥५३॥
वर्ष का चरित्र
इस पाटलिपुत्र नगर में शङ्करस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके दो पुत्र हुए, एक
मेरा पति वर्ष और दूसरा उपवर्ष ॥५४॥
२ कथासरित्सागर
२ कथासरित्सागर
अथ मूर्खो दरिद्रश्च विपरीतोऽस्य चानुजः।
तेन चास्य नियुक्ताभूत् स्वभार्या गृहपोषणी ॥५५॥
कदाचिदथ सम्प्राप्ता प्रावृट् तस्यां च योषितः।
सगुडं पिष्टरचितं गृह्यकूपं जुगुप्सितम् ॥५६॥
कृत्वा मूर्खाय विप्राय ददत्यन्नं कृतं हि ताः।
शीतकाल निवाणे च स्नानक्लप्तफलमापहम् ॥५७॥
दत्तं न प्रतिपद्यन्त इत्याचारो हि कुत्सितः।
सद्येवरगृहिण्या मे दत्तमस्मै सदक्षिणम् ॥५८॥
तद्गृहीतवायमायातो मया निर्भर्त्सितो भृशम्।
मूढभावकृतेनान्तर्मन्युना पर्यतप्यत ॥५९॥
सतु स्वामिकुमारस्य पादमूलं गतोऽभवत्।
तपस्तुष्टेन तेनास्य सर्वा विद्या प्रकाशिता ॥६०॥
सकृच्छ्रुतधरं विप्रं प्राप्यतास्त्व प्रकाशय।
इत्यादिष्टः स तेनैव सहर्षोऽप्यमिहागतः ॥६१॥
आगत्यैष च वृत्तान्तं सर्व मह्यं न्यवेदयत्।
तदा प्रभृत्यविरतं जपन्मध्यास्य तिष्ठति ॥६२॥
अतः श्रुतधरं कञ्चिदन्विष्यनयतं युवाम्।
तेन सर्वार्थसिद्धिवों भविष्यति न संशयः ॥६३॥
श्रुत्वैतद्वर्षपत्नीतःसूनं योगत्यहामये।
दत्त्वा हेमशतं चास्य निर्गतौ स्वस्ततः पुरात् ॥६४॥
अथावां पृथिवीं भ्रान्तौ न च श्रुतधरः क्वचित्।
लभ्यमानो तत श्रान्तौ प्राप्तावद्य गृहं तव ॥६५॥
एकश्रुतधरः प्राप्तो यासोऽयं तनयस्तव।
तदनं देहि गच्छावो विद्याद्रविण¹-सिद्धये ॥६६॥
इति व्याडिबचः श्रुत्वा मन्माता सादराऽवदत्।
मम सङ्गतमेवैतदस्यच प्रत्ययो मम ॥६७॥
तथाहि पूर्वं जातेऽस्मिन्नेकपुत्रे मम स्फुटा।
गगनादवभून्मूर्द्धशरीरा सरस्वती ॥६८॥
१ विद्यारूपं यद् द्रविणं = धनं तस्य लाभायेत्यर्थः।
प्रथम लम्बक २१
प्रथम लम्बक २१
उन दोनों में बड़ा पुत्र मूर्ख और दरिद्र था। छोटा उपवर्ष इसके विपरीत विद्वान् और
धनी हुआ। उस उपवर्ष ने प्रारम्भ में वर्ष के घर की व्यवस्था करने के लिए अपनी पत्नी को नियुक्त
किया था॥५५॥
इसी क्रम से रहते हुए एक बार वर्षा-ऋतु आ गई, जिसमें स्त्रियाँ गुड़ के साथ
आटे से निर्मित मूषक का रूप बनाकर निन्दनीय रूप से मूर्ख ब्राह्मणों को दान देती हैं।
इसी प्रकार शीत और ग्रीष्म-ऋतु में क्रमशः स्नान और पसीने के कष्ट को हरण करने
वाली वस्तुएँ दान करती हैं। इस प्रकार के दान को नहीं लिया जाता। यह अत्यन्त
कुत्सित आचार है। वह दान तो मेरे देवर की पत्नी ने दक्षिणा-सहित मेरे पति वर्ष को
मूर्ख समझकर दिया॥५६, ५७ ५८॥
उसे लेकर जब वे घर आये तो मैंने उन्हें खूब फटकारा। अपनी मूर्खता के कारण होनेवाले
सन्ताप से वे अत्यन्त सन्तप्त हुए॥५९॥
इसके पश्चात् वर्ष तपस्या से स्वामी कार्त्तिक को प्रसन्न करने चले गये। प्रसन्न होकर
