अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
(२६-२७)
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः.
समानं योनिमनु संचरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (२८)
सब को प्रसन्न करने वाला आदित्य सब से पहले का है. यह चराचर जगत् की कारण
रूप पृथ्वी पर और द्युलोक में विचरण करता रहता है. तात्पर्य यह है कि आदित्य इन दोनों में
व्याप्त है. सब की कारण बनी हुई पृथ्वी संचरण करते हुए हर्ष देने वाले आदित्य को मैं सात
होताओं द्वारा सभी दिशाओं में हवि प्रदान करता हूं. (२८)
शतधारं वायुमर्कं स्वर्विदं नृचक्षसस्ते अभि चक्षते रयिम्.
ये पृणन्ति प्र च यच्छन्ति सर्वदा ते दुहते दक्षिणां सप्तमातरम्.. (२९)
हे प्रेत! मनुष्यों को देखने वाले देवता टपकते हुए जल से युक्त वायु के वेग से चलते हुए
एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले इस कुंभ को तेरे लिए धन के रूप में जानते हैं. तेरे गोत्र वाले तुझे
इस कुंभ के जल से तृप्त करते हैं. कुंभोदक अर्थात् घड़े का जल देने वाले तुझे सात माताओं
रूपी जल धारा की दक्षिणा सदा प्रदान करते हैं. (२९)
कोशं दुहन्ति कलशं चतुर्बिलमिडां धेनुं मधुमतीं स्वस्तये.
ऊर्जं मदन्तीमदितिं जनेष्वग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन्.. (३०)
मनुष्यों के स्वभाव को जानने वाले बुद्धिमान मनुष्य अनेक प्रकार के दोनों के रूप में
पानी के समान बहाए जाने वाले, विचरण करते हुए और सुख देने वाले धन को प्राप्त करते
हैं. जो मनुष्य अपने को उस धन से सदा पूर्ण करते रहते हैं तथा उत्तम पात्र के लिए उस धन
का दान करते हैं, वे मनुष्य सात माताओं वाली दक्षिणा प्राप्त करते हैं. (३०)
एतत् ते देवः सविता वासो ददाति भर्तवे.
तत् त्वं यमस्य राज्ये वसानस्तार्प्यं चर.. (३१)
हे पुरुष! सवितादेव तुझे पहनने के लिए यह वस्त्र प्रदान करते हैं. तू इस तृप्ति देने वाले
वस्त्र को पहन कर यम के राज्य में विचरण कर. (३१)
धाना धेनुरभवद् वत्सो अस्यास्तिलोऽभवत्.
तां वै यमस्य राज्ये अक्षितामुप जीवति.. (३२)
हे प्रेत! मंत्रों के अनुसार दिए गए धान यमलोक में जा कर तृप्त करने वाली गाय बनते
हैं और तिल उस धन रूपी गाय का बछड़ा बनता है. प्रेत यम के राज्य में उन धानों से बनी
हुई गाय पर ही आश्रित होता हुआ जीवित रहता है. (३२)
एतास्ते असौ धेनवः कामदुघा भवन्तु.
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एनीः श्येनीः सरूपा विरूपास्तिलवत्सा उप तिष्ठन्तु त्वात्र.. (३३)
हे पुरुष! ये गाएं तेरे लिए कामनाएं पूर्ण करने वाली हों. लाल और श्वेत रंग वाली,
समान और भिन्न रंग वाली तथा अनेक रूपों वाली इन गायों का तिल बछड़ा है. ऐसी गाएं तेरे
निवास स्थान में नित्य तेरे समीप रहें तथा तेरी सेवा करती रहें. (३३)
एनीर्धाना हरिणीः श्येनीरस्य कृष्णा धाना रोहिणीर्धेनवस्ते.
तिलवत्सा ऊर्जमस्मै दुहाना विश्वाहा सन्तवनपस्फुरन्तीः.. (३४)
हे प्रेत! ये हरे रंग वाले धान तेरे लिए लाल श्वेत रंग वाली गाएं बन जाएं. काले धान
लाल रंग की गाएं बनें और तिल उन के बछड़े हों. इस प्रकार की गाएं कभी नष्ट नहीं होतीं. वे
तेरे लिए सदा बल देने वाला दूध देती रहें. (३४)
वैश्वानरे हविरिदं जुहोमि साहसं शतधारमुत्सम्.
स बिभर्ति पितरं पितामहान् प्रपितामहान् बिभर्ति पिन्वमानः.. (३५)
मैं वैश्वानर अग्नि में यह हवि डालता हूं. ये हवि सैकड़ों हजारों धाराओं वाले सोने के
समान हैं. वैश्वानर अग्नि इस हवि से तृप्त हुए हैं. यह अग्नि हमारे पिताओं, पितामहों तथा
प्रपितामहों का पोषण करते हैं. (३५)
सहस्रधारं शतधारमुत्समक्षितं व्यच्यमानं सलिलस्य पृष्ठे.
ऊर्जं दुहानमनपस्फुरन्तमुपासते पितरः स्वधाभिः.. (३६)
पितर सैकड़ों व हजारों धाराओं वाले सोते के समान जो अंतरिक्ष के ऊपर व्याप्त है
तथा अन्न जल को देने वाली है, उस का सेवन स्वधाओं के साथ करते हैं. (३६)
इदं क्साम्बु चयनेन चितं तत् सजाता अव पश्यतेत.
मर्त्यो ऽ यममृतत्वमेति तस्मै गृहान् कृणुतु यावत्सबन्धु.. (३७)
हे समान गोत्र वालो! इस एकत्र आस्था समूह को ध्यान से देखो. यह प्रेत अमरत्व को
प्राप्त हो रहा है. तुम सब इस के लिए घर का निर्माण करो. (३७)
इहैवैधि धनसनिरिहचित्त इहक्रतुः. इहैधि वीर्यवत्तरो वयोधा अपराहतः..
(३८)
हे मनुष्य! तू यहीं पर वृद्धि प्राप्त कर. तू यहीं पर ज्ञानवान हुआ है. तू यहीं कर्म करता
हुआ हमें धन प्रदान कर. तू यहीं पर अतिशय बलवान बना तथा शत्रुओं से पराजित नहीं
हुआ. तू अन्न को धारण करने वाला एवं दीर्घ आयु वाला हो कर वृद्धि प्राप्त कर. (३८)
पुत्रं पौत्रमभितर्पयन्तीरापो मधुमतीरिमाः.
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स्वधां पितृभ्यो अमृतं दुहाना आपो देवीरुभयांस्तर्पयन्तु.. (३९)
यह मधुर जल पुत्र, पौत्र आदि को पूर्ण तृप्त करता है, ये दिव्य पितरों के लिए स्वधा
तथा अमृत का दोहन करते हुए पुत्र और पौत्र दोनों को तृप्त करें. (३९)
आपो अग्निं प्र हिणुत पितॄँरुपेमं यज्ञं पितरो मे जुषन्ताम्.
