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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१०१. परोसत जातक

पहला परिच्छेद
११. परोसत वर्ग
१०१. परोसत जातक
परोसतञ्चेपि समागतान
झापेयुं ते वस्ससत अपञ्‍ञा,
एकोव सेय्यो पुरिसो सपञ्‍ञो
यो भासितस्स विजानाति अत्थ ॥
[प्रज्ञाहीन शताधिक आये-हुए मनुष्य यदि सौ वर्ष तक भी ध्यान
लगाते रह तो उनकी अपेक्षा एक प्रज्ञावान् मनुष्य जो कही हुई बात के (गम्भीर)
अर्थ को जान लेता है, अच्छा है।]
कथा की दृष्टि से, व्याख्या ( व्याकरण ) की दृष्टि से, सारांश की
दृष्टि से यह जातक ( कथा ) परोसहस्स जातक¹ के समान ही है।
इसमें केवल 'ध्यान कर' पद की विशेषता है। जिसका अर्थ है कि प्रज्ञा-
रहित मनुष्य सौ वर्ष भी ध्यान करते रह, देखते रह, धारण करते रहें,
इस प्रकार देखते हुये भी वह गूढ (अर्थ) को अथवा (असली) बात को नहीं
देख पाते। इसलिए जो मनुष्य कही बात के अर्थ को जानता है वह प्रज्ञावान्
अकेला ही अच्छा है।


¹परोसहस्स जातक (६६)