स्वामी कार्त्तिक ने उन्हें वरदान द्वारा समस्त विद्याएँ प्रदान कीं॥६०॥
और स्वामी कार्त्तिक ने आदेश दिया कि एक बार सुनकर स्मरण रखनेवाले ब्राह्मण
को प्राप्त कर तुम इन विद्याओं को प्रकट करना। इस प्रकार कार्त्तिकेय से वरदान प्राप्त कर वर्ष
हर्षपूर्वक यहाँ आ गये॥६१॥
वहाँ से आकर उन्होंने समस्त वृत्तान्त मुझे बताया और तभी से वे निरन्तर जप और ध्यान
में मग्न रहते हैं॥६२॥
इसलिए आपलोग एक बार ही सुनकर स्मरण रखनेवाले किसी छात्र को ढूँढ़ें।
इससे तुम दोनों की मनस्कामना पूर्ण होगी इसमें सन्देह नहीं॥६३॥
वर्ष की पत्नी से इस प्रकार सुनकर हम दोनों ने उसकी तात्कालिक दरिद्रता दूर करने
के लिए उसे एक सौ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं और उस नगर से चले गये॥६४॥
तदनन्तर हम दोनों सारी पृथ्वी पर घूमे किन्तु कहीं भी एक श्रुतधर नहीं मिला। अतः
थककर आज तुम्हारे घर विश्राम के लिए रुक गये॥६५॥
आज इस बालक को जो तुम्हारा पुत्र है प्राप्त किया। जो श्रुतधर है। तुम इसे हमें दे
दो। हमलोग विद्या-दान की सिद्धि के लिए जायें॥६६॥
इस प्रकार व्याडि के वचन सुनकर मेरी माता ने आदर के साथ कहा—यह सब ठीक है।
मुझे आपकी बातों पर विश्वास है॥६७॥
और भी कारण है। जब यह एकमात्र पुत्र मुझसे उत्पन्न हुआ था उस समय आकाश से
देववाणी हुई थी॥६८॥
१२ कथासरित्सागर
१२ कथासरित्सागर
एष श्रुतधरो जातो विद्यां वर्षादवाप्स्यति।
किञ्च व्याकरणं लोके प्रतिष्ठां प्रापयिष्यति॥६९॥
नाम्ना वररुचिञ्चायं सत्तदस्म हि रोचते।
यद्यद्वरं भवत्विच्छ्विदित्युक्त्वा वागुपारमत्॥७०॥
अतएव विवृद्धेऽस्मिन्नार्य्य चिन्तयाम्यहम्।
क्व स वर्ष उपाध्यायो भवदिति न्विशानिशम्॥७१॥
अथ युष्मन्मुखाज्ज्ञात्वा परितोषोऽद्य मे परः।
तदेनं नयतं भ्रात्रा युवयोरप का क्षतिः॥७२॥
इति मन्मातृवचनं श्रुत्वा तौ हर्षनिर्भरौ।
व्याडीन्द्रदत्तौ तां रात्रिमयुष्येतां क्षणोपमाम्॥७३॥
प्रभातोत्सवार्यमम्बामास्तॄण दत्वा निजं धनम्।
व्याडिनोपनीतोऽहं मैवाकृत ममाञ्चता॥७४॥
ततो मात्राम्यनुज्ञातः कथम्चिद्रुद्धवाष्पया।
गामादाय निजोत्साहमित्ताधपत्तदव्ययम्॥७५॥
मन्यमानौ च कौमारं पुष्यितं तदनुग्रहम्।
व्याडीन्द्रदत्तौ तरसा नगर्य्या प्रस्थितौ ततः॥७६॥
अथ क्रमेण वर्षस्य वय प्राप्ता गृहं गुरोः।
स्कन्दप्रसादामायान्तं मूर्त्तं मां सोऽप्यमन्यत॥७७॥
कृत्वास्मानग्रतोऽन्येद्युरुपविष्टः शुचौ भुवि।
वर्षोपाध्याय ओङ्कार²मकरोद्दिव्यया गिरा॥७८॥
तदनन्तरमवास्य वेदाः साङ्गा उपस्थिताः।
अध्यापयितुमस्मांश्च प्रवृत्तोऽभूदसौ ततः॥७९॥
सकृच्छ्रुतं मया तत्र द्विःश्रुतं व्याडिना तथा।
त्रिःश्रुतं चेन्द्रदत्तेन गुरुजोक्तमगृह्यत॥८०॥
ध्वनिमय तमपूर्वं दिव्यमाकर्ण्य सद्यः