आसीनासूर्जमुप ये सचन्ते ते नो रयिं सर्ववीरं नि यच्छान्.. (४०)
हे जल! अग्नि को पितरों के पास भेजो. मेरे पितृगण इस यज्ञ का सेवन करते हैं. जो
पितर हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए अन्न का सेवन करते हैं, वे हमें निरंतर वीरत्व तथा धन
संपत्ति देते रहें. (४०)
समिन्धते अमर्त्यं हव्यवाहं घृतप्रियम्.
स वेद निहितान् निधीन् पितॄन् परावतो गतान्.. (४१)
मरणधर्म से रहित अर्थात् अमर और घी को प्रेम करने वाली तथा हव्यों को वहन करने
वाली अग्नि को पितृगण प्रदीप्त करते हैं. ये अग्नि दूर चले गए पितरों को जानते हैं. (४१)
यं ते मन्थं यमोदनं यन्मांसं निपृणामि ते.
ते ते सन्तु स्वधावन्तो मधुमन्तो घृतश्रुतः.. (४२)
हे प्रेत! मैं तेरे लिए जो मंथ अर्थात् दही मथने से प्राप्त मक्खन दे रहा हूं, यह तुझे स्वधा
और घृत से संपन्न हो कर प्राप्त हो. (४२)
यास्ते धाना अनुकिरामि तिलमिश्राः स्वधावतीः.
तास्ते सन्तूद्ध्वीः प्रभूवीस्तास्ते यमो राजानु मन्यताम्.. (४३)
हे प्रेत! ये काले तिलों से मिश्रित तथा स्वधा से पूर्ण खीलें परलोक की प्राप्ति पर तुझे
विस्तृत रूप में प्राप्त हों. यमराज तुझे इन को खाने की अनुमति दें. (४३)
इदं पूर्वमपरं नियानं येना ते पूर्वे पितरः परेताः.
पुरोगवा ये अभिषाचो अस्य ते त्वा वहन्ति सुकृतामु लोकम्.. (४४)
इस लोक में प्राणी जिस के माध्यम से यात्रा करते हैं, मृतक को ढोने वाली वह गाड़ी
प्राचीन और नवीन दोनों प्रकार की है. हे प्रेत! इसी के द्वारा तेरे पूर्व पुरुष ढोए गए थे. इस के
दोनों ओर जोड़े गए दोनों बैल तुझे पुण्यात्माओं का लोक प्राप्त कराएं. (४४)
सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने.
सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (४५)
मृतक का दाह संस्कार करने वाले पुरुष अग्नि की इच्छा करते हुए सरस्वती का
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आह्वान करते हैं. ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों के अवसर पर भी सरस्वती का आह्वान किया जाता
है. वे सरस्वती हवि देने वाले यजमान को वरण करने योग्य पदार्थ प्रदान करें. (४५)
सरस्वतीं पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः.
आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वमनमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (४६)
वेदी के दक्षिण भाग में बैठे हुए पितर भी सरस्वती का आह्वान करते हैं. हे पितरो! तुम
इस यज्ञ में प्रसन्नता प्राप्त करो. हे सरस्वती! तुम पितरों के द्वारा बुलाए जाने पर हमें मन चाहे
अन्न से प्रतिष्ठित करो. (४६)
सरस्वति या सरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती.
सहस्रार्घमिडो अत्र भांग रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (४७)
हे सरस्वती! तुम उक्थ, शस्त्र और स्वधा रूप अन्न से तृप्त होती हुई पितरों सहित एक
ही रथ पर बैठ कर आती हो. तुम यजमान को वह अन्न प्रदान करो जो अनेक व्यक्तियों को
तृप्त कर सके. (४७)
पृथिवीं त्वा पृथिव्यामा वेशयामि देवो नो धाता प्र तिरात्यायुः.
परापरैता वसुविद् वो अस्वधा मृताः पितृषु सं भवन्तु.. (४८)
हे मिट्टी से बने हुए मृत पुरुष! मैं तुझे मिट्टी में मिलाता हूं अर्थात् जला कर तेरे शरीर
को राख कर के मिट्टी में मिलाता हूं अथवा तुझे मिट्टी में गाड़ता हूं. धाता देवता यज्ञ का
अनुष्ठान करने वाले हम सब की आयु बढ़ाएं. हे दूर लोक में वास करने वाले पितरो! धाता
देव तुम्हारे लिए निवास स्थान देने वाले हों. तुम पितरों में भलीभांति जा कर मिलो. (४८)
आ प्र च्यवेथामप तन्मृजेथां यद् वामभिभा अत्रोचुः.
अस्मादेतमध्यौ तद् वशीयो दातुः पितृष्विहभोजनौ मम.. (४९)
हे प्रेत का वहन करने वाले बैलो! तुम हमारे सामने ही इस गाड़ी से अलग हो जाओ
तथा प्रेत की सवारी करने से संबंधित निंदा वचनों से छूट जाओ. तुम इस गाड़ी सहित हमारे
पास आओ. तुम्हारा आना शुभ हो. इस पितृमेध यज्ञ में पितरों के लिए हवि देने वाले बनो.
(४९)
एयमगन् दक्षिणा भद्रतो नो अनेन दत्ता सुदुघा वयोधाः.
यौवने जीवानुपपृञ्चती जरा पितृभ्य उपसंपराणयादिमान्.. (५०)
यह संस्कार करने वालों के पास यह गौ रूप दक्षिणा आ रही है. सुंदर फल और दूध
रूपी अन्न को देती हुई यह गौ वृद्धावस्था में भी युवती रहे. संस्कार किए गए पुरुष को यह
पूर्व काल के पितरों के पास पहुंचाए. (५०)
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इदं पितृभ्यः प्र भरामि बर्हिर्जीवं देवेभ्य उत्तरं स्तृणामि.
तदा रोह पुरुष मेध्यो भवन् प्रति त्वा जानन्तु पितरः परेतम्.. (५१)
संस्कार करने वाले पुरुष! पितरों और देवताओं के जीवन की कामना करता हुआ मैं
कुशों को फैलाता हूं. हे मृत पुरुष! तू योग्य होता हुआ इन कुशाओं पर बैठा. पितर यहां से
गए हुए तुझ प्रेत को इन कुशों पर बैठने की अनुमति दें. (५१)
एदं बर्हिरसदो मेध्यो ऽ भूः प्रति त्वा जानन्तु पितरः परेतम्.
यथापरु तन्वं १ सं भरस्व गात्राणि ते ब्रह्मणा कल्पयामि.. (५२)
हे प्रेत! चिता के समीप बिछे हुए कुशों पर बैठ कर तू पवित्र हो गया है. तू दहन से शुद्ध
हो गया है. यहां से गए हुए पितर तुझ को जान लें. तू जोड़ों के अनुसार अपने शरीर को पूर्ण
कर. मैं मंत्रों के द्वारा तेरे अंगों को समर्थ बनाता हूं. तात्पर्य यह है कि मैं मंत्रों के द्वारा तुझे
शक्ति प्रदान करता हूं. (५२)
पर्णो राजापिधानं चरुणामूर्जो बलं सह ओजो न आगन्.
