अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हम में देवों की भक्ति रातदिन बढ़ती रहे. इसीलिए हम अराति की शरण में जाते हैं.
अराति को नमस्कार हो. (३)
सरस्वतीमनुमतिं भगं यन्तो हवामहे.
वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषं देवानां देवहूतिषु.. (४)
मैं देवों का आह्वान करने वाले यज्ञों में उस वाणी का उच्चारण करता हूं, जो उन्हें प्रसन्न
करने वाली है. हम सब सरस्वती, अनुमति और भगदेव की शरण प्राप्त करते हैं और उन्हें
बुलाते हैं. (४)
यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा.
श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्रुणा.. (५)
मन से उत्पन्न सरस्वती की वाणी के द्वारा मैं जिस वस्तु को पाने की प्रार्थना करता हूं,
वह शक्तिशाली सोमदेव की श्रद्धा द्वारा दी हुई प्राप्त हो. (५)
मा वनिं मा वाचं नो वीत्सीरुभाविन्द्राग्नी आ भरतां नो वसूनि.
सर्वे नो अद्य दित्सन्तो ऽ रातिं प्रति हर्यत.. (६)
हे अराति! तू हमारी वाणी और भक्ति को अवरुद्ध मत कर. इंद्र और अग्नि हमें धन
प्रदान करें तथा वे इस समय हमारे शत्रुओं के अनुकूल न हों. (६)
परो ऽ पेह्यसमृद्धे वि ते हेतिं नयामसि.
वेद त्वाहं निमीवन्तीं नितुदन्तीमराते. (७)
हे अराति! मैं जानता हूं कि तू दुर्बल बनाने वाला और पीड़ा देने वाला है. इस कारण तू
मुझ से दूर रह. मैं तेरी विनाशक शक्ति को दूर कर सकता हूं. (७)
उत नग्ना बोभुवती स्वप्रया सचसे जनम्.
अराते चित्तं वीर्त्सन्त्याकूतिं पुरुषस्य च.. (८)
हे अराति! तू मनुष्यों की कामनाओं को असफल करता है तथा उन्हें सदा प्रभाव के
रूप में प्राप्त होता है. (८)
या महती महोन्माना विश्वा आशा व्यानशे.
तस्यै हिरण्यकेश्यै निर्ऋत्या अकरं नमः.. (९)
असमृद्धि अर्थात् दरिद्रता हमारी सभी आशाओं को सीमित कर रही है. सुनहरे केशों
वाली इस असमृद्धि को मैं नमस्कार करता हूं. (९)
हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुर्मही.
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सूक्त-८ देवता—अग्नि
तस्यै हिरण्यद्रापये ऽ रात्य अकरं नमः.. (१०)
यह सुनहरे रंग वाली पृथ्वी व्याप्ति के कारण हिरण्यकश्यप के वश में हो कर समृद्धहीन
हो गई थी. यह असमृद्धि रमणीयता का विनाश करती है. मैं इस को नमस्कार करता हूं. (१०)
सूक्त-८ देवता—अग्नि
वैकङ्कतेनेध्मेन देवेभ्य आज्यं वह.
अग्ने ताँ इह मादय सर्व आ यन्तु मे हवम्.. (१)
हे अग्नि! तुम शक्तिशाली ओषधि के ईंधन से देवों के हेतु घृत का वहन करो. इस कर्म
से तुम देवों को प्रसन्न करो. मेरे यह में सभी देव आएं. (१)
इन्द्रा याहि मे हवमिदं करिष्यामि तच्छृणु.
इम ऐन्द्रा अतिसरा आकूतिं सं नमन्तु मे.
तेभिः शकेम वीर्यं १ जातवेदस्तनूवशिन्.. (२)
हे इंद्र! मेरे इस यज्ञ में आओ और मैं जो स्तुति कर रहा हूं, उसे सुनो. सभी ऋत्विज् मेरी
इच्छा के अनुसार कार्य करें. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता इंद्र! जिन ऋत्विजों का मैं ने वर्णन
किया है, उन के प्रयत्न से हम शक्तिशाली बनें. (२)
यदसावमृतो देवा अदेवः संश्रिकीर्षति.
मा तस्याग्निर्हव्यं वाक्षीद्भवं देवा अस्य मोप गुर्ममैव हवमेतन.. (३)
हे देवगण! जो भक्तिहीन पुरुष यज्ञ करना चाहता है, उस के हव्य को अग्नि तुम्हारे पास
तक न पहुंचाएं. देवगण उस भक्ति हीन पुरुष के यज्ञ में न जा कर मेरे यज्ञ में पधारें. (३)
अति धावतार्तिसरा इन्द्रस्य वचसा हत.
अविं वृक इव मथ्नीत स वो जीवन् मा मोचि प्राणमस्यापि नह्यत.. (४)
हे मनुष्यो! तुम इंद्र के वचनों से वृद्धि प्राप्त करो और शत्रुओं का विनाश करो. तुम शत्रु
को इस प्रकार मथो, जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को मथता है. वह जीवित न रहने पाए. तुम उसे
नष्ट कर दो. (४)
यममी पुरोदधिरे ब्रह्माणमपभूतये. इन्द्र स ते अधस्पदं तं प्रत्यस्यामि
मृत्यवे.. (५)
हे इंद्र! इन शत्रुओं ने हमारी दुर्गति के निमित्त यज्ञ में जिसे अपना पुरोहित बनाया है,
उस का अधःपतन हो जाए. मैं उसे मृत्यु के समीप फेंक रहा हूं. (५)
यदि प्रेयुर्देवपुरा ब्रह्म वर्माणि चक्रिरे.
तनूपानं परिपाणं कृण्वाना यदुपोचिरे सर्वं तदरसं कृधि.. (६)
हे देव! हमारे शत्रुओं ने तनुपान एवं परिपाण नामक कर्म के समय अपने मंत्रमय कवचों
को सिद्ध कर लिया है. तुम इन कर्मों से संबंधित मंत्रों को असफल बनाओ. (६)
यानसावतिसराँश्चकार कृणवच्च यान्.
