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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] · हिन्दीटीकासहित (१३१)

सर्ग ] · हिन्दीटीकासहित (१३१)

मन्ता राम हैं और मति सीता है इनको विना विचारे मानना उचित है एकही सर्वगत सूक्ष्म अचल और ध्रुव हैं ।। १७ ।। योगी उसको देखते हैं वही देवीका परमपद है वह अनन्त अजर ब्रह्म केवल निष्कल और परे है ।। १८ ।।

योगिनस्तत्प्रपश्यन्ति तव देव्याः परं पदम् ।। सा त्वं धात्रीव परमा यानन्दनिधिमिच्छताम् ।। १९ ।। संसारतापानखिलान्हरसीश्वर-संश्रयात् ।। नेदानीं भूतसंहारस्त्वया कार्यो महेश्वरि ।। २० ।।

हे देवि ! आपके उस पदको योगी देखते हैं वह तुमही परमधात्री हो आनंदसागरकी इच्छा करनेवालोंको ।। १९ ।। ईश्वरके संश्रयसे संसारके संपूर्ण तापोंको दूर करती हो. हे महेश्वरि ! इस समय तुमको प्राणियोंका संहार न करना चाहिये ।। २० ।।

रावणो सगणं हत्वा जगतां सुखमाहितम् ।। किं पुनर्नृत्यकलया जगत्संह्रियते त्वया ।। २१ ।। एतच्छ्रुत्वाविशालाक्षी ब्रह्मणोऽभ्यर्थनं वचः ।। प्रीता सीता तदा प्राह ब्रह्माणं सहदैवतम् ।। २२ ।।

गणसहित रावणको मारकर जगत्को सुखी किया है फिर अब नृत्यके व्याजसे सब जगत्का संहार क्यों करती हो ।। २१ ।। वह विशाला श्रीब्रह्माजी-की यह प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो ब्रह्मादि देवतोंसे कहने लगी ।। २२ ।।

पतिर्मे पुंडरीकाक्षः पुष्पकोपरि राघवः ।। विद्धः क्षुरप्रेण हृदि शेते मृतकवत्प्रभुः ।। २३ ।। तस्मिन्नेव स्थिते देवाः किमिच्छामि जगद्धितम् ।। ग्रासमेकं करिष्यामि जगदेतच्चराचरम् ।। २४ ।।

हमारे पति कमललोचन राम पुष्पकविमान पर तीक्ष्ण बाणसे विद्ध हुए मृतकके समान सोते हैं ।। २३ ।। हे देवताओ ! उनके ऐसे होनेमें जगत्के हितकी किस प्रकार इच्छा कर सकती हूं, इस चराचर जगत्का एकही ग्रास कर जाऊंगी ।। २४ ।।

श्रुत्वैतद्वचनं देव्याः संरंभसहित सुराः ।। हाहाकारं प्रचक्रुस्ते संचचाल च मेदिनी ।। २५ ।। ततो ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं पुष्पकं रथमा-स्थितम् ।। श्रीरामं ग्राहयामास स्मृतिं स्पृष्ट्वा स्वपाणिना ।। २६ ।।

संरम्भसहित देवता देवीके यह वचन सुनकर हाहाकार करने लगे, और पृथ्वी चलायमान होगई ।। २५ ।। तब ब्रह्माजीने देवताओंसहित पुष्पकमें स्थित श्रीरामको हाथसे स्पर्श कर स्मृति दिवाई ।। २६ ।।

(१३२) अद्भुतरामायण [चतुर्विंशति-

उत्तस्थौ च महाबाहू रामः कमललोचनः ॥ रे रावण सुदुष्ट-
स्त्वमद्य मद्बाणभेदितः ॥ २७ ॥ द्रक्ष्यस्याशु यमस्यास्यं भ्रुकुटी-
भीषणाकृति ॥ ब्रुवन्नेवं धनुर्गृह्य ह्यपश्यन्त्रिदशान्पुरः ॥ २८ ॥

तब तत्काल महाबाहु राम उठ बैठे, और बोले अरे रावण ! तू आज मेरे बाणसे भेदित होकर ॥ २७ ॥ अवश्य भयंकर भौंवाले यमराजका मुख देखेगा, जब यह कहकर धनुष ग्रहण किया तब देवताओंको अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २८ ॥

नापश्यज्जानकीं तत्र प्राणेभ्योपि गरीयसीम् ॥ नृत्यतीं चापरां कालीमपश्यच्च रणांगणे ॥ २९ ॥ चतुर्भुजां चलज्जिह्वां खङ्गखर्पर-
धारिणीम् ॥ शवरूपमहादेवहृत्संस्थां च दिगंबराम् ॥ ३० ॥

परन्तु प्राणप्यारी जानकीको वहां नहीं देखा युद्धस्थलमें नृत्य करती हुई महाकालीको देखा ॥ २९ ॥ और स्थितिके निमित्त शवरूपधारी महा-देवको देखा चार भुजा चलजिह्वा खड्गखर्परधारिणी जानकीको देखा ॥ ३० ॥

पिबन्तीं रुधिरं भीमां कोटराक्षीं क्षुधातुराम् ॥ जगद्ग्रासे कृतो-
त्साहां मुण्डमालाविभूषणाम् ॥ ३१ ॥ भीमाकाराभिरन्याभिः
क्रीडंतीं रणमूर्द्धनि ॥ मुण्डै राक्षसरांजस्य खेलंतीं कंदुकं मुदा ॥ ३२ ॥

वह कोटराक्षी महाभयंकर खङ्ग खर्पर धीरण किये दिगम्बर जगत्के ग्रासमें उत्साह करती मुण्डमालाके गहना पहरे ॥ ३१ ॥ और दूसरी भयंकर कन्दुक मूर्ति धारण किये हुए मृतकाओंके साथ रणभूमिमें क्रीडा करते देखा, और राक्षसराजके शिरके संग कन्दुक क्रीडा करते देखा ॥ ३२ ॥

प्रलयध्वांतधाराभां सदा घर्घरनादिनीम् ॥ अन्त्रमुण्डकरोटचक्ष-
कृतमालां चलत्पदाम् ॥ ३३ ॥ कबन्धान्राक्षसानां च तया सह विनृ-
त्यतः ॥ रथवाजिगजानां च शकलानि व्यलोकयत्यय् ॥ ३४ ॥

प्रलयकालके अन्धकारके समान सदा घर्घर शब्द करनेवाली आँते शिर हाथ नेत्रोंकी माला बनाये पद चलाती ॥ ३३ ॥ मृतक राक्षसोंके कबन्धोंके साथ नृत्य करती, रथ घोडे हाथियोंको टुकडोंको देखती हुई ॥ ३४ ॥

नैकोपि राक्षसो यत्र करपादशिरोयुतः ॥ कबन्धा ये च नृत्यंति
तेषां पादाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३५॥ कबन्धं रावणस्यापि नृत्यन्तं च व्यलोक-
यत् ॥ तद्दृष्ट्वा मुमहाघोरं प्रेतराजपुरोपमम् ॥ ३६ ॥