आयुर्जीवेभ्यो वि दधद् दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (५३)
ढाक का पत्ता चरुओं का ढक्कन है. इस पलाश पत्र से हमें अन्न, बल, शत्रु का नाश
करने का सामर्थ्य तथा तेज प्राप्त हो. यह पलाश पत्र हमें सौ वर्ष की आयु वाला बनाए. (५३)
ऊर्जो भागो य इमं जजानाश्मान्नानामाधिपत्यं जगाम.
तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः स नो यमः प्रतरं जीवसे धात्.. (५४)
चरु रूप अन्न के अधिकारी जिन यमराज ने इसे प्रेत बनाया है, जो यम इन चरुओं को
ढकने वाले पत्थरों के स्वामी हैं, हे बंधुओ! उन यम देव को हवियों के द्वारा संतुष्ट करो. वे
दीर्घ जीवन के हेतु हमारा पोषण करे. (५४)
यथा यमाय हर्म्यमवपन् पञ्च मानवाः.
एवा वपामि हर्म्यं यथा मे भूर्यो ऽ सत.. (५५)
जिस प्रकार पांच मनुष्यों ने यमराज के लिए घर बनाया है, उसी प्रकार मैं भी घर
बनाता हूं. इस प्रकार मेरे बहुत से घर हो जाएं. (५५)
इदं हिरण्यं बिभृहि यत् ते पिताबिभः पुरा.
स्वर्गं यतः पितुर्हस्तं निर्मृग्ढि दक्षिणम्.. (५६)
हे मरणासन्न पुरुष! तू इस सोने को धारण कर, जिसे तेरे पिता ने पहले धारण किया
था. हे पुरुष! तू स्वर्ग को जाते हुए अपने पिता के दाएं हाथ को सुशोभित कर. (५६)
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ये च जीवा ये च मृता ये जाता ये च यज्ञियाः.
तेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु मधुधारा व्युन्दती.. (५७)
जो जीवित हैं, जो मर गए हैं, जो उत्पन्न हुए हैं तथा जो भविष्य में जन्म लेने वाले हैं,
इन सब के लिए उमड़ती हुई जलधारा वाली छोटी नदी प्राप्त हो. (५७)
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सूरो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः.
प्राणः सिन्धूनां कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्दिमाविशन्मनीषया.. (५८)
स्तुति करने वालों को मनचाहा फल देने वाला सोम कपड़े से छान कर तैयार किया
जाता है. यह सोम दिन और रात्रियों को प्रेरित करने वाला है. उषाकाल और प्रकाश को भी
यही बढ़ाता है. यह नदियों के जलों का प्राण है. कलशों की ओर जाता हुआ यह सोम बहुत
शब्द करता है. यह सोम तीनों सवनों में पूज्य इंद्र के पेट में प्रवेश करे. (५८)
त्वेषस्ते धूम ऊर्णोतु दिवि षञ्छुक्र आततः.
सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे.. (५९)
हे प्रेत! तेरा धुआं मेघ का रूप धारण कर के अंतरिक्ष को ढक ले. तुम स्तुति के कारण
प्रदीप्त हो कर सूर्य के समान प्रकाशित होते हो. (५९)
प्र वा एतीन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतिं सखा सख्युर्न प्र मिनाति संगिरः.
मर्य इव योषाः समर्षसे सोमः कलशे शतयामना पथा.. (६०)
कपड़े से छनता हुआ यह सोम इंद्र के पेट में जाता है. यह यज्ञ करने वाले के लिए मित्र
के समान है तथा उस की इच्छित कामना यह व्यर्थ नहीं करता. यह सोम पुरुष के स्त्री से
मिलने के समान सहस्रों धाराओं में मिलता है. (६०)
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रियाँ अधूषत.
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा यविष्ठा ईमहे.. (६१)
कुशों पर रखे गए पिंडों को खा कर पितर तृप्त हुए तथा उन्होंने अपने शरीरों को कंपित
किया. इस के पश्चात वे हमारी प्रशंसा करने लगे. उन तृप्त पितरों से हम अपने लिए मनचाहे
वरदान की याचना करते हैं. (६१)
आ यात पितरः सोम्यासो गम्भीरैः पथिभिः पितृयाणैः.
आयुरस्मभ्यं दधतः प्रजां च रायश्च पोषैरभि नः सचध्वम्.. (६२)
हे पितरो! आप सोमरस प्राप्त करने योग्य हो. तुम गंभीर पितृयानों से आ कर पिंडदान
के लिए बिछाए गए कुशों पर तिल बिखेरने वाले हमें दीर्घ जीवन तथा पुत्रों एवं पौत्रों के रूप
में संतान प्रदान करो तथा हमें धन की समृद्धि से मिलाओ. (६२)
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परा यात पितरः सोम्यासो गम्भीरैः पथिभिः पूर्व्याणैः.
अधा मासि पुनरा यात नो गृहान् हविरत्तुं सुप्रजसः सुवीराः.. (६३)
हे सोमरस प्राप्त करने के अधिकारी पितरो! तुम पितृयानों से अपने लोक को गमन
करो तथा अमावस्या के दिन हवि भक्षण करने हेतु हमारे घर पुनः आना. हमारे घर शोभन
पुत्रों और उत्तम वीरों से युक्त हों. (६३)
यद् वो अग्निरजहादेकमङ्गं पितृलोकं गमयंजातवेदाः.
तद् व एतत् पुनरा प्याययामि साङ्गाः स्वर्गे पितरो मादयध्वम्.. (६४)
हे प्रेत! तुम्हारे जिस अंग को अग्नि ने दूर फेंक कर भस्म नहीं किया है. उसे मैं पुनः
अग्नि में डाल कर तुम्हारी वृद्धि करता हूं. तूम पूर्ण अंग वाले हो कर स्वर्ग की ओर गमन
करते हुए प्रसन्नता प्राप्त करो. (६४)
अभूद् दूतः प्रहितो जातवेदाः सायं न्यह्न उपवन्द्यो नृभिः.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि.. (६५)
हम ने प्रातः और सायं काल वंदना के योग्य अग्नि को दूत बना कर पितरों के पास
भेजा है. हे अग्नि! हमारी हवियों को तुम पितरों को प्रदान करो. हे अग्नि! वे पितर उन
हवियों का सेवन करें. इस के पश्चात जो हवि तुम्हें दी गई है, तुम भी उस का सेवन करो.
(६५)
असौ हा इह ते मनः ककुत्सलमिव जामयः.
अभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (६६)
हे प्रेत! तेरा मन उस श्मशान में है. हे श्मशान भूमि! इस प्रेत को तुम उसी प्रकार ढको,
जिस प्रकार स्त्रियां अपने कंधों को वस्त्र से ढकती हैं. (६६)
शुम्भन्तां लोकाः पितृषदनाः पितृषदने त्वा लोक आ सादयामि.. (६७)
हे प्रेत! तेरे बैठने के लिए पितरों के लोक प्रकट हों. मैं तुझे उसी लोक में प्रतिष्ठित
करता हूं. (६७)
ये ३ स्माकं पितरस्तेषां बर्हिरसि.. (६८)
हे कुश! तू हमारे पूर्वज पितरों के बैठने का स्थान बन. (६८)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय.
अधा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (६९)
हे वरुण! तुम अपने उत्तम, मध्यम और निकृष्ट पाशों अर्थात् फंदों को हम से दूर रखो.
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तुम्हारे पाशों से छूटते हुए हम तुम्हारी सेवा करें तथा कोई हमारी हिंसा न करे. (६९)
प्रास्मत् पाशान् वरुण मुञ्च सर्वान् यैः समामे बध्यते यैर्व्यामे.
अधा जीवेम शरदं शतानि त्वया राजन् गुपिता रक्षमाणाः.. (७०)
हे वरुण! जिन पाशों अर्थात् फंदों से मनुष्य जकड़ जाता है, उन्हें हम से दूर रखो.
तुम्हारे द्वारा रक्षित हुए तथा भविष्य में तुम से रक्षा प्राप्त करते हुए हम सौ वर्ष की आयु प्राप्त
करें. (७०)
अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः.. (७१)
कव्य वहन करने वाले अग्नि को स्वधा युक्त हवि प्राप्त हो. हम अग्नि को नमस्कार
करते हैं. (७१)
सोमाय पितृमते स्वधा नमः.. (७२)
श्रेष्ठ पिता वाले अग्नि को स्वधा और नमस्कार है. (७२)
पितृभ्यः सोमवद्भ्यः स्वधा नमः.. (७३)
सोमवान पितरों के लिए स्वधा व नमस्कार है. (७३)
यमाय पितृमते स्वधा नमः.. (७४)
उत्तम पिता वाले यम के लिए स्वधा और नमस्कार है. (७४)
एतत् ते प्रततामह स्वधा ये च त्वामनु.. (७५)
हे प्रपितामह तुम्हारे लिए दिया हुआ यह पदार्थ स्वधा हो. जो तुम्हारे अनुगामी हैं, उन के
लिए भी यह स्वधा हो. (७५)
एतत् ते ततामह स्वधा ये च त्वामनु.. (७६)
हे पितामह! तुम्हारे लिए दिया हुआ यह पदार्थ स्वधा हो. (७६)
एतत् ते तत स्वधा.. (७७)
हे पिता! तुम्हारे लिए यह हवि स्वधा हो. (७७)
स्वधा पितृभ्यः पृथिविषद्व्यः.. (७८)
पृथ्वी पर बैठने वाले पितरों के लिए यह हवि स्वधा हो. (७८)
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स्वधा पितृभ्यो अन्तरिक्षसद्भ्यः.. (७९)
अंतरिक्ष में स्थित पितरों के लिए यह हवि स्वधा हो. (७९)
स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भ्यः.. (८०)
द्युलोक में स्थित पितरों के लिए हवि स्वधा हो. (८०)
नमो वः पितर ऊर्जे नमो वः पितरो रसाय.. (८१)
हे पितरो! तुम्हारे अन्न अथवा बल के लिए नमस्कार है. हे पितरो! तुम्हारे रस और अन्न
के लिए नमस्कार है. (८१)
नमो वः पितरो भामाय नमो वः पितरो मन्यवे.. (८२)
हे पितरो! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. हे पितरो! तुम्हारे मन्यु अर्थात् आक्रोश के
लिए नमस्कार है. (८२)
नमो वः पितरो यद् घोरं तस्मै नमो वः पितरो यत् क्रूरं तस्मै.. (८३)
हे पितरो! तुम्हारा जो घोर कर्म है, उस के लिए नमस्कार है. हे पितरो! तुम्हारा जो क्रूर
कर्म है उस के लिए नमस्कार है. (८३)
नमो वः पितरो यच्छिवं तस्मै नमो वः पितरो यत् स्योनं तस्मै.. (८४)
हे पितरो! तुम्हारा जो कल्याणमय कर्म है, उस के लिए नमस्कार है. हे पितरो! तुम्हारा
जो सुखमय कर्म है, उस के लिए नमस्कार है. (८४)
नमो वः पितरः स्वधा वः पितरः.. (८५)
हे पितरो! तुम्हारे लिए नमस्कार है. हे पितरो! तुम्हारे लिए स्वधा प्राप्त हो. (८५)
ये ऽ त्र पितरः पितरो ये ऽ त्र यूयं स्थ युष्मांस्ते ऽ नु युयं तेषां श्रेष्ठा
भूयास्थ.. (८६)
ये अन्य पितर यहां हैं. जो पितृगण यहां पर हैं. अन्य पितर तुम्हारे अनुकूल हों. (८६)
य इह पितरो जीवा इह वयं स्मः. अस्मांस्ते ऽ नु वयं तेषां श्रेष्ठा भूयास्म..
(८७)
जो पितर यहां हैं, उन के अनुग्रह से हम यहां जीवित हैं. ये पितर हमारे अनुकूल बने
रहें. हम उन में श्रेष्ठ हैं. हम दोनों मिल कर परस्पर श्रेष्ठ हों. (८७)
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आ त्वाग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजरम्.
यद् घ सा ते पनीयसी समिद् दीदयति द्यवि.
इषं स्तोतृभ्य आ भर.. (८८)
हे प्रकाशमान अग्नि! तुम चमकने वाली और जरा रहित हो. हम तुम्हें प्रकाशित करते
हैं. तुम्हारी अत्यधिक प्रशंसनीय दीप्ति अंतरिक्ष में प्रकाशित हो रही है. हे अग्नि! जो तुम्हारी
स्तुति करते हैं, उन के लिए तुम अन्न प्रदान करो. (८८)
चन्द्रमा अप्स्व १ न्तरा सुपर्णो धावते दिवि.
न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (८९)
सुंदर किरणों वाला चंद्रमा जलों के भीतर निवास करता हुआ दौड़ता रहता है. हे द्यावा
पृथ्वी! तुम्हारी स्थिति को सोने के चमकीले सीमा भाग वाली बिजलियां प्राप्त नहीं कर पाती
हैं. तुम दोनों मेरी इस स्तुति को जानो. (८९)
सूक्त पहला देवता—यज्ञ
उन्नीसवां कांड
सूक्त पहला देवता—यज्ञ
सं सं स्रवन्तु नद्य १: सं वाता: सं पतत्रिण:.
यज्ञमिमं वर्धयता गिर: संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (१)
नाद करती हुई सरिताएं भलीभांति प्रवाहित हों. वायु हमारे अनुकूल बहे. पक्षी आदि
सभी प्राणी हमारे अनुकूल आचरण करें. हे स्तुति किए जाते हुए देवो! जिस यजमान के
निमित्त यह यज्ञ रूप शांति कर्म किया जा रहा है, तुम पुत्र, पशु आदि से उस की वृद्धि करो.