सपदि विह्रसदन्तर्विस्मया विप्रवर्याः।
किमिदमिति समन्ताद्वृद्धमभ्येत्य वर्षं
स्तुतिमुखरमुखैरीरयंति स्म प्रणामैः॥८१॥
१ स्वामिकार्तिक सम्बन्धि। २ ओङ्कारोच्चारणम्।
प्रथम लम्बक २३
प्रथम लम्बक २३
यह धूतवर बालक उत्पन्न हुआ है और वर्ष उपाध्याय से विद्या प्राप्ति कर संसार में
व्याकरण की प्रतिष्ठा करेगा॥६९॥
यह बालक नाम से वररुचि होगा। संसार में जो भी अच्छा होगा वह इसे
अच्छा लगेगा इसीलिए इसका नाम वररुचि होगा। इतना कहकर आकाशवाणी समाप्त
हो गई॥७०॥
इसलिए जैसे जैसे यह बालक बड़ा हो रहा था वैसे ही वैसे मुझे रात-दिन यह चिन्ता सता
रही थी कि वह वर्ष उपाध्याय कहाँ होगा॥७१॥
आज तुमलोगों के मुख से यह वृत्तान्त सुनकर मुझे अत्यन्त सन्तोष हुआ। अतः तुम
दोनों इसे वर्ष के समीप ले जाओ। यह तुम्हारा भाई है। कोई हानि नहीं॥७२॥
मेरी माता के ऐसे वचन को सुनकर प्रफुल्लित व्याडि और इन्द्रदत्त ने वह रात एक
क्षण के समान व्यतीत की॥७३॥
प्रातःकाल व्याडि ने उत्सव करने के लिए अपना धन मेरी माता को दे दिया और मुझे
वेदाध्ययन के योग्य बनाने के लिए स्वयं ही मेरा उपनयन-संस्कार किया जिससे मैं योग्य बनकर
विद्याध्ययन कर सकूँ॥७४॥
तब किसी प्रकार आँसुओं को रोककर मेरी माता ने मुझे आज्ञा दी। साथ ही मेरे
अत्यन्त उत्साह को देखकर मेरी माता का शोक कम हो गया॥७५॥
मेरी कुमारावस्था को माता का अनुग्रह समझकर व्याडि और इन्द्रदत्त मुझे लेकर उस
कौशाम्बी नगरी से शीघ्र चल पड़े॥७६॥
"इसके पश्चात् यथासमय हमलोग वर्ष गुरु के घर पहुँचे और उन्होंने भी मूर्तिमान् स्कन्द
के प्रभाव के समान मुझ बाल हुए समझा॥७७॥
एक शुभ दिन को वर्ष उपाध्याय ने पवित्र भूमि में बैठकर और हमलोगों को आगे बैठाकर
दिव्य वाणी में ओंकार का उच्चारण किया॥७८॥
ओंकार का उच्चारण करते ही कार्तिकेय की कृपा से सांगोपांग वेद उपस्थित हो गये
और तब उपाध्याय हम लोगों को पढ़ाने को उद्यत हुए॥७९॥
गुरु का एक बार कहने से उसे मैं स्मरण कर लेता था दूसरी बार के कहने पर व्याडि
और तीसरी बार के कहने पर इन्द्रदत्त ग्रहण करते थे॥८०॥
अध्ययन प्रारम्भ होने पर, वर्ष के मुख से निकलती हुई उस अपूर्व दिव्य ध्वनि
को सुनकर फिर 'यह क्या है' इस प्रकार आश्चर्य के साथ वर्ष उपाध्याय के घर पर
चारों ओर से आकर एकत्र एवं स्तुति करते हुए ब्राह्मणगण प्रणामों से उनकी अर्चना
करने लगे॥८१॥
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर
किमपि तदवलोक्य तत्र चित्रं
प्रमदवशान्न परं तषोपवर्षं ।
अपि विततमहोत्सवं समग्रं
समजनि पाटलिपुत्रपौरलोकः ॥८२॥
राजापि स गिरिशसूनुवरप्रभाव-
मालोक्य तस्य परितोषमुपेत्य नन्दः ।
वर्षस्य वेश्म वसुभिः स किरादरेण
