अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)
चतुर्विंशति सर्ग
देवतोंका रामको आश्वासन करना
संरंभवेगं सीताया वीक्ष्य ब्रह्मपुरो गमाः ॥ सलोकपालास्त्रिदशा ऋषिभिः पितृभिः सह ॥ १ ॥
प्रसादयितुमुद्युक्ताः सीतां ते तुष्टुवुः सुराः ॥ कृताञ्जलिपुटा देवाः प्रणम्य च पुनः पुनः ॥ २ ॥
तब सीताका इस प्रकार वेग और क्रोध देखकर लोकपाल देवता और पितर तथा ब्रह्माजी ॥ १ ॥ वे सीताके प्रसन्न करनेको युक्त हो उन्हें सन्तुष्ट करने लगे, देवता हाथ जोड वारवार प्रणाम कर ॥ २ ॥
ब्रह्माद्याः स्तोतुमारब्धाः सीतां राक्षसनाशिनीम् ॥ या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपायिलालसा ॥ ३ ॥
अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता रामवल्लभा ॥ स्वाभाविकी च त्वन्मूला प्रभा भानोस्तथामला ॥ ४ ॥
राक्षसनाशिनी जानकीकी ब्रह्मादिदेवता स्तुति करने लगे, जो यह माहेश्वरी शक्ति ज्ञानरूपा अतिलालसायुक्त है ॥ ३ ॥ यह रामवल्लभा अनन्य और निष्फल तत्त्वमें स्थित है. वह स्वाभाविकी शक्ति आपहीसे होती है, जैसे सूर्यकी कांति निर्मल होती है ॥ ४ ॥
एका सा वैष्णवी शक्ति रणे कोपाधिवेगतः ॥ परापरेण रूपेण क्रीडन्ती रामसन्निधौ ॥ ५ ॥
सेव्यं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत् ॥ न कार्यं चापि करणमीश्वरस्येति निश्चयः ॥ ६ ॥
वह एकही वैष्णवी शक्ति रणमें बडे वेगसे और क्रोधसे परापररूप किये रामके निकट क्रीडा करती है ॥ ५ ॥ यही सब जगत् करके अपना कार्य करके विहरती है कि, ईश्वरको कार्य करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥
चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः ॥ अधिष्ठान वशादस्या जानक्या रामयोषितः ॥ ७ ॥
शांतिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः ॥ चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः ॥ ८ ॥
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( १३० ) \qquad अद्भुतरामायण \qquad [ चतुर्विंशति
देवीकी चार शक्ति स्वरूपसे स्थित हैं अधिष्ठानके वशसे जानकी रामकी स्त्री हैं ॥ ७ ॥ शांति विद्या प्रतिष्ठा और निवृत्ति यह परमेश्वर देव चतुर्व्यूह रूपसे कहा जाता है ॥ ८ ॥
अनया परया देवः स्वात्मानंदं समश्नुते ॥ यत्त्वस्त्यनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत् ॥ ९ ॥ त्वत्संबन्धादवाप्तं तद्रामेण परमात्मना ॥ सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका ॥ १० ॥
इसी पराशक्तिसे देवका स्वात्मानन्द जाना जाता है, जो अनादिसंसिद्ध अतुल महत् ऐश्वर्य है ॥ ९ ॥ वही परमात्मा रामद्वारा तुम्हारे सम्बन्धसे प्राप्त किया जाता है, यह सर्वेश्वरी देवी सब भूतोंकी प्रवर्त्त करनेवाली है १०
त्वयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः ॥ सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी ॥ ११ ॥ वैश्वरूपं महेशस्य सर्वदा संप्रकाशयेत् ॥ अन्याश्च शक्तयो मुख्यास्त्वया देवि विनिर्मिता ॥ १२ ॥
तुमसेही यह मायावी पुरुषोत्तम भ्रमण कराये जाते हैं यह मायात्मिका शक्ति सर्वाकारा सनातनी है ॥ ११ ॥ यह महेश्वरका विश्वरूप सदा प्रकाशित करती है. हे देवि ! और भी मुख्य शक्ति तुमनेही निर्माण की है ॥ १२ ॥
ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः प्राणशक्तिरिति त्रयम् ॥ सर्वासामेव शक्तीनां शक्तिमन्तो विनिर्मिता ॥ १३ ॥ एका शक्तिः शिवोप्येकः शक्तिमानुच्यते शिवः ॥ अभेदं चानुपश्यंति योगिनस्तत्त्वदर्शिनः १४
ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, प्राणशक्ति यह सम्पूर्णशक्ति और उनके शक्तिमान् निर्माण किये हैं ॥ १३ ॥ वास्तविक एकही शक्ति और एकही शक्तिमान शिव हैं, तत्त्वदर्शी योगी इनमें भेद नहीं मानते हैं ॥ १४ ॥
शक्तयो जानकी देवी शक्तिमन्तो हि राघवः ॥ विशेषः कथ्यते चायं पुराणे तत्त्ववादिभिः ॥ १५ ॥ भोग्या विश्वेश्वरी देवी रघूत्तमपतिव्रता ॥ प्रोच्यते भगवान्भोक्ता रघुवंशविवर्द्धनः ॥ १६ ॥
संपूर्ण शक्तियोंका स्वरूप जानकी देवी, शक्तिमान् राम हैं. तत्त्ववादियोंने पुराणोंमें यह विशेषतासे कहा है ॥ १५ ॥ रघुराजकी पतिव्रता देवी योग्या है, और रघुवंशविवर्द्धन भगवान् भोक्ता कहलाते हैं ॥ १६ ॥
मंता रामो मतिः सीता मन्तव्या च विचारतः ॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थ मचलं ध्रुवम् ॥ १७ ॥ योगिनस्तत्प्रपश्यंति तव देव्याः परं पदम् ॥ अनंतमजरं ब्रह्म केवलं निष्कलं परम् ॥ १८ ॥