मैं आप देवों के उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (१)
इमं होमा यज्ञमवतेमं संस्रावणा उत.
यज्ञमिमं वर्धयता गिर: संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (२)
हे आहुतियो! तुम इस यज्ञ की रक्षा करो. हे घृत, क्षीर आदि! तुम इस यज्ञ का पालन
करो. हे देवो! फल की कामना वाले इस यजमान की रक्षा करो. इस यजमान की पुत्र, पशु
आदि से वृद्धि करो. मैं आप देवों के उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में
आहुति देता हूं. (२)
रूपंरूपं वयोवय: संरभ्यैनं परि ष्वजे.
यज्ञमिमं चतस्र: प्रदिशो वर्धयन्तु संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (३)
मैं फल की कामना करने वाले तथा यज्ञ कर्म के प्रयोजक यजमान को पशु, पुत्र आदि
फलों से संबद्ध करता हूं. चारों दिशाएं एवं उन दिशाओं में निवास करने वाले जन इस
यजमान को अभिलषित फल प्रदान करें. मैं आप देवों के उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त
हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (३)
सूक्त-२ देवता—आप अर्थात् जल
शं त आपो हैमवती: शमु ते सन्तूत्स्या:.
शं ते सनिष्यदा आप: शमु ते सन्तु वर्ष्या:.. (१)
हे यजमान! हिमवान पर्वत से आए हुए जल, झरनों के जल तथा सदा बहने वाले जल
तेरे लिए सुख करने वाले हों. वर्षा के जल भी तेरा कल्याण करने वाले हों. मैं आप देवों के
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उद्देश्य से घृत, क्षीर आदि से युक्त हवि की अग्नि में आहुति देता हूं. (१)
शंतं त आपो धन्वन्त्या ३: शं ते सन्तन्त्वनूप्याः
शं ते खनित्रिमा आपः शं याः कुम्भेभिराभृताः.. (२)
हे यजमान! मरुस्थल के जल तथा जल वाले प्रदेश के जल तेरे लिए कल्याणकारी हों.
कुएं, तालाब आदि के जल तुझे सुख देने वाले बनें. घड़ों के द्वारा लाए गए जल भी तेरा
कल्याण करें. (२)
अनभ्रयः खनमाना विप्रा गम्भीरे अपसः.
भिषग्भ्यो भिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि.. (३)
खोदने के साधनों में कुदाल आदि से रहित एवं लकड़ी, हाथों और पैरों से खोदने में
समर्थ एवं असाध्य कर्मों को भी मंत्र के बल से सिद्ध करने वाले हम मेधावी ब्राह्मण वैद्यों से
बढ़ कर वैद्य हैं. हम जलों की वंदना करते हैं. (३)
अपामह दिव्यानामपां स्रोतस्यानाम्.
अपामह प्रणेजने ऽ श्वा भवथ वाजिनः.. (४)
हे ऋत्विजो! तुम आकाश से बरसने वाले, नदियों में बहने वाले तथा अन्य प्रकार के
जलों और तेज दौड़ने वाले घोड़ों के समान इस जल शक्ति वाले यज्ञ कर्म में शीघ्रता करने
वाले बनो. (४)
ता अपः शिवा अपो ऽ यक्ष्मंकरणीरपः.
यथैव तृप्यते मयस्तास्त आ दत्त भेषजीः.. (५)
हे ऋत्विजो! प्रसिद्ध, कल्याण करने वाले तथा यक्ष्मा आदि रोगों से छुटकारा दिलाने
वाले ओषधि रूप जलों को मेरे सुख की वृद्धि के लिए यहां ले आओ. (५)
सूक्त-३ देवता—अग्नि
दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षाद् वनस्पतिभ्यो अध्योषधीभ्यः.
यत्रयत्र विभृतो जातवेदास्तत स्तुतो जुषमाणो न एहि.. (१)
हे अग्नि देव! आकाश से पृथ्वी से अंतरिक्ष से, वनस्पतियों से, ओषधियों से तथा
जहांजहां तुम विशेष रूप से पूर्ण हो, वहांवहां से हमें प्रसन्न करते हुए यहां आओ. (१)
यस्ते अप्सु महिमा यो वनेषु य ओषधीषु पशुष्वप्स्व१न्तः.
अग्ने सर्वास्तन्व १: सं रभस्व ताभिर्न एहि द्रविणोदा अजस्रः.. (२)
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हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा वाडवाग्नि रूप से जलों में वर्तमान है, दावाग्नि रूप से
वनों में विद्यमान है, जो ओषधियों में फल के पकने का कारण बनती है, जो सभी प्राणियों में
जठराग्नि के रूप में स्थित है तथा जो विद्युत के रूप में बादलों में रहती है, इन सब को एकत्र
कर के नित्य धनदाता के रूप में आओ. (२)
यस्ते देवेषु महिमा स्वर्गो या ते तनूः पितृष्वाविवेश.
पुष्टिया॑ ते मनुष्येषु पप्रथे ऽ ग्ने तया रयिमस्मासु धेहि.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा स्वर्गगामी के रूप में देवों में है, तुम्हारा जो नाम का हवि
स्वधा के रूप में पितृलोक जाने वाला है तथा मनुष्य, पशु आदि चराचर में तुम्हारी जो पुष्टि
है, अपने उन सभी रूपों के द्वारा हमें धन दो. (३)
श्रुत्कर्णाय कवये वेद्याय वचोभिर्वाकैरुप यामि रातिम्.
यतो भयमभयं तन्नो अस्तव देवानां यज हेडो अग्ने.. (४)
हे अग्नि देव! तुम हमारे स्तोत्रों को सुनने में समर्थ करने वाले, मनचाहा फल देने वाले
एवं सब के द्वारा जानने योग्य हो. मैं मंत्र रूप वाक्यों, अनुवाकों तथा सूक्तों से तुम्हारी स्तुति
करता हूं, जिस से मुझे अभय प्राप्त हो, जो देव हमारे प्रति क्रोध करते हों, तुम उन का क्रोध
शांत करो. (४)
सूक्त-४ देवता—अग्नि
यामाहुतिं प्रथमामथर्वा या जाता या हव्यमकृणोज्जातवेदाः.
तां त एतां प्रथमो जोहवीमि ताभिष्टुप्तो वहतु हव्यमग्निरग्नये स्वाहा.. (१)
हे अग्नि! अथर्वा रूप परमात्मा ने सृष्टि से पूर्व अपने द्वारा रचे हुए देवताओं को प्रसन्न
करने के लिए तुम में जो आहुति दी थी और तुम ने उस आहुति को देवगण तक पहुंचने योग्य
बनाया, हे अग्नि! मैं सब यजमानों से पहले उस आहुति को तुम्हारे मुख में डालता हूं. हवि
प्राप्त कराने वाले दूत रूप, देवता रूप एवं हवि प्रक्षेप के आधार रूप तीन रूपों से स्तुति
किए गए अग्नि मेरा यह हवि देवों को प्राप्त कराएं. (१)
आकूतिं देवीं सुभगां पुरो दधे चित्तस्य माता सुहवा नो अस्तु.
