अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को मोहित कर के रोका जाता है, उस राज्य का वीर
निष्क नाम का सोने का आभूषण धारण कर के भी सूना से आगे नहीं जा पाता. (१४)
नास्य श्वेतः कृष्णकर्णो धुरि युक्तो महीयते.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१५)
जिस राज्य में ब्राह्मण की पत्नी को चेतनाहीन कर के रोका जाता है, उस राज्य में राजा
का श्वेत कानों वाला घोड़ा रथ के आगे जुत कर भी प्रशंसित नहीं होता. (१५)
नास्य क्षेत्रे पुष्करिणी नाण्डीकं जायते बिसम्.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१६)
जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी को अचेत कर के रोका जाता है, उस राष्ट्र की पुष्करिणी
में कमल और कमल तंतु उत्पन्न नहीं होते. (१६)
नास्मै पृश्निं वि दुहन्ति ये ऽ स्या दोहमुपासते.
यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या.. (१७)
जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की पत्नी अचेत कर के रोकी जाती है, उस राष्ट्र में दूध दुहने की
इच्छा करने वाले थोड़ा दूध भी नहीं दुह पाते. (१७)
नास्य धेनुः कल्याणी नानड्वान्सहते धुरम्.
विजानिर्यत्र ब्राह्मणो रात्रिं वसति पापया.. (१८)
जिस राष्ट्र में जाया अर्थात् पत्नी से रहित ब्राह्मण पाप की भावना से रात्रि निवास करता
है, उस राष्ट्र के स्वामी के यहां गाय कल्याण करने वाली नहीं होती और बैल गाड़ी या रथ के
जुए को नहीं खींचते. (१८)
सूक्त-१८ देवता—ब्राह्मण की गाय
नैतां ते देवा अददुस्तुभ्यं नृपते अत्तवे.
मा ब्राह्मणस्य राजन्य गां जिघत्सो अनाद्याम्.. (१)
हे राजन्! देवों ने यह गाय तुम को भक्षण करने के लिए नहीं दी है. ब्राह्मण की गाय
अखाद्य है. इसे खाने की इच्छा मत कर. (१)
अक्षद्रुग्धो राजन्यः पाप आत्मपराजितः.
स ब्राह्मणस्य गामद्यादद्य जीवानि मा श्वः.. (२)
इंद्रियों को वश में न करने वाला एवं आत्मपराजित जो राजा ब्राह्मण की गाय का
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