त्वं तानिन्द्र वृत्रहन् प्रतीचः पुनरा कृधि यथामुं तृणहां जनम्.. (७)
हे वृत्र राक्षस का नाश करने वाले इंद्र! हमारे शत्रु ने जिन योद्धाओं को आगे की ओर
बढ़ाया है, उन्हें तुम पीछे धकेल दो, जिस से मैं शत्रु की सेना का विनाश कर सकूं. (७)
यथेन्द्र उद्वाचनं लब्ध्वा चक्रे अधस्पद्म्.
कृण्वे ३ हमधरांस्तथामूञ्छश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८)
इंद्र ने जिस प्रकार स्तुति वचनों के श्रेष्ठ अस्त्र से अपने शत्रु को पराजित किया था, उसी
प्रकार मैं इन शत्रुओं का तिरस्कार करता हूं. (८)
अत्रैनानिन्द्र वृत्रहन्नुग्रो मर्मणि विध्य.
अत्रैवैनानभि तिष्ठेन्द्र मेद्य१हं तव.
अनु त्वेन्द्रा रभामहे स्याम सुमतौ तव.. (९)
हे वृत्र को मारने वाले इंद्र! तुम उग्र बन कर इस युद्ध में मेरे शत्रु के मर्मस्थलों का वेध
करो. मैं तुम्हारा स्नेहपात्र हूं, इसीलिए तुम मेरे इन शत्रुओं से युद्ध करो. मैं तुम्हारा अनुगामी हूं
और भविष्य में भी तुम्हारी सुमति में रहूंगा. (९)
सूक्त-९ देवता—वास्तोष्पति
दिवे स्वाहा.. (१)
द्युलोक के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (१)
पृथिव्यै स्वाहा.. (२)
पृथ्वी के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (२)
अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (३)
आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (३)
अन्तरिक्षाय स्वाहा.. (४)
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अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के अधिष्ठाता देव के लिए यह हवि समर्पित है. (४)
दिवे स्वाहा.. (५)
द्युलोक अर्थात् स्वर्ग के अधिष्ठाता के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (५)
पृथिव्यै स्वाहा.. (६)
पृथ्वी के लिए हमारी यह हवि समर्पित है. (६)
सूर्यो मे चक्षुर्वातः प्राणो ३ न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्.
अस्तुतो नामाहमयमस्मि स आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय..
(७)
वायु मेरे नेत्र हैं, वायु मेरा प्राण है, अंतरिक्ष के अधिष्ठाता देव मेरी आत्मा हैं और पृथ्वी
मेरा शरीर है. मैं अमर अथवा मृत्युरहित नाम वाला हूं. हे द्यावा पृथ्वी! मैं अपनी आत्मा को
सुरक्षा के निमित्त आपके सामने समर्पित करता हूं. (७)
उदायुरुद् बलमृत् कृतमृत् कृत्यामुन्मनीषामुदिन्द्रियम्.
आयुष्कृदायूष्पत्नी स्वधावन्तौ गोपा मे स्तं गोपायतं मा.
आत्मसदौ मे स्तं मा मा हिंसिष्टम्.. (८)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम हमारी आयु, बल, कर्म, कृत्या, बुद्धि तथा इंद्रियों को उत्कृष्ट
बनाओ. हे आयु बढ़ाने वाले, आयु की रक्षा करने वाले एवं स्व भासमान द्यावा पृथ्वी! तुम
मेरी रक्षा करो! आप मेरी आत्मा में स्थित हो और कभी मेरी हिंसा न करें. (८)
सूक्त-१० देवता—वास्तोष्पति
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा प्राच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
ऋच्छात्.. (१)
हे पत्थर के बने घर! तू मेरा है. जो पापी हत्यारा मुझे पूर्व दिशा की ओर से नष्ट करना
चाहता है, वह नाश को प्राप्त हो. (१)
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा दक्षिणाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
ऋच्छात्.. (२)
हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो हत्या करने का इच्छुक पापी दक्षिण दिशा से
मुझे नष्ट करने का इच्छुक है, वह यहां आतेआते स्वयं नष्ट हो जाए. (२)
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा प्रतीच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
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ऋच्छात्.. (३)
हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो हत्या करने का इच्छुक पापी मुझे पश्चिम दिशा
से नष्ट करना चाहता है, वह मेरे समीप आने से पहले ही नष्ट हो जाए. (३)
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मोदीच्या दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
ऋच्छात्.. (४)
हे पत्थर के बने घर! तू मेरा है. जो पापी मेरी हत्या करने की इच्छा से उत्तर दिशा से
आता है, वह मेरे समीप आ कर नष्ट हो जाए. (४)
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा ध्रुवाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
ऋच्छात्.. (५)
हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है. जो पापी ध्रुव दिशा अर्थात् नीचे की ओर से मुझे
नष्ट करने की इच्छा करता है, उस का नाश हो. (५)
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा मोर्ध्वाया दिशो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
ऋच्छात्.. (६)
हे पत्थर के घर! तू मेरा है. जो पापी मुझे ऊपर की दिशा से समाप्त करना चाहता है,
उस का नाश हो. (६)
अश्मवर्म मे ऽ सि यो मा दिशामन्तर्देशेभ्यो ऽ घायुरभिदासात्. एतत् स
ऋच्छात्.. (७)
हे पत्थर के बने हुए घर! तू मेरा है जो पापी दिशाओं के कोनों से मेरा नाश करना
चाहता है, उस का नाश हो. (७)
बृहता मन उप ह्वये मातरिश्वना प्राणापानौ. सूर्याच्चक्षुरन्तरिक्षाच्छोत्रं
पृथिव्याः शरीरम्. सरस्वत्या वाचमुप ह्वयामहे मनोयुजा.. (८)
मैं चंद्रमा के मन का आह्वान करता हूं. मैं वायु से प्राण अपान की, सूर्य से नेत्र की,
अंतरिक्ष से क्षेत्र की, पृथ्वी से शरीर की और सरस्वती से मन युक्त वाणी की प्रार्थना करता हूं.