यामाशामेमि केवली सा मे अस्तु विदेयमेनां मनसि प्रविष्टाम्.. (२)
मैं तात्पर्य रूप, प्रकाशित होने वाली एवं शोभन भाग्य से युक्त वाणी अर्थात् सरस्वती
की सेवा करता हूं. पुत्र जिस प्रकार माता के वश में होता है, उसी प्रकार मेरे मन को वश में
रखती हुई हमारे आह्वान से हमारे अनुकूल हो. मैं जो कामना करता हूं, वह केवल मेरी हो,
किसी अन्य को प्राप्त न हो. मैं अपनी कामना को सदा प्राप्त करूं. (२)
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आकूतया नो बृहस्पत आकूतया न उपा गहि.
अथो भगस्य नो धेह्यथो नः सुहवो भव.. (३)
हे बृहस्पति! तुम सब देवों के पालनकर्ता हो. तुम सभी को देने के लिए आओ. तुम
सरस्वती को हमारे अनुकूल करने के लिए आओ. तुम हमें सौभाग्य प्रदान करो. तुम हमारे
आह्वान मात्र से हमारे अनुकूल बनो. (३)
बृहस्पतिर्म आकूतिमाङ्गिरसः प्रति जानातु वाचमेताम्.
यस्य देवा देवताः संबभूवुः स सुप्रणीताः कामो अन्वेत्वस्मान्.. (४)
अंगिराओं के पुत्र बृहस्पति देव सब वाक्यों की रूपा सरस्वती को मुझे देने के लिए
स्मरण करें. स्त्री-पुरुष रूप सभी देवता जिस बृहस्पति के वश में है और सभी देवता जिस
बृहस्पति के द्वारा कार्यों में लगाए गए हैं, वे बृहस्पति देव हम कामना करने वालों को फल देने
के लिए आएं. (४)
सूक्त-५ देवता—इंद्र
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमि विषुरूपं यदस्ति.
ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद् राध उपस्तुतश्चिदर्वाक्.. (१)
तीनों लोकों में निवास करने वाले मनुष्यों एवं देवताओं के स्वामी इंद्र हवि देने वाले
यजमान को धन ला कर दें. धरती पर जो अनेक रूपों वाला धन है, उसे मुझे प्रदान करें.
स्तुति किए गए इंद्र धनों को हमारे सामने प्रेरित करें, हमें प्रदान करें. (१)
सूक्त-६ देवता—पुरुष
सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्.. (१)
अनंत भुजाओं, अनंत नेत्रों और अनंत चरणों वाले यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले
नारायण नाम के पुरुष हैं, वे सात समुद्रों और सात द्वीपों वाली भूमि को अपनी महिमा से
सभी ओर से व्यक्त कर के दश अंगुल वाले हृदय रूप आकाश में स्थित हुए. (१)
त्रिभिः पद्भिर्द्यामरोहत् पादस्येहाभवत् पुनः.
तथा व्य क्रामद् विष्वङशनानशने अनु.. (२)
यज्ञ के अनुष्ठाता वे नारायण नाम के पुरुष अपने तीन चरणों से स्वर्गलोक पर आरूढ़
हुए. उन का चौथा चरण इस भूलोक में बारबार प्रकट होता है. यह चौथा चरण भोजन करने
वाले मनुष्य, पशु आदि और भोजन न करने वाले देव, वृक्ष आदि सभी में व्याप्त है. (२)
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तावन्तो अस्य महिमानस्ततो ज्यायांश्च पूरुषः.
पादो ऽ स्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (३)
जितनी इस नारायण नाम के पुरुष की महिमाएं हैं, ये उन से भी अधिक महान हैं. इस
का एकमात्र अर्थात् चौथा अंश सभी प्राणियों में व्याप्त है. इस के तीन चरण अर्थात् मात्र
मरण रहित होते हुए स्वर्गलोक में वर्तमान हैं. (३)
पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्.
उतामृतत्वस्येश्वरो यदन्नेनाभवत् सह.. (४)
जो अतीत जगत्, भविष्य में होने वाला जगत् और यह दृश्यमान जगत् है, वह सब
पुरुष ही है. यह पुरुष मरण रहित देवों का भी स्वामी है तथा जो भोग्य अन्न के साथ हुए यह
उन का भी ईश्वर है. (४)
यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्.
मुखं किमस्य किं बाहु किमूरू पादा उच्येते.. (५)
साध्य और वसु नाम के देवताओं ने जब यज्ञ पुरुष की कल्पना की, तब उन्होंने यह
कल्पना कितने प्रकार से की थी. इस का मुख क्या था, इस की भुजाएं क्या थीं और इस के
चरण क्या कहलाते थे. (५)
ब्राह्मणो ऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यो ऽ भवत्.
मध्यं तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.. (६)
इस यज्ञात्मा पुरुष का मुख ब्राह्मण था. इस की भुजाओं क्षत्रिय हुए. इस का जो मध्य
भाग था, उससे वैश्य जाति के पुरुष हुए और इस के दोनों चरणों से शुद्र की उत्पत्ति हुई. (६)
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत.
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत.. (७)
इस यज्ञ रूप पुरुष के मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ और नयनों से सूर्य की उत्पत्ति हुई. इस
के मुख से इंद्र और अग्नि देव तथा प्राण से अग्नि की उत्पत्ति हुई. (७)
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत.
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकाँ अकल्पयन्.. (८)
इस यज्ञ पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष लोक, शीश से स्वर्गलोक, चरणों से भूमि तथा
कानों से दिशाएं उत्पन्न हुईं. इस प्रकार साध्य और वसु नाम के देवों ने लोकों की कल्पना की,
लोकों का निर्माण किया. (८)
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विराडग्रे समभवद् विराजो अधि पूरुषः.
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः.. (९)
इस सृष्टि के आदि में विराट् उत्पन्न हुआ. उस विराट् से पुरुष की उत्पत्ति हुई. वह पुरुष
उत्पन्न होते ही वृद्धि को प्राप्त हुआ. वह भूमि आदि लोकों के पीछे और आगे व्याप्त कर के
उन से अतिरिक्त हुआ. तात्पर्य यह है कि पुरुष ने जीवों की रचना की. (९)
यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत.
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः.. (१०)
जब देवों ने पुरुष रूप अथवा अश्व रूप हवि से यज्ञ किया, उस समय वसंत ऋतु अपनी
महिमा से इस यज्ञ का घृत, ग्रीष्म समिधा तथा शरद ऋतु यज्ञीय चरु, पुरोडाश आदि हवि
हुआ. (१०)
तं यज्ञं प्रावृषा प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रशः.
तेन देवा अयजन्त साध्या वसवश्च ये.. (११)
सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न उस यज्ञीय पशु अथवा पुरुष को वर्षा ऋतु के द्वारा धोया गया.