सत्कारमेव समपूरयदुन्नतधीः ॥८३॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके
द्वितीयस्तरङ्गः ।
तृतीयस्तरङ्गः
एवमुक्त्वा वररुचिं शृण्वत्येकाग्रमानसे ।
काणभूती वने तत्र पुनरेवेदमब्रवीत् ॥१॥
कदाचिदति कालस्य कृते स्वाध्यायकर्मणि ।
इति वर्षं उपाध्यायः पृष्ठोऽस्माभिः कृताह्निकः ॥२॥
इदमेवविधं कस्माद्भरं क्षेभतां गतम् ।
सरस्वत्याश्च लक्ष्म्याश्च तदुपाध्याय ! कथ्यताम् ॥३॥
तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीदस्माञ्छृणु चैतत्कथामिमाम् ।
तीर्थं कनखलं^१ नाम गङ्गाद्वार^२स्ति पावनम् ॥४॥
मत्र काञ्चनपातन जाह्नवी देवदन्तिना ।
उशीनरगिरिग्रन्थाद् भित्वा समवतारिता ॥५॥
दाक्षिणात्यो द्विजः कश्चित्तपस्यन्भार्यया सह ।
तत्रासीत्तस्य चान्वेव जायन्ते स्म त्रयः सुताः ॥६॥
कालेन स्वर्गते तस्मिन् समाये च च तत्सुताः ।
स्थानं राजगृहं^३ नाम जग्मुर्विद्याजनेच्छया ॥७॥
१ हरद्वारसमीपे कनखलं तीर्थ प्रसिद्धं यत्र दक्षप्रजापतिना यज्ञोऽनुष्ठित इति ख्यातम् ।
२ गङ्गाद्वारमिदानीं हरद्वारेति प्रसिद्धम् । ३ राजगृहं साम्प्रतं बिहारप्रान्ते 'राजगिर' नाम्ना
प्रसिद्धं स्थानमस्ति ।
रिक्त पृष्ठ
२६ कथासरित्सागर
२६ कथासरित्सागर
तत्र चाधीतविद्यास्ते प्रयोऽप्याशाम्बुधौ सिता ।
ययु स्वामिकुमारस्य दर्शने दक्षिणापथम् ॥८॥
तत्र ते चिञ्चिनीं नाम नगरीमम्बुधेस्तटे ।
गत्वा भोजिकसञ्ज्ञस्य विप्रस्य न्यवसन्गृहे ॥९॥
स च कन्या निजास्तिस्रस्तेभ्यो दत्त्वा धनानि च ।
तपसेऽन्यसन्तानो गङ्गा याति स्म भोजिकः ॥१० ॥
अथ तेषां निवसतां तत्र श्वशुरवेश्मनि ।
अवग्रहकृतस्तीव्रो दुर्भिक्ष समजायत ॥११॥
तेन भार्या परित्यज्य साध्वीस्तास्ते त्रयो ययुः ।
स्पृशन्ति न नृशंसानां हृदयं बन्धुबुद्धयः ॥१२॥
सतस्तु मध्यमा तासां सगर्भामूत्ततश्च ताः ।
भवनं यज्ञदत्तस्य पितृमित्रस्य शिश्रियुः ॥१३॥
तत्र तत्तूर्णिमार्भवन्त्यान्य क्लिष्टवृत्तयः ।
आपद्यपि सतीवृत्तं किं मुञ्चन्ति कुलस्त्रियः ॥१४॥
कालेन मध्यमा चात्र तासां पुत्रमसूत सा ।
अन्योन्यातिशयात्तस्मिन्स्नेहस्तासामबर्धत ॥१५॥
कदाचिद् व्योममार्गेण विहरन्तं महेश्वरम् ।
अङ्कस्था स्कन्दजननी तं दृष्ट्वा सद्यावदत् ॥१६॥
देव ! पश्य क्षिप्तांरस्मिन्नेवास्तिस्रोऽपि योषितः ।
यत्स्नेहा दधतमाशामेषोऽस्माञ्जीवयिष्यतीति ॥१७॥
तत्तथा कुरु येनायमेता बालोऽपि जीवयेत् ।
इत्युक्तः प्रियया देवो वरदः स जगाद ताम् ॥१८॥
अनुगृह्णाम्यमू पूर्वं सभार्थेणामुना भृतः ।
आराधितोऽस्मि तेनायं भोगाथै निर्मितो भुवि ॥१९॥
एतन्नाम्ना च सा याता पाटली नाम भूपतेः ।
महेन्द्रवर्मणः पुत्री भार्यास्यैव भविष्यति ॥२० ॥
इत्युक्त्वा स विभुः स्वप्ने साध्वीस्तिस्रो जगाद ताः ।
नाम्ना पुत्रक एवाय युष्माकं बालपुत्रकः ॥२१॥
