जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२०७. अस्सक जातक
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२०७. अस्सक जातक
“अयमसस्सकराजेन....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
पूर्व भार्य्या के प्रलोभन के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा—क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“हाँ, सचमुच ।”
“किसने उत्कण्ठित किया ?”
“पूर्व-भार्य्या ने ।”
शास्ता ने कहा—भिक्षु, उस स्त्री का तेरे प्रति स्नेह नहीं है। पहले भी
तू उसके कारण महान् दुख भोग चुका है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में काशी राष्ट्र के पोतली¹ नाम के नगर में अस्सक नामक
राजा राज्य करता था। उसकी उब्बरी नाम की पटरानी थी। वह प्रिया थी,
मनोज्ञ थी, सुन्दर थी, दर्शनीय थी और थी मानुषिक और दिव्य-वर्ण के बीच
के वर्ण की। यह मर गई। उसकी मृत्यु से राजा शोकाभिभूत हुआ। उसे
दुख हुआ और वह दौर्मनस्य को प्राप्त हुआ। उसने रानी का शरीर द्रोणी में,
तेल की काई में रखवा उसे अपनी चारपाई के नीचे रखवाया। फिर स्वयं
बिना कुछ खाए पीए रोता पीटता हुआ चारपाई पर पड रहा।
¹ ‘पोतल’ भी पाठ है।
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माता-पिता, अन्य नातेदार, मित्र अमात्य तथा ब्राह्मण गृहपति आदि
“महाराज ! सस्कार अनित्य है . ” कहते हुए उसे होश में न ला सके।
उसके रोते पीटते ही सात दिन बीत गए।
उस समय पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो के लाभी, तपस्वी होकर
हिमवन्त प्रदेश में विचरते हुए बोधिसत्त्व ने प्रकाश फैला दिव्य चक्षु से जम्बु
द्वीप को देखते हुए उस राजा को उस प्रकार रोते देखा। 'मुझे इसकी सहायता
करनी चाहिए' सोच ऋद्विबल से आकाश में उड राजा के बाग में उतर मङ्गल
शिला-पट पर सोने की प्रतिमा की तरह बैठे।
पोतली नगर वासी एक ब्राह्मण-माणवक उद्यान में जा बोधिसत्त्व को देख
प्रणाम करके बैठा।
बोधिसत्त्व ने उससे बातचीत कर पूछा—माणवक ! क्या राजा धार्मिक
हैं ?
“भन्ते ! हाँ राजा धार्मिक हैं। लेकिन उसकी भार्या मर गई हैं। वह
उसके शरीर को द्रोणी मे रखवा रोता पीटता लेटा है। आज उसे सातवाँ दिन
हो गया। तुम राजा को इस प्रकार के दुख से क्यो मुक्त नही करते ? क्या
यह ठीक है कि तुम्हारे जैसे शीलवान् के रहते राजा इस प्रकार का दुख अनु-
भव करे ?”
'माणवक ! में राजा को नही जानता। लेकिन यदि वह आकर मुझे
पूछे तो मैं उसे उसकी भार्या का जन्म ग्रहण करने का स्थान बताकर, राजा
के सामने ही उससे बातचीत करवाऊँ।"
“भन्ते ! तो में जब तक राजा को लेकर आऊँ तब तक आप यही बैठें।"
माणवक ने बोधिसत्त्व से बचन ले राजा के पास जा यह बात सुनाकर
कहा—उस दिव्य-चक्षुधारी के पास चलना चाहिए।
राजा यह सोच कि उब्बरी को देख सकूँगा सन्तुष्ट हो रथ पर चढ वहाँ
गया। बोधिसत्त्व को प्रणाम कर उसने पूछा—क्या तुम सचमुच देवी के जन्म
ग्रहण करने की जगह जानते हो ?
“महाराज ! हाँ।”
“वह कहाँ पैदा हुई हैं ?”