उस पुरुष के द्वारा साध्य और वसु नाम वाले देवों ने यज्ञ किया. (११)
तस्मादश्वा अजायन्त ये च के चोभयादतः.
गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः.. (१२)
उस यज्ञात्मक पुरुष से घोड़े उत्पन्न हुए. उन घोड़ों के अतिरिक्त गधे और खच्चर भी
उत्पन्न हुए जो ऊपर और नीचे अर्थात् दोनों ओर दांतों वाले थे. उस यज्ञात्मक पुरुष से गाएं
उत्पन्न हुईं तथा उससे बकरियां और भेड़ें उत्पन्न हुईं. (१२)
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे.
छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत.. (१३)
उस अश्व रूप यज्ञीय पुरुष से ऋक् नाम के पशु बद्ध मंत्र तथा गीत रूप साम नाम के
मंत्र उत्पन्न हुए. उसी यज्ञीय पुरुष से छंदों की उत्पत्ति हुई. उसी से गद्यपद्य के सम्मिलित पाठ
वाले यजुष नाम के मंत्र प्रकट हुए. (१३)
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्.
पशूँस्तांश्चक्रे वायव्या नारण्या ग्राम्याश्च ये.. (१४)
उस अश्व रूप यज्ञीय पुरुष से दही से मिले हुए घी का संपादन हुआ. साध्य नाम वाले
देवों ने वायु देवता वाले वन में विचरणशील सिंह, हाथी आदि पशुओं को तथा ग्रामों में रहने
वाले गाय, घोड़े, गधे आदि पशुओं को बनाया. (१४)
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सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः.
देवा यद् यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्.. (१५)
अश्वमेध अथवा पुरुष मेध यज्ञ करते हुए देवों ने अपने यज्ञ में अश्व रूप पुरुष को यूप
अर्थात् लकड़ी के खंभे से बांधा. देवों ने गायत्री आदि सात छंदों को परिधि बनाया तथा
इक्कीस समिधाओं की रचना की. (१५)
मूर्ध्नो देवस्य बृहतो अंशवः सप्त सप्ततीः.
राज्ञः सोमस्याजायन्त जातस्य पुरुषादधि.. (१६)
उस यज्ञ रूप पुरुष के मस्तक से सोम राजा की चार सौ नब्बे महान शोभा वाली
रश्मियां उत्पन्न हुईं. (१६)
सूक्त-७ देवता—नक्षत्र
चित्राणि साकं दिवि रोचनानि सरीसृपाणि भुवने जवनि.
तुर्मिशं सुमतिमिच्छमानो अहानि गीर्भिः सपर्यामि नाकम्.. (१)
अनेक रूपों वाले जो प्रकाश युक्त नक्षत्र आकाश में चमकते हैं, वे प्रतिक्षण द्रुत गति से
सरकने वाले हैं. मैं उन नक्षत्रों की मंत्र रूप वाली स्तुति करता हूं, क्योंकि मैं उन की बाधा
निवारण करने वाली कल्याणमयी बुद्धि की इच्छा करता हूं. (१)
सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शमार्द्रा.
पुनर्वसू सूनृता चारु पुष्यो भानुराश्लेषा अयनं मघा मे.. (२)
हे अग्नि! कृत्तिका नक्षत्र हमारे आह्वान के अनुकूल हो. हे प्रजापति! रोहिणी नक्षत्र
हमारे सुंदर आह्वान के योग्य हो. हे सोम! मृगशिरा नक्षत्र हमारे लिए मंगलदायक तथा
आह्वान के योग्य हो. हे रुद्र! आर्द्रा नक्षत्र हमारे लिए सुखकारी हो. हे अदिति! पुनर्वसु नक्षत्र
हमें सत्य वाणी देने वाला हो. बृहस्पति संबंधी पुष्य नक्षत्र हमारे लिए श्रेय देने वाला हो. सर्प
देवता वाला आश्लेषा नक्षत्र हमें दीप्ति प्रदान करे. पितृ देवता वाला मघा नक्षत्र मेरा गंतव्य
स्थान हो. (२)
पुण्यं पूर्वा फल्गुन्यौ चात्र हस्तश्चित्रा शिवा स्वाति सुखो मे अस्तु.
राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्ट मूलम्.. (३)
अर्यमा देव का पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, भग देव का उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, सविता देव का
हस्त नक्षत्र तथा इंद्र देव का चित्रा नक्षत्र मुझे पुण्य से भरा हुआ सुख दे. वायु देव का स्वाति
नक्षत्र, इंद्र देवता वाला राधा अथवा विशाखा नक्षत्र और मित्र देव का अनुराधा नक्षत्र हमारे
लिए सुख से आह्वान योग्य हो. इंद्र देव का ज्येष्ठा नक्षत्र हमें सुखी बनाए. पितर देवों का
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व्याधियों से पूर्ण मूल नक्षत्र मेरे लिए कल्याणकारी हो. (३)
अन्नं पूर्वा रासतां मे अषाढा ऊर्जं देव्युत्तरा आ वहन्तु.
अभिजिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम्.. (४)
जल देवता का पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र मुझे खाने योग्य उत्तम अन्न दे. विश्वे देवों का उत्तराषाढ़ा
नक्षत्र हमें बलदायक रस प्रदान करे. ब्रह्म देवता का अभिजित नक्षत्र मुझे पुण्य दे. विष्णु देव
का श्रवण नक्षत्र तथा वसु देवता का धनिष्ठा नक्षत्र भी भलीभांति मेरा पालन करे. (४)
आ मे महच्छतभिषग् वरीय आ मे द्वया प्रोष्ठपदा सुशर्म.
आ रेवती चाश्वयुजौ भगं म आ मे रयिं भरण्य आ वहन्तु.. (५)
इंद्र देव का शतभिषा नक्षत्र, अजैकपाद का पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र तथा अहिर्बुध्न्य देव का
उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हमारे लिए महान फल दे और सुसज्जित घर प्रदान करे. पूषा देव का
रेवती नक्षत्र तथा अश्विनीकुमारों का अश्विनी नक्षत्र मुझे सौभाग्यशाली बनाए. यम देवता का
भरणी नक्षत्र मुझे ऐश्वर्य प्रदान करे. (५)
सूक्त-८ देवता—नक्षत्र
यानि नक्षत्राणि दिव्य १ न्तरिक्षे अप्सु भूमौ यानि नगेषु दिक्षु.
प्रकल्पयंश्रन्द्रमा यान्येति सर्वाणि ममैतानि शिवानि सन्तु.. (१)
जो नक्षत्र अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में, जलों में, भूमियों तथा पर्वतों पर एवं दिशाओं में
हैं तथा चंद्रमा जिन नक्षत्रों को प्रकट करता हुआ उदय होता है, वे नक्षत्र मुझे सुख देने वाले
हों. (१)
अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं भजन्तु मे.
