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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११)

इस प्रकार उनके वर्तमान होनेमें कमललोचनी कन्या लक्षणोंसे शोभित श्रीमतीनाम उत्पन्न हुई ॥ १ ॥ उसी समय नारदजी उसके घर आये और पर्वतऋषि भी आये ॥ २ ॥

तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि । अम्बरीषो महातेजाः पूजयामास तौ नृपः ॥ ३ ॥ कन्यां तु प्रेक्ष्य भगवान्नारदः प्राह विस्मितः । केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा ॥ ४ ॥

उन दोनोंको आया देख विधिपूर्वक महातेजस्वी अम्बरीषने उनका पूजन किया ॥ ३ ॥ उस कन्याको देख भगवान् नारद विस्मयको प्राप्त हो बोले—हे राजन् यह महाभागा कन्या किसकी है ? ॥ ४ ॥

ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता । निशम्य वचनं तस्य राजा प्राह कृतांजलिः ॥ ५ ॥ दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः ॥ प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषती शुभा ॥ ६ ॥

यह सर्वलक्षणलक्षित है, यह ऋषिके वचन सुन हाथ जोड राजा बोला ॥ ५ ॥ हे विभो ! यह श्रीमती नाम मेरी कन्या है; अब यह प्रदानसमयको प्राप्त हुई वरकी खोजमें है ॥ ६ ॥

इत्युक्तो मुनि शार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजः । पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे सर्षिसत्तमः ॥ ७ ॥ अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत् । रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम् ॥ ८ ॥

यह कहनेपर नारदजीने उसकी इच्छा की और पर्वत मुनिने भी उसकी इच्छा की ॥ ७ ॥ राजाको अनुज्ञा करके नारदजी बोले अर्थात् उन धर्मात्माने एकान्तमें बुलाकर यह कन्या मुझे दीजिये ॥ ८ ॥

पर्वतोऽपि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुम् । तावुभौ प्राह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः ॥ ९ ॥ उभौ भवंतौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम् । करिष्यामि महाप्राज्ञौ शृणु नारद मे वचः ॥ १० ॥

तब पर्वतने भी एकान्तमें राजासे कहा, तब राजा भयव्याकुल हो दोनोंसे बोले ॥ ९ ॥ तुम दोनों कन्याकी प्रार्थना करते हो तो मैं आपके वचन किस प्रकारसे पूर्ण कर सकता हूँ ? हे नारद ! ॥ १० ॥

(१२) अद्भुतरामायण [तृतीय-

त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो। कन्येयं युवयोरेकं
वरयिष्यति चेच्छुभा।।११।। तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्ति
रस्ति मे ।तथेत्युक्त्वा तु तौ विप्रौ श्व आयास्याव ए हि ॥१२॥
हे पर्वतजी ! आप मेरे वचन श्रवण कीजिये मैं कहता हूँ तुम दोनोंमें यह
कन्या जिसका वरण करे ।। ११ ।। उसीको मैं दे दूंगा अन्यथा देनेकी मुझे
शक्ति नहीं है ! बहुत अच्छा यह कह दोनों ब्राह्मण दूसरे दिन आनेको
कहकर ।। १२ ।।

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतमानसौ । वासुदेवपरौ नित्य-
मुभौ ज्ञानवतां वरौ ।। १३ ।। विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिस-
त्तमः । प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह ।। १४ ।।
प्रसन्नतासे चले गये यह दोनों ज्ञानी नित्य वासुदेवपरायण थे ।। १३ ।।
तब मुनिश्रेष्ठ नारदजी विष्णुलोकमें जाकर नारायणको प्रणाम कर इस
प्रकारके वचन बोले ।। १४ ।।

वृत्तान्तं सर्वमाख्याय नाथ नारायणव्यय । रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि
नमस्ते भुवनेश्वर ।। १५ ।।ततः प्रहस्य गोविंदः सर्वात्मा कर्मठंमु-
निम् । ब्रूहीत्याह स विश्वात्मा मुनिराह च केशवम् ।। १६ ।।
और सब वृत्तान्त कथन करके बोले हे नारायण अविनाशी ! एकान्तमें
आपसे कुछ कहूंगा आपको प्रणाम है ।। १५ ।। तब सर्वात्मा गोविन्द हँसकर
उन कर्म करनेवाले मुनिसे बोले, कहिये तब यह केशव से बोले ।। १६ ।।

त्वदीयो नृपतिः श्रीमानंबरीषो महामतिः । तस्य कन्यां विशालाक्षी
श्रीमती नाम नामतः ।। १७ ।। परिणेतुमहं तां वा इच्छामि वचनं
शृणु । पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः ।। १८ ।।
आपका भक्त एक अम्बरीष राजा है उसकी विशाल लोचनी श्रीमती कन्या
है ।। १७ ।। उससे मैं विवाह करनेकी इच्छा करता हूँ सो आप सुनिये यह
श्रीमान् पर्वत भी आपके बडे भक्त हैं ।। १८ ।।

तामैच्छत्सोऽपि भगवंस्तमाह च जनाधिपः ।। अंबरीषो महातेजाः
कन्येयं युवयोर्वरम् ।। १९ ।। लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददा-
म्यहम् । इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाप्यहं ततः ।। २० ।।