मस्य सुप्तप्रबुद्धस्य शीर्षान्त च दिने दिने।
सुवर्णलक्ष भविता राजा चायं भविष्यति ॥२२॥
प्रथम लम्बक २७
प्रथम लम्बक २७
वहाँ पर (राजगृह में) विद्योपार्जन करके वे तीनों अनाथ और दुःखी बालक स्वामी
कार्तिक के दर्शन करने के लिए वहाँ से दक्षिण-देश को गये॥८॥
वे दक्षिण-देश में समुद्र-तट पर स्थित विन्जिनी नामक नगरी में पहुँचे और वहाँ मोजिक
नामक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे ॥९॥
उस मोजिक ब्राह्मण के तीन कन्याओं के अतिरिक्त और कोई सन्तान न थी। अतः वह
अपनी तीनों कन्याओं को तीनों ब्राह्मणों को दान कर और साथ ही अपना धन भी उन्हें देकर गंगाद्वार
(हरद्वार) की ओर चला गया ॥१० ॥
कुछ काल के अनन्तर श्वशुर-गृह में रहते हुए उन तीनों ब्राह्मणों को वर्षाभाव के कारण
होनेवाले भीषण अकाल का अनुभव करना पड़ा ॥११॥
अकाल की भीषणता से व्याकुल होकर वे तीनों ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नियों को
छोड़कर भाग गये। क्रूर व्यक्तियों के हृदयों में बन्धुत्व की भावना स्पर्श भी नहीं करती ॥१२॥
उन तीनों में बिचली बहुत गर्भवती थी। अतः वे तीनों इस विपत्ति में अपने पिता के
मित्र यज्ञदत्त के घर में शरण लेने चली गईं और वहाँ जाकर अपने अपने पतियों का ध्यान करती
हुई कठिनाई से जीवन व्यतीत करने लगीं। कुलीन स्त्रियां विपत्ति में भी अपने सती-चरित्र का
परित्याग नहीं करतीं ॥१३-१४॥
उस बिचली बहन ने समयानुसार पुत्र उत्पन्न किया और तीनों बहनें उस शिशु के प्रति
एक दूसरी से अधिक स्नेह करने लगीं ॥१५॥
किसी समय आकाश में भ्रमण करते हुए शिवजी की गोद में बैठी हुई स्कन्दमाता (पार्वती)
उस बालक को देखकर दयापूर्वक कहने लगीं ॥१६॥
'देव देखिए ! इस बालक पर ये तीनों स्त्रियाँ समान रूप से स्नेह करती हैं और यह आशा
करती हैं कि यह बड़ा होने पर हमलोगों का पालन-पोषण करेगा ॥१७॥
इसलिए भगवन् ! आप ऐसी कृपा करें कि यह बालक इन तीनों का जीवन-निर्वाह कर
सके। पार्वती के इतना कहने पर करुणाली शिवजी ने कहा ॥१८॥
'मैं तो इसे पहले ही अनुगृहीत कर चुका हूँ क्योंकि इसने पूर्वजन्म में पत्नी के साथ मेरी
आराधना की थी। उसी का फल भोगने के लिए इसे संसार में यह जन्म दिया गया है ॥१९॥
पाटली नाम की इसकी पत्नी राजा महेन्द्रवर्मा की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई है। वही
इसकी पत्नी बनेगी' ॥२० ॥
पार्वती से ऐसा कहकर शिवजी ने उन तीनों पतिव्रताओं से स्वप्न में कहा कि 'यह
तुम्हारा शिशु नाम से भी पुत्रक ही रहेगा पुत्रक नाम से प्रसिद्ध होगा। यह जब सोकर उठेगा
तब प्रतिदिन इसके सिरहाने में एक लाख स्वर्ण-मुद्रा मिला करेगी और आगे चलकर यह राजा
होगा' ॥२१-२२॥
