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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

प्रथम लम्बक १७
उस हत्या के लिए मम पश्चात्ताप हुआ और तब मैंने यह महान् व्रत धारण किया कि
सबदा कपाल धारण करूँगा और श्मशान में निवास करूँगा ॥१४॥
हे देवि ! दूसरी बात यह भी है कि यह कपाल-रूपी समस्त संसार सदा मेरे हाथ में
रहता है। पहले कहा हुआ अण्डा और यह कपाल दोनों ही आकाश और पृथ्वी कहे
जाते हैं ॥१५॥
शिवजी के इस प्रकार कहने पर 'फिर मैं भी कौतूहल से सुनूँगा'—ऐसा सोच ही रहा था
कि—पार्वती ने पुनः शंकरजी से कहा ॥१६॥
वह पुष्पवन्त गण कितने दिनों में लौटकर हमारे पास आवेगा ? —पार्वती का यह
प्रश्न सुनकर महादेव ने मुझे लक्ष्य करके कहा ॥१७॥
यहाँ कुबेर का अनुचर, जो यह पिशाच दीख रहा है, उसका मित्र स्थूलशिरा नामक
यक्ष है ॥१८॥
धनपति कुबेर ने उस यक्ष (काणभूति) का इस पापी राक्षस (स्थूलशिरा) की संगति
में देखकर शाप दिया कि 'तू विन्ध्यारण्य में पिशाच बनेगा' ॥१९ ॥
इसके बड़े भाई वीर्यजंघ ने जब कुबेर के चरणों में पड़कर शाप का अन्त करने की प्रार्थना
की तब कुबेर ने कहा ॥२० ॥
शाप से पृथ्वी पर अवतीर्ण पुष्पवन्त गण के द्वारा जब यह महाकथा को सुनेगा और
इसी प्रकार शाप से मनुष्यता को प्राप्त कर माल्यवान् को समस्त कथा प्रदान करेगा
(सुनाएगा ॥२१॥)
तब उन दोनों शाप-मुक्त गणों के साथ इस काणभूति का भी शाप-मोचन होगा। इस प्रकार
कुबेर ने शाप का अन्त किया ॥२२॥
‘हे प्रिये ! काणभूति से मिलते ही पुष्पवन्त के शाप का अन्त हो जायगा ऐसा तुमने
कहा था इसे स्मरण करो । शिव के इस वचन [को सुन कर मैं हर्ष के साथ यहाँ
आया ॥२३॥
इस प्रकार मेरा शापबोध पुष्पवन्त के मिलने तक था ।
ऐसा कहकर काणभूति के मौन होने पर उसी समय पूर्वजन्म का स्मरण करके वररुचि
मानों नींद से जगा और बोला—'मैं वही पुष्पवन्त हूँ। मुझसे वह कथा सुनो । ॥२४ २५॥
इस प्रकार कात्यायन ने सात लाख श्लोकों में सात महाकथाएँ काणभूति से कहीं ।
उन्हें सुनकर काणभूति ने कहा ॥२६॥
हे देव ! तुम सचमुच रुद्र के अवतार हो। उनके अतिरिक्त इन कथाओं को अन्य कौन
जानता है। तुम्हारी कृपा से मेरे शरीर से पिशाचत्व का शाप निकल रहा है ॥२७॥