अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५९)
दशम सर्ग
रामचन्द्रका महावीरको चतुर्भुजरूप दिखाना
अथ सीतालक्ष्मणाभ्यां सह केनापि हेतुना । जगाम विपिनं रामो दंडकारण्यमाश्रितः ॥ १ ॥ तत्र गोदावरीतीरे पर्णशालां विधाय सः । उवाच कंचित्कालं वै मृगयामभिकारयन् ॥ २ ॥
फिर सीता लक्ष्मणके साथ किसी कारणसे रामचन्द्र दण्डकारण्यमें आये । ॥ १ ॥ वहां गोदावरीके किनारे पर्णशाला रचकर मृगया करते कुछ दिन वहाँ रहे ॥ २ ॥
कदाचिद्रावणो मोहाल्लंकायां तां न्यवासयत् । तामदृष्ट्वा ततो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥ ३ ॥ आटतुश्चाटवीं सर्वां सीतादर्शन-लालसौ । रामस्य रुदतस्तस्य बाष्पवारिसमुद्भवा ॥ ४ ॥
एक समय मोहसे जानकीको हरण कर रावण ले गया, उनको राम लक्ष्मण देखकर ॥ ३ ॥ सीताके दर्शनकी इच्छासे सम्पूर्ण वन ढूंढते हुए ॥ ४ ॥
नदी वैतरणी चाभूच्चक्षुषोरश्रुवुद्भवा । वितरत्यश्रु वै यस्मादतो वैतरणीस्मृता ॥ ५ ॥ पितॄणां तरणं यस्मान्मानूणां स्नानतर्पणात् । तेनापि कारणेनासौ नदी वैतरणी स्मृता ॥ ६ ॥
उनके नेत्रोंके जलसे एक वैतरणी नदी बह गई थी; आंसू विपरीत होनेसे वह वैतरणी कहाई ॥५॥ जिसमें स्नान दान करनेसे मनुष्योंके पितर तरते और तृप्त हो जाते हैं इसी कारणसे वैतरणी कहाती है ॥ ६ ॥
नेत्रयोर्दूषिकायाश्चय ताभिः शैलास्ततोऽभवन् । सुग्रीवेण वानरेण सख्यं कर्तुं महामनाः ॥ ७ ॥ ऋष्यमूकंमगाद्रामो लक्ष्मणेनानुजेन च । पञ्चभिर्मंत्रिभिः सार्द्धं सुग्रीवो नाम वानरः ॥ ८ ॥
और नेत्रोंके मलसे वहांसे पर्वत हो गये हैं फिर वे सुग्रीवके साथ मित्रता करनेकी इच्छासे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र लक्ष्मणके सहित ऋष्यमूक पर्वतको गये; वहां पांच मंत्रियोंके साथ सुग्रीव नामक वानर ॥ ८ ॥
यत्रास्ते वालिभयतः सोऽपश्यद्रामलक्ष्मणौ । चापबाणधरौ वीरौ ग्रसंताविव चाम्बरम् ॥ ९ ॥ तौ दृष्ट्वा सुमहत्त्रस्तो वालिपक्षा-वमन्यत । प्रास्थापयद्धनूमंतं भिक्षुरूपेण वानरम् ॥ १० ॥
(६०) अद्भुतरामायण [ दशम -
आत्मानं दर्शयामास हनूमान्रामलक्ष्मणौ । को भवानिति
चोक्तेऽथ चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥ ११ ॥ शंखचक्रगदापाणिं वनमाला-
विभूषितम् । श्रीवत्सबक्षसं देवं पीतवाससमच्युतम् ॥ १२ ॥
वालीके भयसे रहता था, उसने रामलक्ष्मणको देखा, वह वीर चाप धारण किये आकाशसे ग्रसते हुएके समान थे ॥ ९ ॥ उनको देखकर सुग्रीव बडे त्रासको प्राप्त हुआ, कारण कि, उनको वालीके पक्षका जाना, तब भिक्षुरूपसे महावीरको उनके निकट भेजा ॥ १० ॥ हनुमान्ने रामलक्ष्मणको अपना स्वरूप दिखाया, आप कौन हो इस प्रकार चतुर्बाहु किरीटधारी ॥ ११ ॥ शंख, चक्र, गदापाणि वन मालासे विभूषित श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये, पीतवस्त्रधारी अच्युत ॥ १२ ॥
लक्ष्मीसरस्वतीभ्यां च संश्रितोभयपार्श्वकम् । ब्रह्मपुत्रैः सनन्दाद्यैः
स्तूयमानं समन्ततः ॥ १३ ॥ देवर्षिपितृगंधर्वैः सिद्धविद्याधरोरगैः ।
सेव्यमानं महात्मानं पुंडरीकविलोचनम् ॥ १४ ॥
लक्ष्मी सरस्वतीसे सेवित ब्रह्माके पुत्र सनन्दादिसे सब ओर सेव्यमान ॥ १३ ॥ देवता पितर गन्धर्व सिद्धविद्याधर उरग महात्माओंसे सेवित कमललोचन ॥ १४ ॥
सहस्र सूर्यसंकाशं शतचन्द्रशुभाननम् । फणासहस्रमतुलं धारयन्तं
च लक्ष्मणम् ॥ १५ ॥ अनन्तं रामशिरसि आतपत्रं फणागणैः ।
दधानं सर्वलोकेशनागसंघैश्च संस्तुतम् ॥ १६ ॥
सहस्रसूर्यके समान प्रकाशमान, सौ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले सहस्र फण धारण किये लक्ष्मणको ॥ १५ ॥ जो अनन्त हैं और रघुनाथजीके शिरपर अपने फणोंका छत्र धारण किये हैं वे सर्वलोकेश नागसमूहोंसे स्तुति किये हुए हैं ॥ १६ ॥
आत्मानं दर्शयामास रामचन्द्रो हनूमते । तद्रूपं हनूमन्वीक्ष्य
किमेतदिति विस्मितः ॥ १७ ॥ क्षणं निमील्य नयने पुनः सोऽपश्यद-
द्भुतम् । स्तुत्वा नत्वा च बहुधा सोऽब्रवीद्राघवं वचः ॥ १८ ॥
इस प्रकार रामचन्द्रने महावीरजीके प्रति अपनी आत्माको दिखाया महावीरजी उस रूपको देख यह क्या है इस प्रकार विस्मित हो गये ॥ १७ ॥ क्षणमात्रको नेत्र मीचकर फिर वह अद्भुत रूप देखते हुए और अनेक प्रकारकी स्तुति और प्रणाम कर रामचन्द्रसे कहने लगे ॥ १८ ॥