अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)
हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम ।। न गेययोगे मंतव्यं
तस्मात्पापं त्वया कृतम् ।। ६९ ।। नष्टं ते स्वर्गलोकाद्यंगच्छ पर्वतको
टरम् ।। ।। पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं ते खाद नित्यं निकृत्य वै ।। ७० ।।
गीत नाटच लयसे युक्त गायन करते हुए हरिमित्रका तुमने संपूर्ण धन हरण कर लिया ।। ६७ ।। जो कुछ उपहारादि था वह सब वासुदेवके समीपसे भृत्योंनें लेकर फेंक दिया ।। ६८ ।। हे राजन् ! हरिकी कीर्तिके बिना ब्राह्मणको गानयोग न करना चाहिये, यह पाप तुमने किया है ।। ६९ ।। तुम्हारे स्वर्ग-लोकादि इसी कर्मसे नष्ट होगये, तुम पर्वतकी कोटरमें जाकर अपनी देहकोही नोच नोचके प्रतिदिन भक्षण करो. ।। ७० ।।
तस्मिन्क्षीणे त्विमं देहं खाद नित्यं क्षुधान्वितः ।। महानिरय-
यसंस्थस्त्वं यावन्मन्वंतरं भवेत् ।। ७१ ।। मन्वंतरे ततोऽतीते भूम्यां
त्वं श्वा भविष्यसि ।। ततः कालेन कियता मानुष्यमनुलप्स्यसे ।। ७२ ।।
क्षुधासे व्याकुल होकर तू नित्य इसी देहको भक्षण कर, इस प्रकार एक मन्वन्तर-तक महानरकमें निवास कर ।। ७१ ।। मन्वंतर बीतनेसे भूमिमें तू कुत्ता होगा, फिर बहुत कालके उपरान्त मनुष्यशरीरको प्राप्त होगा ।। ७२ ।।
एमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। सोऽहं नारद भूपालः
पुरेदानीमुलूकताम् ।। ७३ ।। लब्धवान्कर्मदोषेण हरिमित्रकृतेन वै ।।
ततो मानसशैलेऽहं कोटरे ह्यवसं मुने ।। ७४ ।।
यह कह यमराज वहीं अन्तर्धान होगये हे नारद ! सो वह राजा मैं उलूकताको प्राप्त हुआ हूं ।। ७३ ।। हरिमित्रके साथ क्षुद्रता करनेसे यह दोष मुझको प्राप्त हुआ है हे मुने ! तब मैं इस मानसकी कोटरामें निवास करने लगा ।। ७४ ।।
पूर्वो मृतकदेहो मे भक्षणाय ह्युपस्थितः ।। क्षुधान्वितोऽतंदेहं
खादितुं ह्युपचक्रमे ।।७५।। तत्क्षणं दैवयोगेन हरिमित्रो महायशाः ।।
विमानेनार्कवर्णेन स्तूयमानोऽप्सरोगणैः ७६ ।।
और पूर्व मृतक शरीर मेरे भक्षणके निमित उपस्थित हुआ, मैं क्षुधायुक्त हो उस देहके खानेकी इच्छा करने लगा उसी क्षण दैवयोगसे महायशस्वी हरिमित्र सूर्यके समान प्रकाशमान विमानपर स्थिर अप्सराओंसे स्तुतिको प्राप्त हो ।। ७५ ।। ७६ ।।
(४०) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-
विष्णुदूतैः परिवृतः पथा तेनागतो नृप ।। विष्णुभक्तो महातेजाः
पथि मां दृष्टवान्प्रभु ।।७७।। भुवनेशशरीरंतद्ददर्शोलूक सन्निधौ ।।
पृष्टोऽहं तेन दयया शवसन्निधिसंस्थितः ।। ७८ ।।
विष्णुके दूतोंसे युक्त उस मार्गसे जाता था; उस महातेजस्वी विष्णु
भक्तने मार्गमें राजाको देखा ।। ७७ ।। जब उलूकके निकट भुवनेशका शरीर
देखा तब शवके निकट खडे होकर उसने दयासे पूछा ।। ७८ ।।
भुवनेशस्य नृपतेर्देहोऽयं दृश्यते खग ।। उलूक त्वं च किमिदं
खादितुं चोद्यतो भवान् ।। ७९ ।। तच्छ्रुत्वा हरिमित्राय प्रणम्य
विनयान्वितः ।। कृतांजलिपुटो भूत्वा बहुमानपुरः सरम् ।। ८० ।।
हे पक्षी ! यह तो राजा भुवनेशका शरीर दीखता है और उलूक तू उसको
कैसे भक्षण करता है ।। ७९ ।। यह वचन सुन वह हरिमित्रको प्रणामकर
विनयसे सहित हाथ जोड बहुत मानसे ।। ८० ।।
तत्सर्वं पूर्ववृत्तांतं नारदास्मै न्ववेदयम् ।। पुरापराधं त्वयि
यत्तस्य पाकोऽयमागतः ८१ ।। यावन्मन्वन्तरं विप्रखादिष्यामि
शवं त्विमम् ।। ततः श्वाहं भविष्यामि भविष्यामि ततो नरः ।।८२।।
पहला सब वृत्तांत उससे वर्णन करता हुआ बोला पहले जो तुम्हारा अपराध
किया था उसका यह फल हमको प्राप्त हुआ है ।। ८१ ।। हे विप्र ! एक मन्वन्तर-
तक इस शवको मुझे खाना पडेगा फिर कुत्ता होकर पीछे मनुष्यकी योनि
मिलेगी ।। ८२ ।।
एतदाकर्ण्य करुणो हरिमित्रामहायशाः ।। कृपया मां समाचष्ट
शृणुलूक महीपते ।। ८३ ।। मयि त्वयापराधं यत्तत्सर्वं क्षान्तवान-
हम् ।। शवो ह्यदर्शनं यातु न च श्वा त्वं भविष्यसि ।। ८४ ।।
महायशस्वी दयालू हरिमित्र यह वचन श्रवणकर कृपापूर्वक मुझे बोले,
हे महाबुद्धिमान् उलूक ! तू सुन ।। ८३ ।। जो कुछ तैंने मेरा अपराध किया है
वह मैंने सब क्षमा करदिया, यह शव अन्तर्धान होजाय और तुझको कुत्तेकी
योनि नहीं मिलेगी ।। ८४ ।।
त्वामद्य गानयोगश्च प्राप्नोतु मत्प्रसादतः ।। स्तुहि विष्णुं च
गानेन जिह्वा स्पष्टा च जायताम् ।। ८५ ।। सुरविद्याधराणां च
गंधर्वाप्सरसां तथा । गानाचार्यो भवेथास्त्वं भक्ष्यभोज्यसमन्वितः ८६