२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर
ततः सुप्तोत्थिते तस्मिन्बाल वा प्राप्य काञ्चनम् ।।
यज्ञदत्तसुता साध्यो ननन्दु फलितव्रता ॥२३॥
अथ तेन सुवर्णेन धृतकोपोऽचिरेण सः।
बभूव पुत्रको राजा तपोऽधीना हि सम्पदः ॥२४॥
कदाचिद्यज्ञदत्तोऽथ रहः पुत्रकमब्रवीत्।
राजन्कुभिक्षदोषेण क्वापि ते पितरो गताः ॥२५॥
तत्सदा देहि विप्रेभ्यो यतायान्ति निशम्य ते।
ब्रह्मदत्तकथां चातो कथयामि च ते शृणु ॥२६॥
वाराणस्यामभूत्पूर्व ब्रह्मदत्ताभिधो नृपः।
सोऽपश्यद्धंसयुगलं प्रयातं गगने निशि ॥२७॥
विस्फुरत्कनकच्छायं राजहंसशतैर्वृतम् ।
विद्युत्पुञ्जमिवाकाण्डसिताभ्रपरिवेष्टितम् ॥२८॥
पुनस्तद्दर्शनेात्कण्ठा तस्यास्य ववृधे ततः।
यथा नृपतिसौख्येषु न बबन्ध रतिं क्वचित् ॥२९॥
मन्त्रिभिः सह संमन्त्र्य ततश्चाकारयत्सरः।
स राजा स्वमते कान्तं प्राणिनां चाभयं ददौ ॥३०॥
ततः कालेन तौ प्राप्तौ हंसौ राजा ददर्श सः।
विश्वस्तो चापि पप्रच्छ हैमे वपुषि कारणम् ॥३१॥
व्यक्तवाचौ ततस्तौ च हंसौ राजानमूचतुः।
पुरा जन्मान्तरे काकावावां जातौ महीपते ॥३२॥
बल्यर्थ युध्यमानौ च पुण्ये शून्ये शिवालये
विनिपत्य विपन्नौ स्वस्तत्स्थानद्रोणिकान्तरे ॥३३॥
जातौ जातिस्मरावावां हंसौ हेममयौ ततः।
तच्छ्रुत्वा तौ यथाकामं पश्यन् राजा तुतोष सः ॥३४॥
अतोऽन्यव्यापृत्यादेव पितॄन्दानाववाप्स्यसि।
इत्युक्तो यज्ञदत्तेन पुत्रकस्तत्तथाकरोत् ॥३५॥
श्रुत्वा प्रदानवार्तां तामाजग्मुस्ते द्विजातयः।
परिज्ञाता परा लक्ष्मीं पत्नीदत्त सह रमिरे ॥३६॥
आश्चर्यमपरित्याज्यो दृष्टनष्टापनामपि।
अविवेकाभ्युदीर्णा स्वात्नुभावो दुरात्मनाम् ॥३७॥
प्रथम लम्बक २९
प्रथम लम्बक २९
दूसरे दिन उस बालक के सोकर उठने पर, उसके सिरहाने में सुवर्ण पाकर मम्मट की
पतिव्रता पुत्रियाँ अपने व्रत को सफल समझकर अत्यन्त आनन्दित हो उठीं ॥२३॥
इस प्रकार प्रतिदिन एकत्र होते हुए सोने से खजाना बढ़ जाने पर धीरे-धीरे पुत्रक राजा
बन गया। सच है 'सिद्धियाँ तप के अधीन होती हैं' ॥२४॥
एक बार एकान्त में यज्ञदत्त ने पुत्रक से कहा—'हे राजन् ! तुम्हारे पितर दुर्भिक्ष के
कारण यहाँ से कहीं चले गये हैं। इसलिए तुम ब्राह्मणों को सदा दान दिया करो। वे भी तुम्हारी
उदारता सुनकर आ जायेंगे। मैं इस विषय में ब्रह्मदत्त राजा की एक कथा सुनाता हूँ,
सुनो' ॥२५ २६॥
राजा ब्रह्मदत्त की कथा
प्राचीन समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त नाम का राजा था। उसने एक बार रात्रि के
समय आकाश में उड़ते हुए हंसों की जोड़ी को देखा जिसके चारों ओर बिजली के समान
चमकती हुई, सोने के पंखों की प्रभा छिटक रही थी। उसके चारों ओर श्वेत हंस ऐसे उड़ रहे
थे जैसे आकाश में ही श्वेत मेघ-खण्डों से व्याप्त विद्युत्पुंज हों ॥२७-२८॥