(८)
सूक्त-११ देवता—वरुण
कथं महे असुरायाब्रवीरिह कथं पित्रे हरये त्वेषनृम्णः.
पृश्निं वरुण दक्षिणां ददावान् पुनर्मघ त्वं मनसाचिकिल्सीः.. (१)
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हे शक्तिशाली वरुण! तुम ने जगत् के पालन करने वाले सूर्य से क्या कहा था? तुम सूर्य
को दक्षिणा देते हो एवं मन से चिकित्सा करते हो. (१)
न कामेन पुनर्मघो भवामि सं चक्षे कं पृश्निमेतामुपाजे.
केन नु त्वमथर्वन् काव्येन केन जातेनासि जातवेदाः.. (२)
मैं इच्छा मात्र से ही संपत्तिशाली नहीं बन गया हूं, अपितु सूर्य देव से प्रार्थना करता हूं. मैं
यह सुख प्राप्त करता रहूं. हे ऋत्विज्! तुम किस विद्या और चातुर्य के द्वारा सभी जन्म लेने
वालों के ज्ञाता बन गए हो? (२)
सत्यमहं गभीरः काव्येन सत्यं जातेनास्मि जातवेदाः.
न मे दासो नार्यो महित्वा व्रतं मीमाय यदहं धरिष्ये.. (३)
यह सत्य बात है कि मैं काव्य अर्थात् अथर्व के द्वारा प्राप्त चतुरता से ज्ञानी बन गया हूं
तथा अग्नि के समान सब का मार्गदर्शन करता हूं. मैं जिस व्रत को धारण करूंगा, उसे कोई
भंग नहीं कर सकता. (३)
न त्वदन्यः कवितरो न मेधया धीरतरो वरुण स्वधावन्.
त्वं ता विश्वा भुवनानि वेत्थ स चिन्नु त्वज्जनो मायी बिभाय.. (४)
हे स्वधा वाले वरुण! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी दूसरा विद्वान् मेधावी और वीर नहीं है.
तुम सभी भुवनों को जानते हो, इसलिए सब लोग तुम से भयभीत रहते हैं. (४)
त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण स्वधावन् विश्वा वेत्थ जनिमा सुप्रणीते.
किं रजस एना परो अन्यदस्त्येना किं परेणावरममुर.. (५)
हे सुधा के पात्र एवं नीति पालक वरुण! तुम प्राणियों के सभी जन्मों को जानते हो. तुम
सभी से मोह रखते हो. इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ कौन सी वस्तु है. इस से श्रेष्ठ कुछ भी
नहीं है. (५)
एकं रजस एना परो अन्यदस्त्येना पर एकेन दुर्णशं चिदर्वाक्.
तत् ते विद्वान् वरुण प्र ब्रवीम्यधोवचसः पणयो भवन्तु नीचैर्दासा उप
सर्पन्तु भूमिम्.. (६)
इस रजोगुण युक्त धन से श्रेष्ठ गुण युक्त धन है. सतोगुण युक्त से श्रेष्ठ ब्रह्म है. हे वरुण
देव! तुम इस विषय के जानने वाले हो, इसलिए मैं तुम से निवेदन करता हूं कि बुरा व्यवहार
करने वाले लोग मेरे सामने निकृष्ट वचन न बोलें और दास जन झुक कर चलें. (६)
त्वं ह्य १ ङ्ग वरुण ब्रवीषि पुनर्मघेष्ववद्यानि भूरि.
मो षु पर्णीँ रभ्ये ३ तावतो भून्मा त्वा वोचन्नराधसं जनासः.. (७)
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हे वरुण देव! तुम बारबार धन प्राप्ति के अवसरों के विषय में बताते हो. तुम इन
व्यवहार करने वालों की उपेक्षा मत करो. अन्यथा ये तुम्हें धनहीन समझने लगेंगे. (७)
मा मा वोचन्नराधसं जनासः पुनस्ते पृश्निं जरितर्ददामि.
स्तोत्रं मे विश्वमा याहि शचीभिरन्तर्विश्वाुसु मानुषीषु दिक्षु.. (८)
लोग बारबार तुम्हें धनहीन अथवा कंजूस न समझ लें, इसलिए मैं तुम्हें यह थोड़ा सा
धन भेंट करता हूं. मेरी इच्छा है कि तुम्हारी यह स्तुति सारे संसार में फैल जाए और सभी
दिशाओं में मनुष्य इसे गाएं. (८)
आ ते स्तोत्राण्युद्यतानि यन्तून्वन्तर्विश्वा्सु मानुषीषु दिक्षु.
देहि नु मे यन्मे अदत्तो असि युज्यो मे सप्तपदः सखासि.. (९)
हे वरुण! मनुष्यों से युक्त सभी दिशाओं में तुम्हारी स्तुतियां फैल जाएं. तुम मुझे यह
वस्तु दो जो अब तक नहीं दी है. तुम मेरे सप्तदा अर्थात् सात कदम साथ चलने वाले सखा
हो. (९)
समा नौ बन्धुर्वरुण समा जा वेदाहं तद्यन्नावेषा समा जा.
ददामि तद् यत् ते अदत्तो अस्मि युज्यस्ते सप्तपदः सखास्मि.. (१०)
हे बंधु वरुण! हम और तुम दोनों समान हैं. हमारी संतान भी समान हो. इन बातों को मैं
जानता हूं. मैं ने तुम्हें अब तक जो नहीं दिया है, वह अब दे रहा हूं. मैं तुम्हारा सप्तदा सखा हूं.
(१०)
देवो देवाय गृणते वयोधा विप्रो विप्राय स्तुवते सुमेधाः.
अजीजनो हि वरुण स्वधावन्नथर्वाणं पितरं देवबन्धुम्.
