जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
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"भगवान् ! सचमुच ।"
"तुझे किसमें आसक्ति हुई ?"
"एक प्रौढ कुमारी में।"
"भिक्षु ! यह तेरे लिये अनर्थकारी है। पहले जन्म में भी तू इसी के
कारण सदाचार भ्रष्ट हो कांपता हुआ भटकता था। (फिर) पंडितो के
कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
"पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय" आदि
पूर्व समय की कथा भी चुल्ल नारद कस्सप जातक में ही आयेगी। उस समय
बोधिसत्त्व ग्राम को फल फूल ले आकर पर्ण-शाला में प्रवेश करके विचरने लगे
और अपने पुत्र चुल्लतापस को कहा—
"तात ! और दिन तो तुम लकडी लाते थे, पेय तथा खाद्य-सामग्री
लाते थे, आग जलाते थे। आज क्या कारण है कि कोई भी काम न करके
बुरा मुंह बनाये चिन्तित पडे हो ?"
"तात ! आप जब कल फल फूल लेने चले गये थे, तब एक स्त्री आई जो
मुझे लुभाकर ले जाना चाहती थी। लेकिन मैं 'आपसे आज्ञा लेकर जाऊँगा'
सोच नहीं गया। उसको अमुक स्थान में बिठाकर आया हूँ। तात ! अब
मै जाता हूँ।"
बोधिसत्त्व ने 'यह रोका नहीं जा सकता' सोच "तो तात ! जाओ !
यह तुम्हे ले जाकर जब मत्स्य-मांस आदि खाने की इच्छा करेगी और घी,
नमक तथा तेल आदि मांगेगी और कहगी कि 'यह ला', 'यह ला', तब
तू मुझे याद करना और भागकर यहाँ आ जाना" कह चलता किया। वह
उसके साथ बस्ती में गया। उसे अपने वश में कर वह 'मांस ला', 'मछली ला'
जो जो चाहती, मँगाती। तब उसने 'यह तो मुझे अपने गुलाम की तरह
नौकर की तरह पीडा देती है' सोच भागकर पिता के पास आ, उन्हें प्रणाम
कर, खडे ही खडे यह गाथा कही—
सुख बत म जीवन्त पचमाना उदञ्चनी,
घोरी जायप्पवादेन तेल लोणञ्च याचति ॥
उदञ्चनि ] ११
[ जल निकालने की मटकी सदृशा “भार्या” रूप में यह चोरिणी, सुख
पूर्वक रहते हुए मुझे मीठे शब्दों से लुभाकर नून तेल माँग माँगकर जलाती
है।]
सुख घट म जीवन्त, तात ! तुम्हारे पास सुखपूर्वक रहते हुए, पचमाना,
संतप्त करती हुई, पीडा देती हुई, जो जो खाना चाहती वह पकाती, उदकं
(=पानी) खींचा जाता है इस से, अत उदञ्चनी । चाटी या कुएँ से पानी
निकालने की घटी । उसे उदञ्चनी इसलिये कहा क्योकि वह घटी (=
घटिया) के पानी निकालने की तरह जो जो चाहती सो अवश्य निकालती ।
चोरी जाप्यवादेन; “नाम से तो 'भार्या' लेकिन एक चौरिणी मीठे मीठे
शब्दों से मुझे लुभा वहाँ ले जाकर निमक तेल तथा और भी जो जो चाहती
वह सब मांगती, जैसे दास या नौकर से वैसे मँगवाती । (यह) कह उसकी
निन्दा की ।
बोधिसत्व ने उसे आश्वासन देकर “तात ! जो हुआ सो हुआ । आ
अब तू मैत्री भावना कर । करुणा भावना कर ।” कह चारो ब्रह्मविहारो
को कहा । योगक्रिया कही । वह थोडे ही समय मे अभिञ्ज्ञा तथा समापत्तियो
को प्राप्त कर, ब्रह्मविहारो की भावना कर, अपने पिता सहित ब्रह्मलोक मे
उत्पन्न हुआ । शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित
कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के प्रकाशित होने पर वह भिक्षु श्रोता-
पत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय की प्रौढ कुमारी ही आजकल
की प्रौढकुमारी तथा चूलतापस ही आसक्त भिक्षु था । पिता तो मै
था ही ।