जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१४३. विरोचन जातक
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१४३. विरोचन जातक
“लसी च ते निष्फलता...” इसे शास्ता ने वेळुवन में रहते समय
देवदत्त के गयाशीर्ष¹ पर सुगत (तथागत) की नकल करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जब देवदत्त का ध्यान (-बल) जाता रहा और उसको लोगों से जो प्राप्ति
होती थी वह बन्द हो गई तथा लोगों ने उसका सत्कार करना छोड़ दिया तो
उसने सोचकर एक उपाय निकाला। उसने बुद्ध से पाँच बातों² की याचना
की, जिन्हें शास्ता ने अस्वीकार किया। तब उसने दोनों अग्रश्रावकों³ के
पाँच सौ शिष्यो को जो अभी प्रव्रजित हुए तथा धर्म विनय से सुपरिचित न थे
बहकाया और उन्हें गयाशीर्ष पर ले जाकर संघ मे भेद पैदा कर एक सीमा⁴ में
पृथक विनय-कर्म⁵ करने लगा।
शास्ता ने उन भिक्षुओं के आने का समय देख दोनो अग्रश्रावको को
भेजा। उन्हें देख देवदत्त प्रसन्न हुआ। रात को धर्मोपदेश देते समय उसने
सोचा कि मैं बुद्ध की नकल करूँगा। वह बोला—सारिपुत्र ! भिक्षु-संघ
¹ गया का ब्रह्मयोनि पर्वत ।
² पाच बातें यह हं—(१) जिन्दगी भर वन में ही रहा करें (२) जिन्दगी
भर भिक्षा मांग कर ही खाएं (३) जिन्दगी भर फेंके चीथड़ों के ही चीवर
पहनें (४) जिन्दगी भर पेड़ के नीचे ही रहें (५) जिन्दगी भर मछली मास
न खाएं (चुल्लवग्ग, द्वितीय भाणवार)।
³ सारिपुत्र और मौद्गल्यायन ।
⁴ सीमित-प्रवेश ।
⁵ साधिक कर्म ।
विरोचन ] १११
आलस्य रहित हैं। तुम भिक्षु-गण को कुछ धर्मोपदेश करो। मेरी पीठ में
दर्द होता है। मैं इसे जरा तानूँगा।
इतना कह देवदत्त सो गया।
दोनो अग्रश्रावक उन भिक्षुओं को धर्मोपदेश दे (आर्य-) मार्ग और फल¹
के प्रति उनका ध्यान जागृत कर सभी को वेणुवन साथ ले गए।
कोकालिक ने जब देखा कि विहार खाली हो गया तब वह देवदत्त के पास
गया और बोला—"आयुष्मान् देवदत्त ! तेरे अनुयायियों में भेद पैदा कर
अग्रश्रावक तेरा विहार खाली कर चले गए। तू पड़ा सो ही रहा है।" उसने
उसकी चादर हटा दीवार में कील ठोकने की तरह उसकी छाती में एड़ी से
एक ठोकर लगाई। उसी समय उसके मुंह से खून गिर पड़ा। उसके बाद से
वह रोगी हो गया।
शास्ता ने स्थविर से पूछा—सारिपुत्र ! तुम्हारे जाने के समय देवदत्त
ने क्या किया ?
"भन्ते ! हमें देखकर देवदत्त ने सोचा कि बुद्ध की तरह व्यवहार करूँगा।
बुद्ध की नकल करता हुआ वह विनाश को प्राप्त हुआ।"
"सारिपुत्र ! देवदत्त केवल अभी मेरी नकल करने जाकर विनाश को
प्राप्त नहीं हुआ, पहले भी हुआ है।" इतना कह पूर्व-जन्म की
कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
केसरी (सिंह) होकर पैदा हुए और हिमालय की कञ्चनगुफा में रहने लगे।
एक दिन वे कञ्चनगुफा से निकल जम्भाई ले, चारो दिशाओं की ओर
नजर उठा, सिंहनाद कर शिकार के लिए निकले। उन्होंने एक बड़े भारी भैंसे
को मारा। उसका मांस खाया। फिर एक तालाब में उतर मणि-वर्ण जल
की डोल पूर्ण करते हुए की तरह गुफा की ओर प्रस्थान किया।
¹ श्रोतापत्ति मार्ग आदि चार आर्य-मार्गों के चार फल।
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शिकार के लिए निकले एक गीदड ने उन्ह एकाएक देखा । जब वह भाग
न सका तो यह केसरी के पैरो में जाकर गिर पडा ।
"जम्बुक ! क्या बात है ?"