तस्मा उ राधः कृणुहि सुप्रशस्तं सखा नो असि परमं च बन्धुः.. (११)
हे अन्नधारक वरुण देव! देवगण देवों की स्तुति करते हैं तथा बुद्धिमान ब्राह्मण ब्राह्मणों
की स्तुति करते हैं. हे सुधा के पात्र वरुण! तुम ने देवों को बंधु एवं हमारे पिता के समान
अथर्व को जानने वाले को उत्पन्न किया है. तुम मुझे श्रेष्ठ धन में स्थापित करो. तुम हमारे सब
से बड़े बंधु एवं सखा हो. (११)
सूक्त-१२ देवता—अग्नि
समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान् यजसि जातवेदः.
आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान् त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. (१)
हे उत्पन्न हुओं को जानने वाले अग्नि! तुम आज मनुष्य के यज्ञ में प्रज्वलित हुए हो और
देवों का यजन कर रहे हो. तुम मित्रों की पूजा करने वाले एवं ज्ञाता हो. तुम देवों का आह्वान
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करो. तुम देवों के दूत, ज्ञानवान और क्रांतदर्शी हो. (१)
तनूनपात् पथ ऋतस्य यानान् मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व.
मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन् देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. (२)
हे शरीररक्षक एवं उत्तम जिह्वा वाले अग्नि! तुम सत्यलोक को प्राप्त कराने वाले मार्गों
को मधुर बना कर उन का आस्वादन करो एवं मेरे यज्ञ को बढ़ाते हुए इसे देवों को प्राप्त
कराओ. (२)
आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्च याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः.
त्वं देवानामासि यह्व होता स एनान् यक्षीषितो यजीयान्.. (३)
हे अग्नि! तुम पूज्य व वंदना करने योग्य हो. तुम में भलीभांति हवन किया जाता है.
हमारे इस यज्ञ कर्म में तुम वसुओं के सहित आओ. तुम देवों के होता हो. तुम हमारी प्रेरणा से
देवों की पूजा करो. (३)
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्.
व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. (४)
वेदी रूपी भूमि को ढकने वाले आह्वनीय अग्नि पूर्वाह्न में विस्तृत होते हैं. अग्नि अन्य
ज्योतियों की अपेक्षा श्रेष्ठ, धनवान तथा पृथ्वी को सुख देने वाले हैं. (४)
व्यचस्वतीरुरुविया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः.
देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (५)
अग्नि की ज्वाला हवि को वहन करने वाली और व्याधियों को रोकने वाली है. इस
कारण वह द्वार के समान है. हे अग्नि की प्रकाशमान ज्वाला! जिस प्रकार स्त्रियां पतियों का
आदर करती है, उसी प्रकार तुम देवों को सुख देने वाली बनो. तुम हवि को व्याप्त करने वाली
हो. (५)
आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६)
अग्नि की दीप्ति उषा और यज्ञ की दीप्ति से युक्त है. वह यज्ञों का संपादन करती एवं
देवों से संयुक्त होती है. वह दिव्य, परस्पर मिलने वाली एवं उत्तम दीप्ति यजमान के हेतु
अग्नि की स्थापना करे. (६)
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै.
प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७)
वायु और अग्नि दिव्य हैं. मनुष्य होताओं में प्रमुख हैं. वे सुंदर वाणी वाले, यज्ञ के प्रेरक
एवं यज्ञ के निर्माता हैं. वायु होताओं पर अनुग्रह करते हैं और आह्वनीय अग्नि की सेवा का
आदेश देते हैं. अतएव यज्ञ पर उपकार करने वाले वायु और अग्नि देव मुझ पर भी उपकार
करें. (७)
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती.
तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वतीः स्वपसः सदन्ताम्.. (८)
सब प्राणियों को जल से संतुष्ट करने वाले अग्नि देव की कांति पृथ्वी का और सरस्वती
का आह्वान करने पर सचेत हो. सुंदर कर्म करने वाली ये तीन देवियां कुश पर विराजमान हों.
(८)
य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद् भुवनानि विश्वा.
तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९)
हे अग्नि! जो त्वष्टा देवता द्यावा पृथ्वी तथा समस्त प्राणियों को अनेक रूप प्रदान करता
है, हमारी प्रेरणा से आज उस का यजन करो. (९)
उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि.
वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०)
हे अग्नि देव! यह यज्ञ रूप अन्न देवों का भाग है. इसे और हवियों को प्रत्येक ऋतु में
देवों तक पहुंचाओ. वनस्पति, सविता देव और अग्नि इस हव्य को मधु और घृत से युक्त कर
के स्वादिष्ट बनाएं. (१०)
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत् पुरोगाः.
अस्य होतुः प्रशिष्यतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः.. (११)
अग्नि देव प्रकट होते ही यज्ञ का आरंभ करते हैं और प्रकट होते ही समस्त देवों में
अग्रगण्य बन जाते हैं. देवों का आह्वान करने वाले इस अग्नि के मुख में देव गण स्वाहा शब्द
से युक्त हवि ग्रहण करें. (११)
सूक्त-१३ देवता—सर्प-विषनाशन
ददिर्हि मह्यं वरुणो दिवः कविर्वचोभिरुग्रैर्नि रिणामि ते विषम्.
खातमखातमुत सक्तमग्रभमिरेव धन्वन्नि जजास ते विषम्.. (१)
स्वर्ग के देवता वरुण ने मुझे उपदेश दिया है. उन के वचनों के द्वारा मैं तेरे विष को दूर
करता हूं. जो विष मांस के ऊपर अथवा मांस के भीतर है, उसे मैं ग्रहण करता हूं. जिस
प्रकार जल रेत में गिरने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तेरा विष नष्ट हो जाए. (१)
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यत् ते अपोदकं विषं तत् त एतास्वग्रभम्.
गृह्णामि ते मध्यममुत्तमं रसमुतावमं भियसा नेशदादु ते.. (२)
जल को दूषित करने वाला तेरा जो विष है, उसे मैं ने भीतर ही रोक लिया है. तेरे उत्तम
और मध्यम रस अर्थात् विष को मैं ग्रहण करता हूं. वह रस अर्थात् तेरा विष नष्ट हो जाए.
