जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
क. वर्तमान कथा
पलासी ] ३६६
क. वर्तमान कथा
वह शास्त्रार्थ करने के उद्देश्य से सारे जम्बूद्वीप मे घूमा। कोई शास्त्रार्थ
करने वाला न मिला। घूमता घूमता वह श्रावस्ती पहुँचा। यहाँ जाकर लोगो
से पूछा कि मेरे साथ कोई शास्त्रार्थ कर सकता है? मनुष्यो ने इस प्रकार बुद्ध
गुणों की प्रशसा की—तेरे जैसे हजार हो तो उनके साथ भी शास्त्रार्थ कर
सकने वाले, सर्वज्ञ, मनुष्यो म श्रेष्ठ, धर्मेश्वर, दूसरे वादो को जीतने वाले
महान् गौतम हैं। सारे जम्बूद्वीप मे भी उत्पन्न हुआ विरोधी मत उन भगवान्
को नही छूरा सकता। सभी मत उनके चरणो मे आने पर इस प्रकार चूर्ण
विचूर्ण हो जाते है जैसे लहरे किनारे पर पहुँच कर।”
परिव्राजक ने पूछा—इस समय वह कहाँ है? उत्तर मिला—जेतवन
म। उसने सोचा—अब उसके साथ शास्त्रार्थ करूँगा। बहुत से आदमियो
के साथ उसने जेतवन जाते समय, नो करोड खर्चे से जेत राजकुमार द्वारा
बनाया हुआ जेतवन-द्वार देखा। उसने पूछा—यही श्रमण गौतम के रहने
के प्रासाद हैं ?
"यह तो ड्योढी है।"
"यदि ड्योढी ऐसी है तो निवासस्थान कैसा होगा ?"
"गन्धकुटी तो असीम है।"
उसने सोचा ऐसे श्रमण से कौन शास्त्रार्थ करेगा! यह वही से भाग गया।
शोर मचाते हुए कुछ मनष्यो ने जेतवन मे प्रवेश किया। शास्ता ने पूछा—
क्यो असमय आए ? उन्होने वह समाचार कहा। शास्ता ने कहा—उपासको।
केवल अभी नही, यह पहले भी मेरे निवासस्थान की ड्योढी को ही देख कर
भाग गया था। उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल म गन्धार राष्ट्र म तक्षशिला में बोधिसत्त्व राज्य करते थे।
वाराणसी म था ब्रह्मदत्त। उसने तक्षशिला पर अधिकार करने की इच्छा
से बडी सेना के साथ जाकर, नगर के समीप पहुँच, सेना को यह आज्ञा देते हुए
कि 'इस तरह से हाथियों को भेजो, इस तरह से घोड़े, इस तरह से रथ, इस
तरह से पैदल, इस तरह दौड़ कर शस्त्रो से प्रहार करो तथा इस प्रकार
बादलो की घनी वर्षा की तरह बाणो की वर्षा बरसाओ' ये दो गाथाएँ
कही—
गजगमेघेहि हयग्गमालिहि
रयूमिलातेहि सराभिवस्सहि;
थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि
परिवारिता तक्कसिला समन्ततो ॥
अभिधावया च पतया च
विविधविनदिता च दन्तिहि;
वत्ततज्ज तुमुलो घोसो
यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो ॥
[ श्रेष्ठ हाथियो रूप बादलो से, उत्तम घोड़ो की पक्तियो से, रथो की
लहरो से, शरो की वर्षा से, तलवार धारी चारो ओर प्रहार करने वालो
से तक्षशिला को चारो ओर से घेर लो ।
दौडो, उदलो तथा नाना प्रकार के नाद करने वाले हाथियो द्वारा आज
तुमुल घोष करो, जैसे बिजली गर्जना करने वाले मेघो के साथ उछलती
कदती है।]
गजगमेघेहि श्रेष्ठ हाथियो रूप मेघो के द्वारा । क्रौञ्चनाद गर्जना
करने वाले, मस्त हाथियो रूप बादलो द्वारा, यही अर्थ है। हयग्गमालिहि
श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति द्वारा। श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति के समूह के द्वारा, अश्वो
की सेना के द्वारा, यही अर्थ है। रयूमिलातेहि लहरो के वेग वाले, सागर के
जल की तरह रथो की लहरो वाले—रथसेना यही मतलब है। सराभिवस्सहि
उन रथ-सेनाओ से मूसलधार बरसने वाले मेघ की तरह तीरो की वर्षा बर-
साते हुए। थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि इधर उधर से घूम कर दृढ प्रहार
करने वालो से, तलवार के दस्ते पकड़े हुए, पैदल योद्धाओ से । परिवारिता
तक्कसिला समन्ततो, जिस प्रकार यह तक्षशिला चारों ओर से घिर जाए,
वैसा करो ।
दुतियपलासी ] ४०१
अभिधावथा च पतथा च जल्दी से दौड़ो तथा कूदो। विविध विनन्दिता
च दन्तिहि धेष्ठ हाथियो के साथ नाना प्रकार से शोर मचाने वाले होओ।
सीटी बजाने, गरजने, बाजे बजाने आदि के नाना प्रकार के शब्द करो।
धत्तत्तज्ज तुमलो घोसो आज़ बिजली के सदृश महान् घोष हो। यथा विज्जुता
जलधरस्स गज्जतो जैसे गरजते हुए बादल के मुंह से निकली हुई बिजलियाँ
विचरण करती हैं, उसी प्रकार विचरते हुए, नगर को चारो ओर से घेर कर,
राज्य छीन लो,' यही अभिप्राय है।
वह राजा गरज कर सेना को आज्ञा दे नगर-द्वार के समीप गया। वहाँ
ड्योढी को देख कर उसने पूछा कि क्या यह राजा के रहने का स्थान है ?
यह 'ड्योढी है' सुन उसने सोचा—जब ड्योढी ऐसी है तो राजा का निवास-
स्थान कैसा होगा ? उत्तर मिला—वैजयन्त-प्रासाद जैसा। इस प्रकार के
ऐश्वर्यशाली राजा के साथ युद्ध न कर सकूँगा, सोच ड्योढी देख कर ही रुक,
भाग कर वाराणसी चला आया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वारा-
णसी राजा पलासी परिव्राजक था। तक्षशिला-राजा तो मैं ही था।
२३०. दुतियपलासी जातक
"धजमपरिमितं ...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय,
एक पलासी परिव्राजक के ही बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
इस कथा में वह परिव्राजक जेतवन में दाखिल हुआ। उस समय जन-
समूह से घिरे हुए, अलंकृत धर्मासन पर बैठे हुए, शास्ता मनोशिलातल पर
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