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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)

धना सुप्रसादा च भवदा च जनेश्वरी ॥ एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा ॥ ३७ ॥ कंदुतिः कंदुका चैव वेदमित्रा सुदेविका ॥ लम्बास्या केतकी चैव चित्र सेना चलाचला ॥ ३८ ॥

धनदा सुप्रसादा भवदा जनेश्वरी एडी समेडी भेडी वेतालजननी ॥ ३७ ॥ कंदुति कन्दु‌का वेदमित्रा सुदेविका लम्बास्या केतकी चित्रसेना चला अचला ३८

कुक्कुटिका शृंखलिका तथा शंकुलिका हडा ॥ कन्दालिका काकलिका कुंभिकाथ शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला च महावेगा च कंकिनी ॥ मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना तथा । ४० ।

कुक्कुटिका शृंखलिका संकुलिखा हडा कंदालिका काकलिका कुंभिका शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला महावेगा कंकिनी मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना ॥ ४० ॥

खेशया चातिद्रढिमा क्रोशनाथत दित्प्रभा ॥ मंदोदरी च तुंडीच कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लंबिनी लंबा बहुचूडा विकत्थिनी ॥ ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥

खेशया अतिद्रढिमा क्रोशना तडित्प्रभा मन्दोदरी तुंडी कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लम्बिनी लम्बा वहुचूडा विकत्थिनी ऊर्ध्ववेणीधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥

पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा तथैव च ॥ यक्षाणिका मत्सरिका जरायुर्जर्जरानना ॥ ४३ ॥ ख्यातां डहडहा चैव तथा धमधमा द्विजा ॥ खंडखंडा पृथुश्रोणी पूषणामणि कुट्टिका ॥ ४४ ॥

पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा यक्षणिका मत्सरिका जरायु जर्जरानना ॥ ४३ । ख्याता दहपहा धमधमा खण्डखण्डा पृथुश्रेणी पूषणा मणिकुट्टिका ॥ ४४ ॥

अम्लोचा चैव निम्लोचा तथा लंबपयोधरा ॥ वेणुदीणाधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी दृष्ट्वा खरजंघा महाजरा ॥ शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा ॥ ४६ ॥

अम्लोचा निम्लोचा पलोधरा वेणुवीणाधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी हृष्टा खरजंघा महाजरा शिशुरामुखी श्वेता लोहिताक्षी बिभीषणा ॥ ४६ ॥

( १२६ ) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-

जटालीका कामचरी दीर्घजिह्वाबलोत्कटा ।। कालाहिकाया
मालीका मुकुटामुकुटेश्वरी ।। ४७ ।। लोहिताक्षी महाकाया हवि-
ष्पिण्डा च पिण्डिका ।। एकत्वचा सुकूर्म्मा च कुल्लाकर्णि च कर्णिका ।४८

जटालीका कामचारी दीर्घजिह्वा बलोत्कटा कालाहिका मालीका मुकुटा
मुकुटेश्वरी ॥ ४७ ॥ लोहिताक्षी महाकाया हविष्पिण्डा पिण्डिका एकत्वचा
सुकूर्मा कुल्लाकर्णी कर्णिका ॥ ४८ ॥

सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा ।। चतुष्पथनिकेता च
गोकर्णी महिषानना ।। ४९ ।। खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वनमहा-
स्वना ।। शंखकुंभश्रवा चैव भगदा च महाबला ।। ५० ।।

सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा चतुष्पथ निकेता गोकर्णी महिषानना
॥ ४९ ॥ खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वना महास्वना शंखकुम्भश्रवा भगदा
महाबला ॥ ५० ॥

गणा च सुगणा चैव कामदाप्यथ कन्यका ।। चतुष्पथरता चैव
भूतितीर्थान्यगोचरा ।। ५१ ।। पशुदा विबुदा चैव सुखदा च महा-
यशाः ।। पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ।। ५२ ।।

गणा सुगणा कामदा कन्यका चतुष्पथ रता भूतितीर्था अन्यगोचरा ॥ ५१ ॥
पशुदा विबुदा सुखदा महयशा पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ॥ ५२ ॥

प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा च रोचमाना सुलोचना ।। नौकर्णी मुखकर्णी च
विशिरा मंथिनी तथा ।। ५३ ।। एकवक्त्रा मेघरवा मेघवामा द्विरो-
चना ।। एताश्चान्याश्च बहवो मातरः कोटिकोटिशः ।। ५४ ।।

प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा रोचमाना सुलोचना नौकर्णी मुखकर्णी विशिरा
मंथिनी ॥ ५३ ॥ एकमुखी मेघरवा मेघवामा द्विरोचना इसके सिवाय और
भी अनेकों मातायें थीं ॥ ५४ ॥

असंख्याताः समाजग्मुःक्रीडितुं सीतया सह ।। दीर्घवक्ष्यो दीर्घदंत्यो
दीर्घतुंड्यो द्विजोत्तम ।। ५५ ।। सरसा मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलं-
कृताः ।। माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपधरास्तथा ।। ५६ ।।

वे असंख्य जानकीके साथ क्रीडा करनेको आई, दीर्घ वक्षस्थलवाली, दीर्घ
दांतोंवाली, दीर्घनासिकावाली ॥ ५५ ॥ सरस मधुर यौवनमती स्वलंकृत-
महिमासे संयुक्त कामरूपधारिणी ॥ ५६ ॥