उस हंस-युगल को देखने की राजा की लालसा ऐसी तीव्र हुई कि वह राज्य के सुखों से
भी विरक्त रहने लगा ॥२९॥
तब राजा ने मन्त्रियों के साथ सम्मति करके एक सुन्दर सरोवर बनवाया और अपने
राज्य में समस्त प्राणियों को अभयदान दिया ॥३०॥
कुछ समय के पश्चात् वे हंस पुनः उस सरोवर पर आये और उनके विश्वस्त होने पर
राजा ने उनके स्वर्ण के शरीर होने का कारण पूछा ॥३१॥
तब वे हंस स्पष्ट वाणी में राजा से बोले—'हे राजन् ! पहले जन्म में हम कौए थे ॥३२॥
बलि (भोजन) के लिए लड़ते हुए हम दोनों एक शून्य और पवित्र शिवालय में गये और
वहाँ जाकर जल की टंकी में गिरे और मर गये ॥३३॥
इसी कारण इस जन्म में हमलोग सुवर्णमय हंस हुए। राजा इस प्रकार सुनकर और
जी भरकर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ ॥३४॥
अतः तुम भी असाधारण रूप से दान करते हुए अपने पितरों को प्राप्त करोगे। ऐसा
सुनकर पुत्रक ने असाधारण रूप से दान करके ख्याति प्राप्त की ॥३५॥
इस प्रकार पुत्रक के दान की ख्याति सुनकर वे ब्राह्मण यहाँ आये और पहचाने जाने पर
अतुल सम्पत्ति और अपनी पत्नियों को प्राप्त कर सुखी हुए ॥३६॥
यह आश्चर्य है कि मदिरा से अन्ध बुद्धिवाले दुष्ट जातियों का ज्ञान और नष्ट होते
देखकर भी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते ॥३७॥
३ कथासरित्सागर
३ कथासरित्सागर
कारून राज्यकामास्त पुत्रक तं जिघांसव ।
निन्युस्तद्दर्शनव्याजाद्द्विजा विन्ध्यनिवासिनीम् ॥३८॥
वधकान्स्थापयित्वा च देवी गर्भगृहान्तरे ।
तमूचु पूर्वमकरस्व पश्च देवी प्रजान्तरम् ॥३९॥
तत प्रविष्टो विश्वासात्स दृष्ट्वा हन्तुमुद्यतान् ।
पुश्यान् पुत्रकोऽपृच्छत्कस्माद्भिहथ मामिति ॥४०॥
पितृभिस्ते प्रयुक्ता स्म स्वप्न दत्वेति चाब्रुवन् ।
ततस्तान्मोहिताञ्छ्वेभ्या बुद्धिमान्पुत्रकोऽवदत् ॥४१॥
ददाम्यतद्धनं वो रत्नालङ्करण निजम् ।
मां मुञ्चत करोम्यत्र नोद्भेद यामि दूरत ॥४२॥
एवमस्त्विति तत्तस्माद्गृहीत्वा वधका गता ।
'हृत पुत्रक' इत्युचुस्तत्पितृणापुरो मृषा ॥४३॥
तत प्रतिनिवृत्तास्ते हृता राज्यार्थिनो द्विजा ।
मन्त्रिभिर्द्रोहिणो बुद्ध्य कृतघ्नाना शिव कुत ॥४४॥
अत्रान्तर स राजापि पुत्रक सत्यसङ्गर ।
विवेश विन्ध्यकान्तार विरक्त स्वेषु बन्धुषु ॥४५॥
भ्रमन्ददर्श सत्रासौ बाहुयुद्धैकतत्परौ ।
पुरुषा द्वौ ततस्तौ स पृष्टवान्को युवामिति ॥४६॥
मयासुरसुतावावां तदीय चास्ति नौ धनम् ।
इद भाजनमया च यष्टिरेते च पादुके ॥४७॥
एतन्निमित्त युद्ध नौ यो बली स हरेदिति ।
एतत्तद्वचनं श्रुत्वा हसन् प्रोवाच पुत्रक ॥४८॥
कियदेतद्धनं पुंस्तस्ततस्तौ समवोचताम् ।
पादुके परिधायैते खेचरत्वमवाप्यते ॥४९॥
यद्यत्त्या यल्लिख्यते किञ्चित्सत्य सम्पद्यत हि तत् ।