“महाराज ! उसने रूप मे मत्त होने के कारण, प्रमादवश कोई अच्छा
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काम नहीं किया। इसलिए वह इसी उद्यान में गोबर के कीड़े की योनि
में पैदा हुई।"
“मैं विश्वास नहीं करता।”
“तो तुझे दिखा कर उससे कहलवाता हूँ।”
“अच्छा, कहलवाएँ।”
बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से ऐसा किया कि दो गोबर-पिण्ड लुढ़कते हुए
राजा के सामने आएँ। वे चले आए। बोधिसत्त्व ने उसे दिखाते हुए कहा—
महाराज ! यह तेरी उब्ब्री देवी तुझे छोड़ गोबर के कीड़े के पीछे पीछे आती
है। उसे देखें।
“भन्ते ! मैं विश्वास नहीं करता कि उम्बरी गोबर के कीड़े की योनि में
जन्म ग्रहण करेगी।”
“महाराज ! उससे कहलवाता हूँ।”
“भन्ते ! कहलवाएँ।”
बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से उसे बुलवाते हुए पूछा—उब्ब्री ! उसने
मानुषी वाणी में कहा—हाँ भन्ते ! क्या ?
“पूर्व-जन्म में तेरा क्या नाम था ?”
“भन्ते ! मैं अस्सक राजा की उब्ब्री नाम की पटरानी थी।”
“इस समय तुझे अस्सक राजा प्रिय हैं या गोबर का कीड़ा।”
“भन्ते ! वह मेरा पूर्व-जन्म था; उस समय मैं उसके साथ इस बाग़ में
रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श का आनन्द लेती हुई विचरती थी। लेकिन
अब जब से मेरा नया जन्म हुआ है, वह मेरा क्या लगता है ? मैं अब अस्सक
राजा को मार कर उसकी गर्दन के खून से अपने स्वामी गोबर के कीड़े के पैरों
को धो सकती हूँ।”
यह कह परिषद् के बीच में आदमियों की भाषा में उसने यह गाथाएँ
कही—
अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया,
अनुकामनुकामेन पियेन पतिना सह ॥
नवेन, सुखदुक्खेन, पोरणं, अपिथीयति.,
तस्मा अस्सकरञ्ञाव कीटो पियतरो ममं ॥
अस्सक ] ३२६
[परस्पर एक दूसरे की कामना करते हुए अपने प्रिय पति इस अस्सक
राजा के साथ मैंने इस प्रदेश में विचरण किया। नए सुख दुःख से पुराना सुख
दुःख ढक जाता है। इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा यह कीड़ा ही मेरा
अधिक प्रिय है।]
अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया इस रमणीय उद्यान प्रदेश में पहले
मैंने अस्सक राजा के साथ विचरण किया। अनुकामयानुक़ामेन; अनु निपात
मात्र है। मैं उसकी कामना करती, वह मेरी कामना करता। इस प्रकार
परस्पर कामना करते हुए के साथ। पियेन उस जन्म में प्रिय।
नयेन सुखदुक्खेन पोराणं अपिधीयति, भन्ते ! नए सुख से पुराना सुख
नए दुःख से पुराना दुःख ढक जाता है। यही लोक-स्वभाव है—प्रगट करती
है। तस्मा अस्सकरञ्ञाय कीटो पियतरो मम; क्योंकि नवीन से पुराना ढक
जाता है इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा कीड़ा मुझे सौ गुणा प्रिय है।
इसे सुन अस्सक राजा को पश्चात्ताप हुआ। उसने वहाँ खड़े ही सड़े
लाश निकलवा सिर से स्नान कर बोधिसत्व को प्रणाम किया। फिर नगर
में प्रवेश कर दूसरी पटरानी बना धर्म से राज्य करने लगा।
बोधिसत्त्व भी राजा को उपदेश दे शोक-रहित कर हिमवन्त चले गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित (भिक्षु) सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित
हुआ।
• उस समय उव्वरी पूर्व-भार्य्या थी। अस्सक राजा उत्कण्ठित भिक्षु था।
माणवक सारिपुत्र। तपस्वी तो मैं ही था। *