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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५७)

तुम मेरा दर्शन करो मैं तुमको नेत्रप्रदान करता हूँ, यह कह रामने उनके निमित्त दिव्य नेत्र दिये ॥ १७ ॥ तब परशुराम रामचन्द्रके शरीरमें आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुत्समूह ॥ १८ ॥

पितॄन्हुताशनांश्चैव नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ॥ गन्धर्वान्राक्षसान्य-
क्षान्नदीस्तीर्थानि यानि वै ॥ १९ ॥ ऋषीन्वैनिखिलान्यांश्च ब्रह्म-
भूतान्सनातनान् ॥ देवर्षींश्चैव कात्स्न्र्येन समुद्रान्पर्वतांस्तथा ॥ २० ॥

पितृ, अग्नि, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, नदी, तीर्थ ॥ १९ ॥ ऋषि और ब्रह्मभूत, सनातन लोक, सब देवर्षि, समुद्र पर्वत ॥ २० ॥

वेदांश्च सोपनिषदान्वषट्कारान्सहाध्वरैः ॥ ऋचो यजूंषि सामानि
धनुर्वेदांश्च सर्वशः ॥ २१ ॥ विद्युतो मेघवृन्द्वानि वर्षाणि च महा-
व्रत ॥ ततः स भगवान्विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह ॥ २२ ॥

वेद, उपनिषद्, वषट्कार यज्ञ, ऋक्, यजु, साम, सम्पूर्ण धनुर्वेद देखने लगे ॥ २१ ॥ तब विद्युत् मेघवृंद वर्ष चलायमान होगये उस समय विष्णुने उस बाणको छोडा ॥ २२ ॥

शुष्काशानिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च सुव्रतः ॥ पांसुवर्षेण महता
मेघसंघैश्च केवलम् ॥ २३ ॥ भूमिकंपैः सनिर्घातैर्नादैश्च विपुलैरपि ॥
भार्गवं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् ॥ २४ ॥

उस समय सब जगत् उल्का और अशनिसे व्याप्त हो गया और बडी भारी धूरिकी वर्षा और मेघसमूहसे व्याप्त हो गया ॥ २३ ॥ भूमिकम्पादि महाशब्द बडे निर्घातसे परशुरामको विह्वल करके उनका केवल तेजही आकर्षण करके ॥ २४ ॥

अगच्छज्ज्वलितो रामं शरो बाहुप्रचोदितः ॥ स तु विह्वलतां
गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् ॥ २५ ॥ रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणम-
द्विष्णुतेजसम् । विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेंद्रमगमत्पुनः ॥ २६ ॥

रामकी भुजासे छूटा हुआ वह बाण चलायमान हो गया, तब विह्वलतासे परशुरामजीको जब चेतना प्राप्त हुई ॥ २५ ॥ राम फिर प्राण आये हुएको समान विष्णुको प्रणाम करते हुए और विष्णुकी आज्ञासे वे फिर महेन्द्र पर्वतको चले गये ॥ २६ ॥

(५८) अद्भुतरामायण [ नवम-

भीतश्च तत्र न्यवसद्विनीतश्च महा तपाः । ततः संवत्सरेऽतीते
हृतौजसमवस्थितम् ॥ २७ ॥ निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राम-
मब्रुवन् । न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् ॥ २८ ॥

वहाँ भीत और नम्रतापूर्वक निवास करते हुए फिर सम्वत्सरके बीत जानेपर पराक्रमरहित स्थित रहे ॥ २७ ॥ उस समय उनके पितर निर्मद और दुःखी देखकर परशुरामजीसे बोले हे पुत्र ! विष्णुको प्राप्त होकर यह तुमने अच्छा नहीं किया है ॥ २८ ॥

स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा । गच्छ पुत्र नदीं
पुण्यां वधूसरकृतालयाम् ॥ २९ ॥ तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्बपुुरवा-
प्स्यसि । दीप्तोदं नाम तत्तीर्थं यत्र ते प्रपितामहः ॥ ३० ॥

वह सदा त्रिलोकीमें पूज्य और मान्य हैं; अब तुम वधूसर आलयवाली पवित्र नदीमें जाओ ॥ २९ ॥ वहाँ तीर्थोंमें स्नान कर फिर अपने तेजको प्राप्त होगे, वह दीप्तोह नाम तीर्थ है, जहाँ तुम्हारे प्रपितामह ॥ ३० ॥

भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः । तत्तथा कृतवान्रामो
भार्गवो वचनात्पितुः ॥ ३१ ॥ प्राप्तवांश्च पुनस्तेजो भारद्वाज महा-
मुने । एतद्यः शृणुयाद्भत्स रामचरित्रमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

भृगुजीने देवयुगमें तप किया था; यह वचन सुन परशुरामनने वैसाहि किया ॥ ३१ ॥ हे महामुने भारद्वाज ! इस प्रकार परशुरामको फिर तेजकी प्राप्ति हुई हे वत्स ! जो कोई पवित्र रामचन्द्रके चरित्रको सुनता है ॥ ३२ ॥

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति । ततो रामो जानकी-
स्पृष्टपाणिः सूतैर्भक्त्या मागधैः स्तूयमानः । पुष्पसारैरास्तृतो देव-
संघैः स उत्तरान्कोसलानाजगाम ॥ ३३ ॥

इत्यार्षे श्री. वाल्मीकीये आ. जामदग्न्याय विश्वरूपदर्शनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

वह सब पापसे छूटकर विष्णुके लोकको जाता है, तब रामचन्द्र जानकीका हाथ स्पर्श कर सूतमागधजनोंसे स्तुतिको हो देवताओंसे फूलोंकी वर्षासे आच्छादित हो उत्तर कोशल देशमें आये ॥ ३३ ॥

इति श्रीरा. अद्भु. भाषाटीकायां जामदग्न्यविश्वरूपदर्शनं नाम नवमःसर्गः ॥ ९ ॥