जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२१३. भरु जातक '
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२१३. भरु जातक '
"इसीनमन्तरं कत्वा. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
कोशल राजाओ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
भगवान् के भिक्षुसघ का लाभ तथा सत्कार बहुत था । जैसे कहा है—
"उस समय भगवान् का सत्कार होता था, गौरव होता था, मान होता था,
पूजा होती थी, आदर होता था और उन्हें चीवर, पिण्डपात (=भिक्षा),
शयनासन, रोगी की दवाई आदि चीजें मिलती थी, भिक्षुसघ का भी सत्कार
होता था, गौरव होता था, मान होता था, पूजा होती थी, आदर होता था और
उसे चीवर, पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे मिलती थी ।
लेकिन दूसरे तैथिक परिव्राजको का न सत्कार होता था, न गौरव होता था,
न मान होता था, न पूजा होती थी, न आदर होता था और न उन्हें चीवर,
पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे ही मिलती थी ।" इस
प्रकार जब उनका लाभ सत्कार जाता रहा तो वे दिन रात छिपकर इकट्ठे हो
विचार करते कि जब से श्रमण गौतम पैदा हो गया है तभी से हमारा लाभ
सत्कार जाता रहा, श्रमण गौतम को ही श्रेष्ठ लाभ तथा यश मिलता है ।
क्या कारण है कि इसे यह सब मिलता है ?
कुछ ने कहा—श्रमण गौतम सकल जम्बूद्वीप में उत्तम स्थान श्रेष्ठ-भूमि
पर रहता है । इसीसे उसे लाभ सत्कार की प्राप्ति होती है । बारी बोले—
यही कारण है। हम भी जेतवन मे तैथिक आश्रम बनवाएं । इससे हमको भी
लाभ होगा ।
उन सब ने 'यह ठीक है' निश्चय कर सोचा—यदि हम राजा को बिना
सूचित किए आश्रम बनवाएँगे तो भिक्षु रोक देंगे। घूस पाकर पक्षपात न
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करने वाला कोई नहीं है। इसलिए राजा को रिश्वत दे आश्रम के लिए जगह
लेंगे।
यह सलाह कर उपस्थापकों से माग राजा को लाख दे कहा—महाराज !
हम जेतवन में तैर्थिक-आश्रम बनाएँगे। यदि भिक्षु तुम्हें कहें कि हम बनाने
नहीं देंगे तो उनकी बात 'स्वीकार न करना।
राजा ने रिश्वत के लोभ से 'अच्छा' यह स्वीकार किया। तैर्थिकों ने
राजा को मिला बड़इयों को बुलवा काम शुरू किया। बड़ा शोर हुआ।
शास्ता ने पूछा—आनन्द ! यह हल्ला करने वाले, शोर मचाने वाले कौन हैं ?
“भन्ते ! अन्य तैर्थिक जेतवन में तैर्थिक-आश्रम बनवा रहे हैं। वही यह
शोर हो रहा है।”
“आनन्द ! यह स्थान तैर्थिकों के योग्य नहीं है। तैर्थिक शोर-प्रिय होते
हैं। उनके साथ रहना नहीं हो सकता।”
शास्ता ने भिक्षु-संघ को एकत्र कर कहा—भिक्षुओ, जाओ राजा को कह
कर तैर्थिक-आश्रम का बनवाना रुकवाओ।
भिक्षु जाकर राजा के प्रवेशद्वार पर खड़े हुए। राजा ने यह सुना कि
भिक्षु आए हैं तो यह समझ कर कि तैर्थिकों के आश्रम के ही बारे में आए
होंगे रिश्वत लिए रहने के कारण कहलवा दिया कि राजा घर में नहीं है।
भिक्षुओं ने जाकर शास्ता से कहा। शास्ता ने 'रिश्वत के कारण ऐसा करता
हैं' सोच दोनों प्रधान शिष्यों को भेजा। राजा ने उनका भी आना सुन वैसे ही
कहलवा दिया। उन्होंने भी आकर शास्ता से कहा।
‘सारिपुत्र ! अब राजा को घर में बैठना न मिलेगा, बाहर निकलना ही
होगा' कह शास्ता अगले दिन पूर्वाह्ण समय पहन कर, पात्र चीवर ले पांच सौ
भिक्षुओं के साथ राजा के प्रवेशद्वार पर पहुँचे। राजा ने सुना तो वह महल से
उतर पात्र ले शास्ता को (अन्दर) लिवा भिक्षुसंघ को, जिसमें मुख्य बुद्ध थे
यवागू-खाद्य दे शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने राजा को
एक तरह का धर्मोपदेश करते हुए कहा—महाराज ! पुराने राजाओं ने रिश्वत
ले शीलवानों में परस्पर झगड़ा कराया। वे अपने देश के स्वामी नहीं रहे और
महान् विनाश को प्राप्त हुए।
उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—