जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
६ जातक ] ४५६
६ जातक ] ४५६
कहते हुए भी यह बार बार आग्रह किए जाने के कारण प्रव्रजित हो गया।
प्रव्रजित होने के दिन से फिर स्थविर उसे तंग करने लगा। उसने कष्ट
न सह सकने के कारण फिर चीवर त्याग दिया। अब स्थविर के अनेक
बार कहने पर भी उसने प्रव्रजित होना स्वीकार नही किया। बोला—मुझे
तू सहन भी नही कर सकता। मेरे बिना तू रह भी नही सकता। जा प्रव्रजित
नही होऊँगा।
भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! उस बच्चे का दिल
अच्छा था। महास्थविर के आशय को समझ कर वह प्रव्रजित नहीं हुआ।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बात-
चीत' कहने पर शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, यह केवल अभी सुहृदय नहीं है।
यह पहले भी सुहृदय ही था। एक बार उसका दोष देखकर उसे फिर ग्रहण
नही किया।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक गृहस्थ कुल में पैदा हुआ। बड़े होने पर धान्य बेच कर जीविका चलाने
लगा। एक सपेरा भी एक बन्दर को सिखा, औषध ग्रहण करवा, उसे तथा
सर्प को खिलाता हुआ जीविका चलाता था।
वाराणसी में उत्सव घोषित होने पर उसमें खेलने की इच्छा से
उस सपेरे ने वह बन्दर उस धान्य के व्यापारी को सौंपा और कहा—इसका
ख्याल रखना। उत्सव खेल आकर सातवें दिन उस व्यापारी के पास जाकर
पूछा—बन्दर कहाँ है ? बन्दर स्वामी की आवाज सुनते ही अनाज की दूकान
से जल्दी से निकला। उसने बन्दर को बाँस की छड़ी से पीठ पर मार घोर
लेकर उद्यान गया। वहाँ उसे एक तरफ बाँधा और सो गया। बन्दर ने
उसे सोता देख अपना बन्धन तोड़ा और भाग कर आम के वृक्ष पर चढ़ गया।
वहाँ उसने खूब आम खाकर गुठली सपेरे के शरीर पर गिराई। सपेरे ने उठ-
कर देखा तो सोचा कि मधुर वाणी से उस ठग वृक्ष से उतार पकडूंगा।
उसने उसे फुसलाते हुए पहली गाथा कही—
४६० [ २.१०.२४६
एकपुत्तको भविस्ससि
त्वञ्च नो हेस्ससि इस्सरो कुले,
ओरोह दुमस्मा सालक
एहि दानि घरफ यजेमसे ॥
अर्थ—तू मेरा एकपुत्रक होकर रहेगा। मेरे कुल में (भोगों का) स्वामी
होकर रहेगा। इस वृक्ष से उतर। आ, अपने घर चलें। सालक ! यह
नाम लेकर सम्बोधन किया है।
उसे सुनकर बन्दर ने दूसरी गाथा कही—
ननु मं हृदयतिमञ्ञसि
यञ्च मं हनसि वेलुमट्ठिया,
पक्कम्बवने रमामसे
गच्छ त्वं घरकं यथासुखं ॥
[ निश्चय से तू मुझे हृदय से बहुत चाहता है। तभी तो मुझे बांस की छड़ी
से मारता है। अब हम पके आम्रवन में रहेंगे। तू सुखपूर्वक घर जा । ]
ननु मं हृदयेंति मञ्जसि निश्चय से तू मुझे हृदय में बहुत मानता है।
मतलब है कि तू समझता है कि यह सुहृदय है। यञ्च मं हनसि वेलुलट्ठिया
इतना अधिक मानता है कि बांस की छड़ी से मारता है। इससे प्रकट करता
हूँ कि इस कारण से मैं नहीं आता हूँ। इसलिए हम इस पक्कम्बवने रमामसे
गच्छ त्वं घरकं यथासुखं यह कह कूद कर बन म चला गया।
सपेरा भी असन्तुष्ट हो अपन घर गया ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय बन्दर
शामणेर था । सपेरा महास्थविर । धान्य का व्यापारी तो में ही था ।
२५०. कपि जातक
कपि ] ४६१
२५०. कपि जातक
"अयं इसी उपसम सङ्कमे रतो " यह शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय एक ढोगी भिक्षु के बारे मे कही।
क वर्तमान कथा
उसका ढोग भिक्षुओ म प्रकट हो गया। भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत
चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु कल्याणकारी बुद्धशासन म प्रव्रजित हो
ढोग करता है। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, बैठ क्या बातचीत कर रहे
हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल
अभी ढोंगी नही है, यह पहले भी ढोगी रहा है। इसने जब यह वन्दर या केवल
आग के लिए ढोग किया। इतना कह पूर्व-जन्म की क्या कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशीदेश में ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ। बडे होने पर पुत्र के भागने दौड़ने में
