अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 650, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् कृषते यद् वनुते यच्च वस्नेन विन्दते.
सर्वं मर्त्यस्य तन्नास्ति क्रव्याच्चेदनिराहितः.. (३६)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि का सेवन करना न छोड़े, उस की कृषि, सेवनीय वस्तु, बहुमूल्य
वस्तु आदि जो उस के पास है, वे शून्य के समान रह जाती हैं. (३६)
अयज्ञियो हतवर्चा भवति नैनेन हविरत्तवे.
छिनत्ति कृष्या गोर्धनाद् यं क्रव्यानुवर्त्त.. (३७)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को नहीं छोड़ता, वह यज्ञ करने का अधिकारी नहीं रहता. उस
का तेज नष्ट हो जाता है तथा आहूत अर्थात् बुलाए गए देवता उस के पास नहीं आते. (३७)
मुहुर्गृध्यैः प्र वदत्यार्तिं मर्त्यो नीत्य.
क्रव्याद् यानग्निरन्तिकादनुविद्वान् वितावति.. (३८)
क्रव्याद अग्नि जिस के पास रह कर ताप देता है, वह पुरुष अत्यंत व्यथा को प्राप्त होता
है. आवश्यक वस्तुओं के समेत उसे बारबार दीन वचन कहने पड़ते हैं. (३८)
ग्राह्या गृहाः सं सृज्यन्ते स्त्रिया यन्म्रियते पतिः.
ब्रह्मैव विद्वानेष्यो ३ यः क्रव्यादं निरादधत्.. (३९)
जो पुरुष क्रव्याद अग्नि को पूर्ण रूप से ग्रहण करता है, उस के लिए घर कारागार के
समान बन जाता है और स्त्री का पति मृत्यु को प्राप्त होता है. उसे विद्वान् मनुष्य का आदेश
मानना चाहिए. (३९)
यद् रिप्रं शमलं चकृम यच्च दुष्कृतम्.
आपो मा तस्माच्छुम्भन्त्वग्नेः संकसुकाच्च यत्.. (४०)
हम जो पाप कर चुके हैं, उस पाप से तथा शव भक्षक अग्नि के स्पर्श के दोष से मुझे
जल बचाएं. (४०)
ता अधरादुदीचीराववृत्रन् प्रजानतीः पथिभिर्देवयानैः.
पर्वतस्य वृषभस्याधि पृष्ठे नवाश्चरन्ति सरितः पुराणीः.. (४१)
जल देव मार्ग के द्वारा दक्षिण से उत्तर को जाते हैं तथा नवीन बन कर वर्षा के रूप
पर्वत पर नदी का रूप धारण कर लेते हैं. (४१)
अग्ने अक्रव्यान्निः क्रव्यादं नुदा देवयजनं वह.. (४२)
हे गार्हपत्य अग्नि! तुम क्रव्याद अग्नि को हम से दूर करो तथा देव पूजन की सामग्री को
वहन करो. (४२)
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