"स्वामी ! मै आपके चरणो की सेवा करना चाहता हूँ।"
"अच्छा, आ मेरी सेवा कर । में तुझे अच्छे अच्छे मास खिलाऊँगा ।"
वह जम्बुक को कञ्चनगुफा में ले गया ।
गीदड तब से सिंह का मारा हुआ मास ही खाता रहा । कुछ ही दिन में
वह मोटा हो गया ।
एक दिन गुफा मे पडे ही पडे उसे केसरी ने कहा-"जम्बुक ! जा, पर्वत
की चोटी पर चढकर पर्वत के नीचे घूमनेवाले हाथी, घोडे तथा भैंसे आदि में से
जिस किसी का मास खाना चाहे, आकर मुझसे कह कि मै अमुक पशु का मास
खाना चाहता हूँ । ओर मुझे प्रणाम कर यह भी कह कि 'हे स्वामी ! अपना
पराक्रम दिखाएँ ।' में उसे मार, उसका मास खा, तुझे भी दूँगा ।"
गीदड पर्वत की चोटी पर चढ नाना प्रकार के पशुओ को देख जिसका
भी मास खाना चाहता कञ्चनगुफा में आकर सिंह से निवेदन कर उसके पाँव
में गिरकर कहता-स्वामी ! अपना पराक्रम प्रकट करें । सिंह जल्दी से
छलांग मारकर चाहे मस्त हाथी ही होता उसकी हत्या कर उसका मास स्वय
खाता ओर शृगाल को भी देता । गीदड पेट भर कर मास खा, गुफा में जा
सो रहता ।
इस प्रकार ज्यो ज्यो समय व्यतीत हुआ उसके दिल में अभिमान पैदा हो
गया । मेरे भी तो चार पैर है । मै क्यो रोज रोज दूसरे पर निर्भर रहता
हूँ । अब से मै भी हाथी आदि को मारकर मास खाऊँगा । सिंह भी 'हे मृगराज !
स्वामी ! अपना पराक्रम दिखाएँ' कहने पर ही हाथियो को मारता है, मै भी
सिंह से यह कहलवाऊँगा कि 'हे जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा' और एक
बडिया हाथी को मार उसका मास खाऊँगा ।
उसने शेर से कहा-स्वामी ! मैने बहुत देर तक आपके मारे हुए हाथियो
का मास खाया । मै भी एक हाथी को मारकर उसका मास खाना चाहता हूँ ।
जिस जगह आप कञ्चनगुफा में लेटते है, मै वहाँ लेट रहूँगा । आप पर्वत के
नीचे घूमनेवाले हाथी को देख मेरे पास आकर कहें 'जम्बुक ! अपना पराक्रम
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दिया।' इतनी सी बात के लिए अनुदार न हो।
सिंह ने कहा—जम्बुक ! तेरी सामर्थ्य हाथी मारने की नहीं है।
गीदड-कुल में पैदा होकर कोई गीदड हाथी को मारकर उसका मास खा सके,
ऐसा गीदड दुनिया में नहीं है। तू ऐसी इच्छा मत कर। मेरे द्वारा मारे जाने
वाले हाथियो का मास खाकर ही रह।
ऐसा कहने पर भी वह नहीं माना। बार बार कहता ही रहा।
सिंह ने जब देखा कि वह नहीं मानता तो स्वीकार कर कहा—अच्छा !
तो मेरी रहने की जगह पर जाकर लेट रह। जम्बुक को कञ्चनगुफा में लिटा
पर्वत की चोटी पर चढ मस्त हाथी को देख गुफा के द्वार पर जाकर कहा—
जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा।
श्रृगाल कञ्चनगुफा से निकला, जम्हाई ली, चारो ओर देखकर तीन
बार आवाज की। फिर मस्त हाथी के सिर पर आक्रमण करने जाकर उसके
पाँव में गिरा। हाथी ने दाहिना पाँव उठाकर उसके सिरपर रख दिया।
सिर की हड्डियाँ चूर चूर हो गईं।
उसके शरीर को हाथी ने पाँव से इकट्ठा किया, और उस पर लीद करके
चिंघाड़ता हुआ जगल मे चला गया।
बोधिसत्त्व ने यह हाल देख, 'जम्बुक ! अब अपना पराक्रम दिखा'
कह, यह गाथा कही—
लसी च ते निष्फलिता मत्थको च विदाळितो,
सब्बा ते फासुका भग्गा अज्ज खो त्वं विरोचसि ॥
[तेरे सिर का भेजा निकल गया है। मस्तक फट गया है। तेरी सभी
हड्डियाँ टूट गई हैं। आज तू अपना पराक्रम दिखा रहा है।]
लसी का मतलब है माथे का भेजा। निष्फलिता, निकल आई।
बोधिसत्त्व ने यह गाथा कही। जब तक जीवन था तब तक जीवित रह •
कर्मानुसार (परलोक) सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय गीदड देवदत्त था। सिंह मैं ही था।
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