भाजने यो य आहारश्चिन्त्यते स स तिष्ठति ॥५०॥
तच्छ्रुत्वा पुत्रकोऽवादीत्कि युद्धेनान्स्वयं पण ।
धावन्त्यणाधिको य स्यात्स एवैतद्धरेदिति ॥५१॥
प्रथम लम्बक ३१
प्रथम लम्बक ३१
कुछ समय आनन्द का उपभोग करते हुए भी वे ब्राह्मण पुत्रक को मारकर उसका राज्य
हड़पने की इच्छा से उसे विन्ध्यवासिनी के दर्शन के बहाने वहाँ ले गये ॥३८॥
वहाँ पर देवी के मन्दिर के भीतरी भाग में वध करनेवालों को रखकर उन्होंने पुत्रक से
कहा कि 'पहले तुम अकेले ही देवी के दर्शन करो। भीतर जाओ' ॥३९॥
उनके विश्वास पर मन्दिर के अन्दर प्रवेश करते ही पुत्रक ने प्रहार के लिए उद्यत वधिकों
को देखकर पूछा कि 'तुमलोग मुझे क्यों मारते हो ? ॥४०॥
उन्होंने कहा कि तुम्हारे पितरों ने सोना देकर हमें मारने के लिए प्रेरित किया है'।
भगवती की कृपा से भ्रष्ट बुद्धिवाले उन वधिकों से पुत्रक ने कहा॥४१॥
मैं तुम्हें अपने बहुमूल्य जवाहिरातों के आभूषण देता हूँ। तुमलोग मुझे छोड़ दो मैं यह
बात किसी से न कहूँगा और दूर चला जाता हूँ'॥४२॥
ऐसा कहने पर वधिक लोभ उसे छोड़कर चले गये और उसके पितरों से जाकर झूठ
कह दिया कि पुत्रक को मार दिया ॥४३॥
इस प्रकार पाप-कर्म करके राज्य पाने की इच्छावाले ब्राह्मण लौटकर घर गये तो उन्हें
राजद्रोही समझकर पुत्रक के मन्त्रियों ने मार डाला। भला ! कृतघ्नों का कल्याण किस प्रकार
हो सकता है॥४४॥
इसी बीच राजा पुत्रक भी अपने सम्बन्धियों से विरक्त होकर विन्ध्याचल के गहन वन
में चला गया ॥४५॥
वन में घूमते हुए उसने दो असुर-युवकों को बाहुयुद्ध के लिए तैयार खड़े देखा और उनसे
पूछा कि 'तुम दोनों कौन हो ? ॥४६॥
वे कहने लगे—'हम दोनों मयासुर के लड़के हैं। हमारे पास यह पैतृक धन है—एक
पात्र एक लाठी और दो खड़ाऊँ' ॥४७॥
इस पैतृक धन के लिए हमलोगों का युद्ध हो रहा है 'कि जो बलवान् हो वह इसे प्राप्त
करे। उनकी इन बातों को सुनकर पुत्रक ने हँसकर कहा ॥४८॥
'पुरुष के लिए यह कितना धन है, जिसके लिए तुमलोग युद्ध कर रहे हो। तब वे दोनों
बोले—'इस खड़ाऊँ को पहनने से मनुष्य आकाशचारी हो जाता है ॥४९॥
छड़ी से जो कुछ भी लिखा जाता है वह सत्य होता है और इस पात्र में जिस भोजन का
ध्यान करें, वही भोजन रखा हुआ मिलता है' ॥५०॥
यह सुनकर पुत्रक ने कहा—'इन वस्तुओं के लिए युद्ध की शर्त उचित नहीं है। दौड़ने में
जो अधिक बलवान् हो वही इन्हें ले ले' ॥५१॥
१ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी 'अरेबियन नाइट्स' में है, जिसमें शाहजादा
मुहम्मद और परीबानू की कहानी में ऐसा प्रसंग आता है कि तीन शहजादे, नूर निहार से शादी
करने के लिए ऐसी ही तीन चीजें लाये थे उसका फैसला करने के लिए तीर फेंके गये थे।