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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०६)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०६)

ऐसा कहकर बाणसमूह चक्र पर्वत तोमर वह राक्षस पुष्पकके ऊपर छोडने लगा ॥ ७ ॥ और वह घोर राक्षसी सेना वानर ऋक्ष मनुष्योंको खाती दूसरोंको नष्ट करने लगी ॥ ८ ॥

सा च शाखामृगी सेना राघवस्य च मानुषी । रावणस्यानुगान्धी-
राञ्जघान बाणपर्वतैः ॥ ९ ॥ तेऽन्योन्यवधमिच्छंतो युयुधुः सैनिको-
त्तमाः ॥ पेतुर्मम्लुश्च मुमुहू राक्षसा वानरा नराः ॥ १० ॥

और वह रामचन्द्रकी मानुषी और वानरी सेना रावणके अनुचर वीरोंको बाण और पर्वतोंसे नष्ट करने लगी ॥ ९ ॥ वह सेनाके लोग परस्पर एक दूसरेके वधकी इच्छासे युद्ध करने लगे और वह राक्षस वानर गिरने और बारम्बार मलिन होने लगे ॥ १० ॥

ततो रामो महाबाहुर्भरतो लक्ष्मणस्तथा ॥ शत्रुघ्नो हनुमान्वीरः
सुग्रीवो जांबवांस्तथा ॥ ११ ॥ अन्ये च नलनीलाद्या विभीषणपुरो-
गमाः ॥ युयुधुस्ते महाघोरं महाघोरे रणाजिरे ॥ १२ ॥

तब महाबाहु राम भरत और लक्ष्मण शत्रुघ्न हनुमान वीर सुग्रीव जाम्ब-
वन्त ॥ ११ ॥ और भी नल नील विभीषणादि महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥

निर्जग्मुश्च विनेदुश्च चिक्रीडुश्चैव राक्षसाः ॥ जहृषुश्च महा-
त्मानः संग्रामेष्वनिवर्तिनः ॥ १३ ॥ उत्कृष्टा स्फोटितैर्नादैश्चचालेव
च मेदिनी ॥ रक्षसां सिंहनादैश्च परिपूर्णं नभः स्थलम् ॥ १४ ॥

वे निकलकर शब्द करने लगे और क्रीडा करने लगे और संग्रामसे न लौटने-
वाले महात्मा प्रसन्न होते हुए ॥ १३ ॥ उनके उत्कृष्ट स्फोट और नादसे पृथ्वी
चलायमान होने लगी, राक्षसोंके सिंहनादसे आकाशस्थल पूर्ण होगया । १४ ॥

ते प्रायुध्यंत मुदिता राक्षसेंद्रा महाबलाः ॥ प्रययुर्वानरानीकं
समुद्यतशिलायुधम् ॥ १५ ॥ युयोध राक्षसं सैन्यं नरराक्षसवानरैः ।
रहस्त्यश्वरथसंबाधं किंकिणीशतनादितम् ॥ १६ ॥

वे महाबली राक्षस प्रसन्न हो युद्ध करने लगे और शिला हाथमें लिये वानरी
सेनाके प्रति ॥ १५ ॥ नर राक्षस वानरोंसे राक्षसी सेना युद्ध करने लगी, हाथी
घोडे रथकी संबाधा और सैकड़ों किंकिणियोंका शब्द होने लगा ॥ १६ ॥

(११०) अद्भुतरामायण [विशंति-

नीलजीमूतसंकाशैः समुद्यतशिलायुधैः ।। दीप्तानलरवि-
प्रख्यैर्नेत्रैस्तैः सर्वतो वृतम् ।। १७ ।। तद्वीक्ष्य राक्षसबलं संरब्धाश्च
प्लवंगमाः ।। क्रुद्धं तद्राक्षसं सैन्यं जघ्नुर्द्रुमशिलायुधैः ।। १८ ।।
नीलमेघके समान शिला आयुध उठाये दीप्त अग्नि और सूर्यके समान सब दिशा राक्षसोंसे भर गई ।। १७ ।। उस राक्षसी सेनाको देखकर संरम्भको प्राप्त होकर क्रोध कर उस राक्षसी सेनाको द्रुम शिला आयुधोंसे मारने लगे ।। १८ ।।

ते पादशिलाशैलेस्तां चक्रुर्वृष्टिमुत्तमाम् ।। वृक्षौघैर्वज्रसंका-
शैर्हरयो भीमविक्रमाः ।। १९ ।। शिखरैः शिखराभांस्ते यातुधानानमर्द
यन् ।। निर्जघ्नुःसमरे क्रुद्धा हरयो राक्षसर्वभान् ।। २० ।।
वे वृक्ष शिला शैलोंकी वर्षा करने लगे और भयंकर पराक्रमी वानर वृक्षोंसे युद्ध करने लगे ।। १९ ।। और शिखरोंसे शिखरोंके समान राक्षसोंको ताडन करने लगे, इसप्रकार क्रोध कर दैत्योंको तांडन करने लगे ।। २० ।।

केचिद्रथगतान्वीरान्गजवाजिस्थितौनपि ।। निर्जघ्नुः सहसाप्लुत्य
यातुधानानप्लवंगमाः ।। २१ ।। शैलशृंगनिभास्ते तु ✤ मुष्टिनिष्क्रांत
लोचनाः ।। ✤वेपु पेतुश्च नेदुश्च ततो राक्षसपुंगवाः ।। २२ ।।
कोई रथमें प्राप्त वीर हाथी घोडोंपर स्थित थे उन राक्षसोंको कूद कूद कर वानर मारने लगे ।। २१ ।। ये पर्वतके श्रृंगके समान अपने घूसोंसेही उनके नेत्र निकाल डालते थे, तब वे राक्षस कंपित होकर गिर पडते थे ।। २२ ।।

ततः शूलैश्च वज्रैश्च विमुष्टैर्हरिपुंगवैः ।। मुहूर्तेनावृता भूमि-
रभवच्छोणितप्लुता ।। २३ ।। विकीर्णैः पर्वताग्रैश्च रक्षोभिरुपम-
र्द्दितैः ।। आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशेषाश्च वानराः ।। २४ ।।
फिर शूल वज्र और मुष्टियोंसे वानरों द्वारा व भूमि रुधिरसे व्याप्त होगई ।। २३ ।। पर्वताग्रोंसे विकीर्ण हुई राक्षसोंसे मर्दित हुई आक्षिप्त और क्षिप्यमान होकर सब वानर भग्न हो गये ।। २४ ।।

रथेन रथिनं चापि राक्षसं राक्षसेन च ।। हयेन च हयं केचित्पि-
पेषुर्धरणी तले ।। २५ ।। वानरान्वानरैरेव जघ्नुर्घोरा हि राक्षसाः ।।
राक्षसान्राक्षसैरेव पिपिषुर्वानरा युधि ।। २६ ।।


* मुष्टिप्रहारेण निष्क्रांतलोचनाः । * आर्षम् ।