समर्थ होने पर, ब्राह्मणी के मर जाने पर पुत्र को गोद मे ल हिमालय चला गया।
वहाँ ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो उस पुत्र को भी तपस्वीकुमार
बना पर्णशाला में रहने लगा। वर्षा ऋतु मे मूसलधार वर्षा होने के समय एक
बन्दर पीडित, दाँत फटफटाता हुआ, काँपता हुआ भटकता था। बोधिसत्त्व
बडे बडे लकड लाकर आग बना मन्च पर लेटा था। उसका पुत्र भी पाँव
दबाता हुआ बैठा था। वह बन्दर एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र ओढ पहन,
एक कन्धे पर अजिनचर्म रख, बैहगी तथा कमण्डल ले ऋषिवेष बना पर्णशाला
के द्वार पर जा आग के लिए ढोग करके खडा हुआ।
४६२ [ २.१०.२५०
तपस्वी कुमार ने उसे देखे 'तात ! एक तपस्वी शीत से पीड़ित है। काँप
रहा है। उसे यहाँ बुला। सेक लेगा' कहा। उसने पिता से प्रार्थना करते
हुए यह गाथा कही—
अयं इसी उपसमसंयमे रतो
संतिट्ठति सिसिरभयेन अट्टितो,
हन्द अयं पविसतुमं अगारकं
विनेतु सीतं दरथञ्च केवलं ।
[ यह ऋषि उपशमन में तथा संयम में लगा है। शीतभय से पीड़ित है।
यह इस घर में प्रवेश करे और अपने शीत तथा पीड़ा को दूर करे ।]
उपसमसंयमे रतो रागादि क्लेश के उपशमन में तथा शीलसंयम मे लगा
है। संतिट्ठति, वह ठहरता है। सिसिरभयेन वायु और वर्षा से उत्पन्न शीतभय
से। अट्टितो पीड़ित। पविसतुमं, यहाँ प्रवेश करे। केवलं सब।
बोधिसत्व ने पुत्र की बात सुन उठकर देखते हुए बन्दर का भाव समझ
दूसरी गाथा कही—
नायं इसी उपसमसंयमे रतो
कपी अयं दुमवरसाखगोचरो,
सो दूसको रोसकोचापि जम्मो
सचे वजे इमम्पिं दूसये घरं ॥
[ यह उपशमन तथा सयम मे लगा हुआ ऋषि नही । यह वृक्षो की शाखा
पर घूमने वाला बन्दर है। यह दूषित करने वाला है। यह क्रोध करने वाला
है। यह नीच है। यदि घर मे आए तो इस घर को भी दूषित करे ।]
दुमवरसाखगोचरो वृक्षो की शाखां पर घूमने वाला। सो दूसको रोसको
चापि जम्मो जहाँ जहाँ जाए उस उस जगह को दूषित करने वाला होने से दूसक।
झगड़ने वाला होने से रोसको, नीच होने से जम्मो। सचे वजे यदि इस पर्ण-
कपि ] ४६३
शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा
कर खराब कर दे ।
यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकड़ी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर
वन म प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नही गया । बोधिसत्त्व न
अभिञ्जा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को व सिन-परिकर्म सिखाया ।
उसने अभिञ्जा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । व दोनो ध्यान प्राप्त हो ब्रह्मलोक
परायण हुए ।
शास्ता न 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुरान समय से भी यह ढोगी ही
हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया । सत्यों के अन्त म कोई खोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी
हुए ।
उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।
कपि ] ४६३
शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा
कर खराब कर दे ।
यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकडी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर
वन में प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नहीं गया । बोधिसत्त्व ने
अभिज्ञा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को कसिन्-परिकर्म सिखाया ।
उसने अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । वे दोनो ध्यान-प्राप्त हो ब्रह्मलोक
परायण हुए ।
शास्ता ने 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुराने समय से भी यह ढोगी ही
हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया । सत्यो के अन्त में कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी
हुए ।
उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।