सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७)

सुन्दर आचरणयुक्त वासुदेवपरायणको उत्पन्न किया । जो शुभलक्षणसे सम्पन्न पौरुओंमें चक्रादि अंकित श्रेष्ठ था ॥ १७ ॥ पुत्रको उत्पन्न हुआ देखकर राजाने सम्पूर्ण क्रिया की और लोकमें अम्बरीष नामसे वह विख्यात हुआ ॥ १८

पितर्युपरते श्रीमानभिषिक्तोमहात्मभिः । मंत्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्रं चकार सः ॥ १९ ॥ संवत्सर सहस्रं वै जगन्नारायणं प्रभुम् । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं सूर्यमण्डलमध्यगम् ॥ २० ॥

पिताके उपराम होनेमें उसका राज्याभिषेक हुआ, तब अम्बरीषने मन्त्रीजनोंको राज्य सौंपकर वनमें जाकर तप किया ॥ १९ ॥ सहस्रसंवत्सरतक नारायणका जप किया, हृदयकमलके मध्यमें तथा सूर्यमें नारायणका जप करते हुए ॥ २० ॥

शंखचक्रगदापद्मं धारयंतं चतुर्भुजम् । शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ॥ २१ ॥ सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं प्रभुम्। श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुषं पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥

तब शंख चक्र गदा पद्म धारण करनेवाले चतुर्भुज शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान् ब्रह्मा विष्णु शिवात्मकरूप ॥ २१ ॥ सम्पूर्ण आभरणोंसे युक्त पीतांबरधारी प्रभु श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये पुरुषोत्तम देव ॥ २२ ॥

ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः । आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकनमसकृतः ॥ २३ ॥ ऐरावतमिवार्चित्ये कृत्वा वै गरुडं हरिः । स्वयं शक्र इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम् ॥ २४ ॥

गरुडपर चढे देवर्षियोंसे स्तुतिको प्राप्त सब लोकोंसे नमस्कारको प्राप्त हुए नारायण आये ॥ २३ ॥ और गरुडको अचिन्त्य ऐरावतके समान करके और इन्द्रका रूप स्वयं धारण कर उसके निकट आकर यह कहने लगे ॥ २४ ॥

इंद्रोऽहमस्मि भद्रं ते किं ददामि तवाद्य वै । सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वां रक्षितुं समुपागतः ॥ २५ ॥ अम्बरीषस्तु तं दृष्ट्वा शक्रमैरावतस्थितम् । उवाच वचनं धीमान्विष्णुभक्तिपरायणः ॥ २६ ॥

हे राजन् ! मैं इन्द्र हूं तुम्हारा मंगल हो तुम्हारे निमित्त मैं क्या वस्तु दूं मैं सर्वलोकेश्वर तुम्हारी रक्षा करनेको आया हूं ॥ २५ ॥ अम्बरीष राजा ऐरावतपर स्थित हुए इन्द्रको देखकर विष्णुभक्तिमें परायण इस प्रकारके वचन कहने लगे ॥ २६ ॥

(८) . अद्भुतरामायण [ द्वितीय-

नाहं त्वामभिसंधाय तप आस्थितवानिह । त्वया दत्तं च नेच्छामि
गच्छ शक्र यथासुखम् ॥ २७ ॥ मम नारायणो नाथस्त्वां न तोष्येऽ-
मराधिप । व्रजेन्द्र मा वृथास्त्वत्र ममाश्रमविलोपनम् ॥ २८ ॥

कि, मैंने आपके उद्देशसे तप नहीं किया है । आपकी दीहुई वस्तुकी मुझे
इच्छा नहीं, आप यथेच्छ गमन करिये ॥ २७ ॥ हे इन्द्र ! मेरे स्वामी नारायण
हैं मैं आपसे कुछ नहीं चाहता, आप पधारिये इस आश्रममें वृथा कालका
व्यय न कीजिये ॥ २८ ॥

ततः प्रहस्य भगवान्स्वरूपमकरोद्धरिः । शार्ङ्गचक्रगदापाणिः
शंखहस्तो जनार्दनः ॥ २९ ॥ गरुडोपरि विश्वात्मा नीलाचल इवा-
परः । देवगन्धर्वसंघैश्च स्तूयमानः समंततः ॥ ३० ॥

तब नारायणने हँसकर अपना स्वरूप प्रगट किया । शार्ङ्ग, चक्र, गदा और
शंख, हाथमें लिये ॥ २९ ॥ जनार्दन विश्वात्मा गरुडपर दूसरे नीलाचलके
समान देव और गन्धर्वोके समूहोंसे सब और स्तुतिको प्राप्त हुए भगवान्को
देख ॥ ३० ॥

प्रणम्य राजा संतुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम् । प्रसीद लोकनाथस्त्वं
मम नाथ जनार्दन ॥ ३१ ॥ कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ सर्वलोकनमस्कृत ।
त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः ॥ ३२ ॥

राजा प्रणाम कर गरुडध्वजको सन्तुष्ट करने लगा, मेरे नाथ ! जनार्दन,
लोकनाथ ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हूजिये ॥ ३१ ॥ हे कृष्ण, हे कृष्ण !
हे जगन्नाथ हे सर्वलोकसे नमस्कृत, आदि अनादि, अनंत, प्रभु हो ॥ ३२ ॥

अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः । महेश्वरांशजो मध्यः
पुष्करः खगगः खगः ॥ ३३ ॥ कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः
प्रभंजनः । आदिदेवः क्रियानंदः परमात्मनि संस्थितः ॥ ३४ ॥

अप्रमेय विभु विष्णु गोविन्द कमलोचन महेश्वर अंशोत्पन्न मध्यपुष्कर
और अनन्त पुरुष प्रभु हो ॥ ३३ ॥ आप कव्यवाह, कपाली हव्यवाह प्रभंजन
हो, आप आदिदेव, क्रियानन्द परमात्मामें स्थित हो ॥ ३४ ॥

त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविंद पाहि मां पुष्करेक्षण । नान्या गति-
स्त्वदन्या मे त्वामेव शरणं गतः ॥ ३५ ॥ तमाह भगवान्विष्णुः किं
ते हृदि चिकीर्षितम् । तत्सर्वं संप्रदास्यामि भक्तोऽसि मम सुव्रत ॥ ३६ ॥