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सर्वकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 652

नीरोग तथा हर्ष युक्त करो तथा पर्यंक (पलंग) पर चढ़ाते हुए दीर्घ काल तक प्रदीप्त होते रहो.
(४९)
ते देवेभ्य आ वृश्चन्ते पापं जीवन्ति सर्वदा.
क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादश्व इवानुवपते नडम्.. (५०)
जिन का पाप अश्व द्वारा घास को कुचलने के समान क्रव्याद अग्नि को कुचलता है,
पाप से अपनी जीविका चलाने वाले वे पुरुष देवयान के घातक हैं. तू इस पशु धर्म पर चढ़.
(५०)
ये ऽ श्रद्ध्रा धनकाम्या क्रव्यादा समासते.
ते वा अन्येषां कुम्भीं पर्यादधति सर्वदा.. (५१)
जो मनुष्य धन की इच्छा से क्रव्याद अग्नि की सेवा करते हैं, वे पुरुष सदा दूसरों की
रक्षा करते हैं. (५१)
प्रेव पिपतिषति मनसा मुहुरा वर्तते पुनः.
क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादनुविद्वान् वितावति.. (५२)
जिस पुरुष के पास आ कर क्रव्याद अग्नि तपती है, वह बारबार आवागमन के चक्र में
पड़ा रहता है तथा अधोगति को प्राप्त होता है. (५२)
अविः कृष्णा भागधेयं पशूनां सीसं क्रव्यादपि चन्द्रं त आहुः.
माषाः पिष्टा भागधेयं ते हव्यमरण्यान्या गह्वरं सचस्व.. (५३)
हे क्रव्याद अग्नि! काली भेड़, सीसा और चंद्रमा को तेरा भाग माना जाता है तथा पिसे
हुए उरद भी तेरे हव्य रूप हैं. अतः तू फिर जंगल में पहुंच जा. (५३)
इषीकां जरतीमिष्ट्वा तिल्पिञ्जं दण्डनं नडम्.
तमिन्द्र इध्मं कृत्वा यमस्याग्निं निरादधौ.. (५४)
पुरानी सींक, दंड, तिलों का ढेर तथा सरकंडे को इंद्र ने ईंधन बनाया और उस के द्वारा
यम की इस अग्नि को पृथक् कर दिया. (५४)
प्रत्यञ्चमर्कं प्रत्यर्पयित्वा प्रविद्वान् पन्थां वि ह्या विवेश.
परामीषामसूनू दिदेश दीर्घेणायुषा समिमान्त्सृजामि.. (५५)
गार्हपत्य अग्नि सूर्य को अर्पित हो कर देवयान मार्ग में प्रविष्ट हुई थी और जिन के प्राणों
को नष्ट कर दिया, मैं उन यजमानों को चिर आयु से युक्त करता हूं. (५५)
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