(२)
वृषा मे रवो नभसा न तन्यतुरुग्रेण ते वचसा बाध आदु ते.
अहं तमस्य नृभिरग्रभं रसं तमस इव ज्योतिरुदेतु सूर्यः.. (३)
मेरा वचन वर्षा करने वाला तथा मेघ के समान गर्जन करता है. मैं अपने उग्र वचन से
तुझ सर्प को बांधता हूं. जिस प्रकार सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार
यह पुरुष विष से मुक्त हो कर जीवित हो जाए. (३)
चक्षुषा ते चक्षुर्हन्मि विषेण हन्मि ते विषम्.
अहे म्रियस्व मा जीवीः प्रत्यगभ्येतु त्वा विषम्.. (४)
हे सर्प! मैं अपनी नेत्र शक्ति से तेरी नेत्र शक्ति का विनाश करता हूं तथा ऋषि के द्वारा
तेरे विष को समाप्त करता हूं. तू मृत्यु को प्राप्त हो, जीवित न रहे. तेरा विष तुझ पर ही बुरा
प्रभाव डाले. (४)
कैरात पृश्न उपतृण्य बभ्र आ मे शृणुतासिता अलीकाः.
मा मे सख्युः स्तामानमपि छाताश्रावयन्तो नि विषे रमध्वम्.. (५)
हे सर्पो! तुम जंगल में घूमने वाले, काले धब्बों से युक्त, घास में रहने वाले, भूरे वर्ण
वाले, काले वर्ण वाले तथा निंदनीय हो. तुम हमारे कथन को सुनो. तुम हमारे सखा के घर के
समीप निवास मत करो. हमारा यह कथन तुम दूसरे सर्पों को भी सुना दो. (५)
असितस्य तैमातस्य बभ्रोरपोदकस्य च.
सात्रासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्वनो वि मुञ्चामि रथाँ इव.. (६)
गीली जगह में निवास करने वाले, श्याम एवं श्वेत वर्ण से युक्त, पानी से दूर रहने वाले
और सब को पराजित करने वाले क्रोध पूर्ण सर्पों के विष को हम उसी प्रकार दूर करते हैं,
जिस प्रकार धनुष की डोरी और रथों के बंधन को उतारा जाता है. (६)
आलिगी च विलिगी च पिता च माता च.
विद्म वः सर्वतो बन्ध्वरसाः किं करिष्यथ.. (७)
हे सर्पो! तुम्हारे मातापिता आलिगी अर्थात् चिपकने वाले और विलिगी अर्थात् न
चिपकने वाले हैं. हम तुम्हारे सभी बंधुओं से परिचित हैं. तुम रसहीन अर्थात् विष हीन हो कर
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क्या करोगे? (७)
उरुगूलाया दुहिता जाता दास्यसिक्न्या.
प्रतङ्कं दुद्रुषीणां सर्वासामरसं विषम्.. (८)
जो सांपिन गूलर नाम के विशाल वृक्ष से उत्पन्न हुई है, वह काली सांपिन की दासी है.
जो सांपिन दांतों के माध्यम से अपना क्रोध प्रकट करती है, इस का विष हमें दुःख प्रदान
करता है यह विष प्रभावहीन हो जाए. (८)
कर्णा श्वावित् तदब्रवीद् गिरेरवचरन्तिका.
याः काश्चेमाः खनित्रिमास्तासामरसतं विषम्.. (९)
पर्वतों पर घूमने वाली और कांटों वाली ने कहा कि जो सांपिनें धरती में बिल बना कर
निवास करती हैं, उन का विष प्रभावहीन हो जाए. (९)
ताबुवं न ताबुवं न घेत् त्वमसि ताबुवम्.
ताबुवेनारसं विषम्.. (१०)
तुम ताबुव नहीं हो, तुम ताबुव नहीं हो, क्योंकि ताबुव विष को प्रभावहीन कर देता है.
(१०)
तस्तुवं न तस्तुवं न घेत् त्वमसि तस्तुवम्.
तस्तुवेनारसं विषम्.. (११)
तुम तस्तुव नहीं हो, तुम तस्तुव नहीं हो. निश्चित रूप से तुम तस्तुव नहीं हो. तस्तुव विष
को प्रभावहीन कर देता है. (११)
सूक्त-१४ देवता—ओषधि
सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा.
दिप्सौषधे त्वं दिप्सन्तमव कृत्याकृतं जहि.. (१)
हे ओषधि! सुपर्ण अर्थात् गरुड़ या सूर्य ने तुम्हें प्राप्त किया था. सुअर ने अपनी नाक से
तुम्हें खोदा था. हे कृत्या से संबंधित ओषधि! तुम कृत्या का प्रयोग करने वाले और हमें मारने
का प्रयत्न करने वाले का नाश करो. (१)
अव जहि यातुधानानव कृत्याकृतं जहि.
अथो यो अस्मान् दिप्सति तमु त्वं जह्योषधे.. (२)
हे ओषधि! तुम याततुधानों अर्थात् राक्षसों और कृत्या का निर्माण करने वाले का
विनाश करो. तुम उस का भी विनाश करो जो हमारी मृत्यु की इच्छा करता है. (२)
रिश्यस्येव परीशासं परिकृत्य परि त्वचः.
कृत्यां कृत्याकृते देवा निष्कमिव प्रति मुञ्चत.. (३)
हे देवो! जो हमारी हिंसा करने वाले हैं, उन की त्वचा पर अपने आयुधों से घाव बना
कर अपने आयुधों को अलग करो. लोग जिस प्रकार सोने के सिक्के अथवा आभूषण को
ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार कृत्या का निर्माण करने वाला उस को स्वीकार करे. (३)
पुनः कृत्यां कृत्याकृते हस्तगृह्य परा णय.
