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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१९)

बोले, हे भगवन् ! आपने क्या कहा है, यह कामवादका भाव नहीं हे मुनि ! यह आपकी मुनिवृत्ति है क्या ? ॥३३॥ यह वचन सुन नारदजी भगवान् वासुदेवसे कर्णमूलमें बोले मेरे गोलांगूलमुख कर दिया ॥ ३४ ॥

तदाकर्ण्य महाबुद्धिर्देवो नारायणो हरिः । कर्णमूले तमाहेदं वानरास्यं कृतं मया ॥ ३५ ॥ पर्वतस्य तथा विप्र गोलांगूलमुखं तव । यथा भवांस्तथा सोऽपि प्रार्थयामास निर्जने ॥ ३६ ॥

यह वचन सुन महाबुद्धिमान् नारायण कर्णमूलमें कहने लगे कि, मैंने तुम्हारे गोलांगूलमुख कर दिया था ॥ ३५ ॥ और हे विप्र ! इसी प्रकार पर्वतका वानरका मुख कर दिया था जैसे तुमने एकान्तमें प्रार्थना की थी इसी प्रकार इन्होंने प्रार्थना की थी ॥ ३६ ॥

मामेव भक्तिवशगस्तथास्म्यकरवं मुने । न स्वेच्छया कृतं तद्वां प्रियार्थं नान्यथा त्विति ॥ ३७ ॥ याचते यच्च यश्चैव तच्च तस्य ददाम्यहम् । न दोषोऽत्र गुणो वापि युवयोर्मम वा द्विज ॥ ३८ ।

हे मुने ! दोनोंकी भक्तिमें तत्पर होनेके कारण मैंने ऐसा किया था; मैंने स्वेच्छासे नहीं किया आपकी प्रीतिके निमित्तही ऐसा किया है ॥३७॥ हमारा भक्त जो कुछ याचना करता है वही वस्तु में उसको देता हूं ब्राह्मणो ! इसमें मेरा वा तुम्हारा गुण दोष नहीं है ॥ ३८ ॥

पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येवं जगाद सः । शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरो वचः ॥३९॥ प्रियं भवतोः कृतवान्सत्येनायुधमालभे । नारदः प्राह धर्मात्मा आवयोर्मध्यतः स्थितः ॥ ४० ॥

यही बात पर्वतके पूछनेपर नारायणने कही थी और दोनोंके श्रवण करते दामोदर वचन कहने लगे ॥ ३९ ॥ मैं सत्य तथा आयुधकी सौगन्ध करता हूँ कि आपका प्रिय ही किया है तब धर्मात्मा नारदजी कहने लगे हम दोनोंके मध्यमें ॥ ४० ॥

धनुष्मान्द्विभुजःको नु तां हृत्वा गतवान्किल । तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽसौ प्राह नौ मुनिसत्तमौ ॥४१॥ * मायाविनौ महात्मानौ बहवः संति सत्तमौ । तत्र सा श्रीमती देवी हृता केनापि सुव्रतौ ॥ ४२ ॥

* अत्र द्विवचनांतानि सम्बोधनानि ।

(२०) अद्भुतरामायण [चतुर्थं-

धनुष धारण किये दो भुजवाले पुरुष कौन थे जो उसको हरण कर ले गये, यह वचन सुन मुनिश्रेष्ठ उन दोनोंसे बोले ॥ ४१ ॥ हे महात्माओ ! हे सत्तमो ! संसारमें बहुतसे मायावाले हैं सो उनमें किसीने हरण कर ली होगी ॥४२॥

चक्रपाणिरहं नित्यं चतुर्बाहुरिति स्थितिः । तस्मान्नाहमतथ्यो वै भवद्भूयांविदितं हि तत् ॥ ४३ ॥ इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनमूचतुः प्रीतमानसौ । कोऽत्र दोषस्तव विभो नारायण जगत्पते ॥ ४४ ॥

और मैं तो चक्रपाणि तथा चार भुजावाला हूं यह स्थिति है सो मैं वहां नहीं हूंगा यह वार्ता आपको विदित ही है ॥ ४३ ॥ यह कहनेपर वे दोनों प्रणाम कर कहने लगे हे जगत्पते ! इसमें आपका क्या अपराध है ॥ ४४ ॥

दौरात्म्यं तु नृपस्यैव मायां हि कृतवानसौ । इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ ॥ ४५ ॥ अंबरीषं समासाद्य शापेनैनमयोजयत् । नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतौ ॥ ४६ ॥

यह राजाहीकी दुरात्मता है उसने अवश्य माया की है यह कहकर वहांसे पर्वत और नारद चले ॥ ४५ ॥ और अम्बरीके निकट जाकर उसको शाप दिया जब कि नारद और हम पर्वत इस स्थानपर आये थे ॥ ४६ ॥

आहूय पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि । मायायोगेन तस्मात्त्वां *तमोऽज्ञाभिभविष्यति ॥४७॥ तेन नात्मानतथ्यं यथावत्त्वं हि वेत्स्यसि । एवं शापे प्रवृत्ते तु तमोराशि रथोत्थितः ॥ ४८ ॥

तब तुमने हमको बुलाकर दुसरेके निमित्त कन्यादान की इस कारण हमारे शापसे तू अज्ञानी होजायगा ॥ ४७ ॥ अपने आत्माका तुझको यथावत् विचार न रहेगा, इस प्रकार शाप देनेपर महान तमोराशि उपस्थित हुई ॥ ४८ ॥

नृपं प्रति ततश्चक्रं विष्णोःप्रादुरभूत्क्षणात् । चक्रवित्र्रासितं घोरं तावुभावभ्यगात्तमः ॥ ४९ ॥ ततः संत्रस्तसर्वांगौ धावमानौ महामुनी । पृष्ठतश्चक्रमालोक्य तमोराशिं च दुर्मदम् ॥ ५० ॥

जब वह अन्धकार राजाकी ओरको चला उसी समय विष्णुका चक्र प्रगट हुआ तब वह अन्धकार चक्रसे विद्रावित होकर उन दोनोंके प्रति धावमान हुआ ॥ ४९ ॥ तब सब अंगसे व्याकुल हो वे महामुनि धावमान हुए, पीछे चक्र और उस तमोराशिको देखकर ॥ ५० ॥


* तमअज्ञेतिच्छेदः ।