योगं प्र पद्ये क्षेमं च क्षेमं प्र पद्ये योगं च नमो ऽहोरात्राभ्यामस्तु.. (२)
देखने में सुख देने वाले तथा सुख प्रदान करने वाले जो अट्ठाईस नक्षत्र हैं, वे एकसाथ
मिल कर मुझे प्राप्त हों एवं मुझे सुख प्रदान करें. मैं नक्षत्रों की कृपा से अप्राप्त वस्तुओं को
प्राप्त करूं तथा प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा कर सकूं. दिन और रात को मेरा नमस्कार है. (२)
स्वस्तितं मे सुप्रातः सुसायं सुदिवं सुमृगं सुशकुनं मे अस्तु.
सुहवमग्ने स्वस्त्य १ मर्त्य गत्वा पुनरायाभिनन्दन्.. (३)
प्रातःकाल मुझे सुख प्रदान करें, सायं काल मुझे सुख प्रदान करे तथा दिनरात मुझे
सुखी बनाएं. मैं जिस प्रयोजन संबंधी नक्षत्र में प्रस्थान करूं, उस में हरिण आदि शुभ शकुन
के रूप मेरे अनुकूल गति वाले हों. हे अग्नि! सभी नक्षत्रों के देवताओं का अभिनंदन करने
वाले एवं अविनश्वर द्युलोक में जा कर हवि देने वाले हम यजमानों और ऋत्विजों को प्रसन्न
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करने के हेतु पुनः यहां आओ. (३)
अनुहवं परिहवं परिवादं परिक्षवम्.
सर्वैर्मे रिक्तकुम्भान् परा तान्तसवितः सुव.. (४)
हे सविता देव! कार्य के निमित्त जाते हुए मुझ को तुम सभी नक्षत्रों में अनुभव नाम ले
कर पीछे से बुलाना, परिहव नाम ले कर दोनों ओर से पुकारना. परिवाद अर्थात् कठोर
भाषण, परिक्षव अर्थात् वर्जित स्थल में प्रवेश व खाली घड़े आदि देखना—अपशकुनों से
बचाओ. (४)
अपपापं परिक्षवं पुण्यं भक्षीमहि क्षवम्.
शिवा ते पाप नासिकां पुण्यगन्ध्राभि मेहताम्.. (५)
अहित करने वाली छींक हम से दूर हो. धन प्राप्ति के लिए जाते हुए पुरुष को गीदड़ी
का दर्शन, उस का शब्द सुनना तथा नपुंसक का दर्शन—ये सभी हमारे पापों को शांत करने
वाले हों. (५)
इमा या ब्रह्मणस्पते विषूचीर्वात ईरते.
सध्रीचीरिन्द्रा ताः कृत्वा मह्यं शिवतमास्कृधि.. (६)
हे ब्रह्मणस्पति इंद्र! ये सभी दिशाएं आंधी के कारण धुंधली हो जाती हैं तथा पता नहीं
चलता कि यह कौन सी दिशा है. उन अंधकार से ढकी हुई दिशाओं को मेरे अनुकूल करते
हुए कल्याण करने वाली बनाओ. (६)
स्वस्ति नो अस्त्वभयं नो अस्तु नमो ऽ होरात्राभ्यामस्तु.. (७)
हमारा कल्याण हो तथा हमारा भय दूर हो. दिन और रात के लिए हमारा नमस्कार हो.
(७)
सूक्त-९ देवता—मंत्र में बताए हुए
शान्ता द्यौः शान्ता पृथिवी शान्तमिदमुर्व१न्तरिक्षम्.
शान्ता उदन्वतीरापः शान्ता नः सन्त्वोषधीः.. (१)
अपने कारण से उत्पन्न दोषों को शांत करता हुआ द्युलोक हमें सुख प्रदान करे. विशाल
अंतरिक्ष और पृथ्वी हमें सुख प्रदान करें. सागरों के जल तथा ओषधियां हमें सुख देने वाले
हों. (१)
शान्तानि पूर्वरूपाणि शान्तं नो अस्तु कृताकृतम्.
शान्तं भूतं च भव्यं च सर्वमेव शमस्तु नः.. (२)
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कार्य से पहले होने वाले कारण मेरे लिए शांत हों. मेरे द्वारा किए गए और न किए गए
दुष्कर्म मुझे शांति प्रदान करने वाले हों. भूतकाल के कार्य और भविष्यत् काल के कार्य मेरे
लिए शांतिप्रद हों. भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालों से संबंधित सभी कार्य मेरे लिए शांति
देने वाले हों. (२)
इयं या परमेष्ठिनी वाग् देवी ब्रह्मसंशिता.
ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु नः.. (३)
उत्तम स्थान में रहने वाली अथवा ब्रह्मा की पत्नी, मंत्रों के द्वारा भलीभांति उत्तेजित एवं
विद्वानों के द्वारा स्वयं अनुभव की गई जो वाग्देवी अथवा सरस्वती हैं, ये शाप देने आदि में भी
उच्चारण की जाती हैं—ये हमारे लिए शांति देने वाली हों. (३)
इदं यत परमेष्ठिनं मनो वां ब्रह्मसंशितम्.
येनैव ससृजे घोरं तेनैव शान्तिरस्तु नः.. (४)
परमेष्ठी ने सृष्टि के आदि में मन की रचना की, जो संसार का मूल कारण है. ऐसा ब्रह्म
ने कहा है. जिस मन के द्वारा कर्म किया जाता है, उसी मन के द्वारा हमें शांति प्राप्त हो. (४)
इमानि यानि पञ्चेन्द्रियाणि मनःषष्ठानि मे हृदि ब्रह्मणा संशितानि.
यैरेव ससृजे घोरं तैरेव शान्तिरस्तु नः.. (५)
जो पांच ज्ञानेंद्रियां, (आंख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा) हैं, इन के अतिरिक्त मन
छठी ज्ञानेंद्रिय है. ये मेरे हृदय में स्थित हैं और चेतन आत्मा इन पर नियंत्रण करता है. इन्हीं
के द्वारा घोर कर्म किया जाता है. इन्हीं के द्वारा हमें शांति प्राप्त हो. (५)
शं नो मित्रः शं वरुणः शं विष्णुः शं प्रजापतिः.
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो भवत्वर्यमा.. (६)
मित्र अर्थात् सूर्य, वरुण, विष्णु, प्रजापति, इंद्र, बृहस्पति और अर्यमा हमें शांति प्रदान
करने वाले हों. (६)
शं नो मित्रः शं वरुणः शं विवस्वाञ्छमन्तकः.
उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शं नो दिविचरा ग्रहाः.. (७)
मित्र, वरुण, सूर्य तथा अंतक हमें शांति प्रदान करें. पृथ्वी और अंतरिक्ष में होने वाले
उत्पात एवं द्युलोक में संचरण करने वाले गृह हमें शांति प्रदान करें. (७)
शं नो भूमिर्वेप्यमाना शमुल्का निर्हतं च यत्.
शं गावो लोहितक्षीराः शं भूमिरव तीर्यतीः.. (८)
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