समक्षमस्मा आ धेहि यथा कृत्याकृतं हनत्.. (४)
हे ओषधि! तुम कृत्या का हाथ पकड़ कर उन के समीप ले जाओ, जिन्होंने इस का
निर्माण किया है. उन के समीप पहुंची हुई कृत्या उन का विनाश कर देगी. (४)
कृत्याः सन्तु कृत्याकृते शपथः शपथीयते.
सुखो रथइव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (५)
कृत्या का प्रयोग करने वाले पर कृत्या का बुरा प्रभाव पड़े और शाप देने वाले को ही
शाप लगे. जिस प्रकार रथ सरलतापूर्वक घूम जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने प्रेरक की
ओर घूम जाए. (५)
यदि स्त्री यदि वा पुमान् कृत्यां चकार पाप्मने.
तामु तस्मै नयामस्यश्वमिवाश्वाभिधान्या.. (६)
यदि किसी स्त्री अथवा पुरुष ने तुझे पाप कर्म अर्थात् मुझे डसने के लिए प्रेरणा दी है तो
जिस प्रकार लगाम का संकेत करने से घोड़ा पीछे की ओर लौट पड़ता है, उसी प्रकार हम
तुझे प्रेरणा देने वालों की ओर ही लौटाते हैं. (६)
यदि वासि देवकृता यदि वा पुरुषैः कृता.
तां त्वा पुनर्णीयामसीन्द्रेण सयुजा वयम्.. (७)
हे कृत्या! यदि तुझे देवों ने अथवा पुरुषों ने प्रेरित किया है तो हम तुझे उन्हीं की ओर
वापस लौटाते हैं, क्योंकि हम इंद्र के सखा हैं. (७)
अग्ने पृतनाषाट् पृतनाः सहस्व.
पुनः कृत्यां कत्याकृते प्रतिहरणेन हरामसि.. (८)
हे राक्षसों की सेना का सामना करने वाले अग्नि देव! तुम इन सेनाओं का सामना करो.
हम इस कृत्या को कृत्या के प्रेरक की ओर ही वापस लौटा रहे हैं. (८)
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कृत्यव्यधनि विध्य तं यश्चकार तमज्जहि.
न त्वामचकृषे वयं वधाय सं शिशीमहि.. (९)
हे संहार का साधन कृत्या! जिस ने तेरा निर्माण किया है, तू उसी का छेदन कर के मार
डाल. जिस ने तेरा निर्माण नहीं किया है, उस के वध के निमित्त हम तुझे शक्तिशालिनी नहीं
बनाते. (९)
पुत्र इव पितरं गच्छ स्वज इवाभिष्ठितो दश.
बन्धमिवावक्रामी गच्छ कृत्ये कृत्याकृतं पुनः.. (१०)
हे कृत्या! जिस प्रकार पुत्र पिता के पास जाता है, उसी प्रकार तू अपने उत्पत्तिकर्ता के
समीप जा. दबने पर जिस प्रकार सांप काट लेता है, उसी प्रकार तू उसे डस ले, जिस ने तुझे
बनाया है. जिस प्रकार टूटा हुआ बंधन अपने ही शरीर पर गिरता है, उसी प्रकार तू कृत्याकर्ता
के पास लौट जा. (१०)
उढेणीव वारण्यभिस्कन्दं मृगीव.
कृत्या कर्तारमृच्छतु.. (११)
कृत्या इस प्रकार अपने निर्माणकर्ता के पास जाए, जिस प्रकार ऐणी नाम की हिरनी,
हथिनी और मृगी शीघ्रता से झपटती है. (११)
इष्वा ऋजीयः पततु द्यावापृथिवी तं प्रति.
सा तं मृगमिव गृह्णातु कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१२)
कृत्या अपने निर्माण कर्ता की ओर उस के प्रतिकूल आचरण करती हुई अग्नि के समान
जाए. जैसे किनारे को काट कर गिराता हुआ जल का वेग मिलता है अथवा रथ जिस प्रकार
सरलता से मुड़ जाता है, उसी प्रकार कृत्या अपने निर्माणकर्ता से मिले. (१२)
अग्निरिवैतु प्रतिकूलमनुकूलमिवोदकम्.
सुखो रथ इव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः.. (१३)
अग्नि की तरह कृत्याकारी से प्रतिकूल आचरण करती हुई वह कृत्या उस के पास
पहुंचे. जिस प्रकार पानी किनारों को काटता हुआ बढ़ता है उसी प्रकार वह कृत्या कृत्याकारी
के अनुकूल हो कर उस के पास पहुंचे. वह कृत्या सुखकारी रथ के समान कृत्याकारी के पास
पुनः चली आए. (१३)
सूक्त-१५ देवता—मधुला ओषधि
एका च मे दश च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः.. (१)
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हे यज्ञ के निमित्त उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे एक और दस अर्थात्
ग्यारह हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना. क्योंकि तू मधुर है. (१)
द्वे च मे विंशतिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (२)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दो और बीस
अर्थात् बाईस हों, परंतु तू मेरे शब्दों को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (२)
तिस्रश्च मे त्रिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (३)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे तीन और तीस
अर्थात् तैंतीस हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (३)
चतस्रश्च मे चत्वारिंशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (४)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे चार और
चालीस अर्थात् चवालीस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (४)
पञ्च च मे पञ्चाशच्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (५)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न होने वाली ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे पांच और
पचास अर्थात् पचपन हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (५)
षट् च मे षष्टिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (६)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे छः और साठ अर्थात्
छियासठ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (६)
सप्त च मे सप्ततिश्च च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (७)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सात और सत्तर अर्थात्
सतहत्तर हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (७)
अष्ट च मे ऽ शीतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (८)
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हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले आठ और अस्सी अर्थात
अट्ठासी हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (८)
नव च मे नवतिश्च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (९)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे नौ और नब्बे अर्थात्
निन्यानवे हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (९)
दश च मे शतं च मे ऽ पवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (१०)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे दस और सौ अर्थात एक
सौ दस हों, परंतु तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (१०)
शतं च मे सहस्रं चापवक्तार ओषधे.
ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला कर:.. (११)
हे ऋतु के अनुसार उत्पन्न ओषधि! मेरी निंदा करने वाले चाहे सौ और हजार अर्थात्
ग्यारह सौ हों, पर तू मेरी वाणी को मधुर बना, क्योंकि तू मधुर है. (११)
सूक्त-१६ देवता—एक वृष
यद्येकवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (१)
हे लवण! यदि तू एक वृषभ अर्थात् बैल के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान
उत्पन्न कर, अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (१)
यदि द्विवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (२)
हे लवण! यदि तू दो बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना,
अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (२)
यदि त्रिवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (३)
हे लवण! यदि तू तीन बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर,
अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (३)
यदि चतुर्वृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (४)
हे लवण! यदि तू चार बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय को संतान वाली बना,
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अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (४)
यदि पञ्चवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (५)
हे लवण! यदि तू पांच बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर,
अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (५)
यदि षड्वृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (६)
हे लवण! यदि तू छह बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर,
अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (६)
यदि सप्तवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (७)
हे लवण! यदि तू सात बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना,
अन्यथा तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (७)
यद्यष्टवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (८)
हे लवण! यदि तू आठ बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर,
अन्यथा तू शक्तिरहित समझा जाएगा. (८)
यदि नववृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (९)
हे लवण! यदि तू नौ बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय से संतान उत्पन्न कर,
अन्यथा तू प्रभावरहित समझा जाएगा. (९)
यदि दशवृषो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (१०)
हे लवण! यदि तू दस बैलों के समान शक्तिशाली है तो इस गाय को संतान वाली बना,
अन्यथा तू प्रभावहीन समझा जाएगा. (१०)
यद्येकादशो ऽ सि सृजारसो ऽ सि.. (११)
हे लवण! यदि तू ग्यारह बैलों के समान शक्ति वाला है तो इस गाय से संतान उत्पन्न
कर, नहीं तो तू शक्तिहीन समझा जाएगा. (११)
सूक्त-१७ देवता—ब्रह्मजाया
ते ऽ वदन् प्रथमा ब्रह्मकिल्बिषे ऽ कूपारः सलिलो मातरिश्वा.
वीडुहरास्तप उग्रं मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतस्य.. (१)
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सूर्य, वरुण, वायु, चंद्र तथा आप अर्थात् जलदेवी—ये देवता ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं.
इन्होंने ब्राह्मण द्वारा अपराध करने के विषय में कहा है. (१)
सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छदहृणीयमानः.
अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय.. (२)
सब से पहले सोम ने ब्रह्म के लिए उस गाय को दे दिया, जिस ने उन्हें उत्पन्न किया था.
उस समय वरुण और सूर्य सोम के सहयोगी बने और अग्नि उन के होता थे. (२)
हस्तेनैव ग्राह्य आधिरस्या ब्रह्मजायेति चेदवोचत्.
न दूताय प्रहेया तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य.. (३)
यह हम को उत्पन्न करने वाली है, इस प्रकार जो कहे उस का संकल्प हाथ में ले. यह
संकल्प लेने के लिए दूत को न भेजे. (३)
यामाहुस्तारकैषा विकेशीति दुच्छुनां ग्राममवपद्यमानाम्.
सा ब्रह्मजाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान्.. (४)
ग्राम की ओर बढ़ती हुई तारिका को उल्का कहते हैं. उस उल्का का अंश जहां गिरता
है, उस राज्य का नाश हो जाता है. इस प्रकार ब्रह्म से उत्पन्न तारिका राज्य का नाश कर देती
है. (४)
ब्रह्मचारी चरति वेविषद् विषः स देवानां भवत्येकमङ्गम्.
तेन जायामन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं१ न देवाः.. (५)
ब्रह्मचर्य देवता का अंग रूप होता है. वह ब्रह्मचर्य में रमण करता हुआ प्रजा के मध्य
घूमता है. जिस प्रकार देवों ने सोम के चमस को प्राप्त किया है, उसी प्रकार बृहस्पति ने
ब्रह्मचर्य के द्वारा पत्नी को पाया. (५)
देवा वा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तऋषयस्तपसा ये निषेदुः.
भीमा जाया ब्राह्मणस्यापनीता दुर्धा दधाति परमे व्योमन्.. (६)
तपस्या में लीन रहने वाले सप्त ऋषियों ने और देवों ने ब्राह्मण जाया की चर्चा की थी
कि ब्राह्मण की अपहरण की गई स्त्री स्वर्ग में भयंकर बन जाती है और अपहरण कर्ता की
दुर्गति करती है. (६)
ये गर्भा अवपद्यन्ते जगद् यच्चापलुप्यते.
वीरा ये तृह्यन्ते मिथो ब्रह्मजाया हिनस्ति तान्.. (७)
जो गर्भ गिराए जाते हैं, संसार में जो उथलपुथल होती है, वीरों की परस्पर मारकाट, ये
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सारे कर्म ब्राह्मण की पत्नी ही करती है. (७)
उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः.
ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा.. (८)
ब्राह्मण की पत्नी के पूर्व अब्राह्मण बालक चाहे दस हों, पर जो ब्राह्मण उस का पाणि
ग्रहण करता है, वही उस का पति होता है. (८)
ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो ३ न वैश्यः.
तत् सूर्यः प्रब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः.. (९)
ब्राह्मणी का पति ब्राह्मण ही हो सकता है, क्षत्रिय और वैश्य नहीं. सूर्य देव पांच प्रकार
के मानव—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद यह कहते हुए दमन करते हैं. (९)
पुनर्वे देवा अददुः पुनर्मनुष्या अददुः.
राजानः सत्यं गृह्नाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः.. (१०)
ब्राह्मण पत्नी को देवों, मनुष्यों और राजाओं ने सत्य को ग्रहण कर के प्रदान किया.
(१०)
पुनर्दाय ब्रह्मजायां कृत्वा देवैर्नािकल्बिषम्.
ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वोरुगायमुपासते.. (११)
हम देवों द्वारा स्वच्छ किए हुए शक्तिदायक अन्न का विभाग कर के ब्राह्मण पत्नी को
देते हैं तथा अत्यधिक कीर्तिशाली परमात्मा की उपासना करते हैं. (११)
नास्य जाया शतवाही कल्याणी तल्पमा शये.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१२)
जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी और गाय को बाधा पहुंचाई जाती है, वहां भांतिभांति
के कल्याण करने वाली पत्नी शैय्या पर शयन नहीं करती. (१२)
न विकर्णः पृथुशिरास्तस्मिन् वेश्मनि जायते.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१३)
जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राज्य में विशाल
मस्तक वाले पुरुष जन्म नहीं लेते. (१३)
नास्य क्षत्ता निष्कग्रीवः सूनानामेत्यग्रतः.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१४)
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जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को मोहित कर के रोका जाता है, उस राज्य का वीर
निष्क नाम का सोने का आभूषण धारण कर के भी सूना से आगे नहीं जा पाता. (१४)
नास्य श्वेतः कृष्णकर्णो धुरि युक्तो महीयते.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१५)
जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को चेतनाहीन कर के रोका जाता है, उस राज्य में राजा
का श्वेत कानों वाला घोड़ा रथ के आगे जुत कर भी प्रशंसित नहीं होता. (१५)
नास्य क्षेत्रे पुष्करिणी नाण्डीकं जायते बिसम्.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१६)
जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राष्ट्र की पुष्करिणी
में कमल और कमल तंतु उत्पन्न नहीं होते. (१६)
नास्मै पृश्निं वि दुहन्ति ये ऽ स्या दोहमुपासते.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१७)
जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी अचेत कर के रोकी जाती है, उस राष्ट्र में दूध दुहने की
इच्छा करने वाले थोड़ा दूध भी नहीं दुह पाते. (१७)
नास्य धेनुः कल्याणी नानड्वान्सहते धुरम्.
विजानिर्यत्र ब्राह्मणो रात्रिं वसति पापया.. (१८)
जिस राष्ट्र में जाया अर्थात् पत्नी से रहित ब्राह्मण पाप की भावना से रात्रि निवास करता
है, उस राष्ट्र के स्वामी के यहां गाय कल्याण करने वाली नहीं होती और बैल गाड़ी या रथ के
जुए को नहीं खींचते. (१८)
सूक्त-१८ देवता—ब्राह्मण की गाय
नैतां ते देवा अददुस्तुभ्यं नृपते अत्तवे.
मा ब्राह्मणस्य राजन्य गां जिघत्सो अनाद्याम्.. (१)
हे राजन्! देवों ने यह गाय तुम को भक्षण करने के लिए नहीं दी है. ब्राह्मण की गाय
अखाद्य है. इसे खाने की इच्छा मत कर. (१)
अक्षद्रुग्धो राजन्यः पाप आत्मपराजितः.
स ब्राह्मणस्य गामद्यादद्य जीवानि मा श्वः.. (२)
इंद्रियों को वश में न करने वाला एवं आत्मपराजित जो राजा ब्राह्मण की गाय का
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भक्षण करता है, वह पापी राजा जीवित नहीं रहता. (२)
आविष्टिाघविषा पृदाकूरिव चर्मणा.
सा ब्राह्मणस्य राजन्य तृष्टैषा गौरनाद्या.. (३)
ब्राह्मण की चर्म से ढकी हुई गाय केंचुली से ढकी हुई व्यानी सर्पिणी के समान है. हे
राजन्! यह भक्षण करने योग्य नहीं है. (३)
निर्वै क्षत्रं नयति हन्ति वर्चो ऽग्निरिव रब्धो वि दुनोति सर्वम्.
यो ब्राह्मणं मन्यते अन्नमेव स विषस्य पिबति तैमातस्य.. (४)
जो राजा ब्राह्मण के पदार्थों का भक्षण करता है, वह विष पीता है और अपना क्षात्र तेज
गवां देता है. जिस प्रकार क्रोध में भरे हुए अग्नि देव सब कुछ नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार
ब्राह्मण के पदार्थों को खाने योग्य समझने वाला राजा नष्ट हो जाता है. (४)
य एनं हन्ति मृदुं मन्यमानो देवपीयुर्धनकामो न चित्तात्.
सं तस्येन्द्रो हृदये ऽग्निमिन्ध उभे एनं द्विषो नभसी चरन्तम्.. (५)
ब्राह्मण को मृदु समझने वाला जो अज्ञानी उसे नष्ट करना चाहता है, वह देव हिंसक है.
इंद्र उस पापी के हृदय में अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों उस के
प्रति वैर भाव रखते हैं. (५)
न ब्राह्मणे हिंसितव्यो ३ ग्निः प्रियतनोरिव.
सोमो ह्यस्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः.. (६)
जिस प्रकार अपने शरीर को कोई नष्ट नहीं करना चाहता, उसी प्रकार अग्नि के समान
तेजस्वी ब्राह्मण का नाश भी नहीं करना चाहिए. सोम ब्राह्मण का संबंधी हैं और इंद्र ब्राह्मण
के शाप को पूर्ण करते हैं. (६)
शतापाष्ठां नि गिरति तां न शक्नोति निःखिदम्.
अन्नं यो ब्रह्मणं मल्वः स्वाद्व१द्मीति मन्यते.. (७)
जो पापी ब्राह्मण के अन्न को स्वादिष्ट समझ कर भक्षण करता है, वह पापी मानव
सैकड़ों विपत्तियों को निगलता है. (७)
जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः.
तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून हृदबलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः.. (८)
ब्राह्मण की जीभ धनुष की प्रत्यंचा, वाणी धनुष की लकड़ी और तपस्या के कारण
पवित्र दांत तीर हैं. ब्राह्मण देवताओं से प्रेरित इन्हीं धनुष बाणों से देव हिंसकों को बींधता है.
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