अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५३)
मंदोदरीने पतिकी वंचनासे उसको पान कर लिया वह लक्ष्मीके आश्रयवाले दूधसे मिला हुआ रुधिर था ॥ २९ ॥ उसके पान करतेही मन्दोदरीको अग्निके समान प्रकाशमान गर्भ स्थित होगया, वह देख मन्दोदरी बडी विस्मित हुई ॥ ३० ॥
पीतं विषाधिकं रक्तंगर्भस्तेनाभवन्मम । इति संचिंतयामास भर्ता विप्रोषितो मम ॥ ३१ ॥ कामिनीभिः क्रीडतं स कामो भर्ता हि रावणः । संवत्सरमिमं भत्रा सह मे वसतिर्नहि ॥ ३२ ॥
विषसेभी अधिक तीक्ष्ण रक्तपान करनेसे किस प्रकार मेरे गर्भ स्थित होगया और स्वामी मेरे निकट नहीं है, इस प्रकार बडी चिन्ता हुई ॥ ३१ ॥ मेरे स्वामी तो कामिनियोंके साथ क्रीडा करते हैं, एकवर्षसे भर्ताके साथ समागम हुआ नहीं है ॥ ३२ ॥
किं वक्तव्यं मया साध्व्या गर्भिण्या भर्तृसंसदि । चितया दग्धगात्रीव तीर्थसेवनछद्मना ॥ ३३ ॥ विमानवरमारुह्य कुरुक्षेत्रं जगाम सा । तत्र गर्भं विनिष्कृष्य निचखान भुवस्तले ॥ ३४ ॥
तब भर्ताके सामने मैं गर्भवती क्या कहूँगी, यह चिंता कर वह तीर्थसेवाके बहानेसे ॥ ३३ ॥ विमानपर चढ़ कुरुक्षेत्रको गई, वहां गर्भपात कर पृथ्वीमें गाडदिया ॥ ३४ ॥
स्नात्वा सरस्वतीतोये पुनरागात्स्वमालयम् । न चोदितं तत्कस्मैचिद्रहः कार्यं सुगोपितम् ॥ ३५ ॥ कालेन कियता ब्रह्मञ्जनकषिर्महामनाः । कुरुक्षेत्रं समासाद्य जांगले *यज्ञमावहन् ॥ ३६ ॥
सरस्वतीजलमें स्नान कर फिर अपने घर चली आई, यह कार्य किसीसे भी नहीं कहा ॥ ३५ ॥ हे ब्रह्मन् कुछ समय उपरान्त महात्मा जनकजीने कुरुक्षेत्रमें आकर कुरुजांगलमें यज्ञ किया ॥ ३६ ॥
स्वर्णलांगलमादाय यज्ञभूमिं चखान सः । स्वर्णलांगलसीतांतः कन्यका प्रोत्थिताभवत् ॥ ३७ ॥ पुष्पवृष्टिश्च महती पपात कन्यकोपरि । तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं राजा विस्मयमा गतः ॥ ३८ ॥
और सोनेका हल लेकर यज्ञभूमि खोदी, उस पृथ्वीके खोदते समय एक कन्या प्रगट हुई ॥ ३७ ॥ उस समय कन्याके ऊपर फूलोंकी वर्षा हुई, यह आश्चर्य देख राजाको बडा विस्मय हुआ ॥ ३८ ॥
* कुर्वन्
(५४) अद्भुतरामायण [अष्टम-
कर्तव्ये मूढतामाप ततः खेऽभूत्सरस्वती । राजन्गृहाण कन्यां त्वं पालयैनां महाप्रभाम् ॥ ३९ ॥ ज्वलनार्कसमां दिव्यां महत्कार्यं तवालये । भविष्यति महाभागा च क्षेमं जगतोऽनया ॥ ४० ॥
और कर्तव्यहीन होगये, तब आकाशसे सरस्वती (वाणी) हुई, हे राजन् ! तुम इसको ग्रहण कर कन्याके समान पालन करो ॥ ३९ ॥ इस अग्निके समान कान्तिमतीका तुम्हारे स्थानमें बडा कार्य होगा हे महाभाग ! इसके द्वारा जगत्का महामंगल होगा ॥ ४० ॥
यज्ञ संपाद्यतां राजन्नायं विघ्नस्तवानघ । नामास्याः किल सीतेति सीताया उत्थिता यतः ॥ ४१ ॥ कल्पयैना दुहितरमित्युक्त्वावाक् तिरोहिता । तच्छ्रुत्वा प्रीतिमान्राजा यज्ञं कृत्वा महाधनम् ॥४२॥
हे राजन् ! अपना यज्ञसंपादन करो यह विघ्न नहीं होगा, सीतासे उठनेसे इनका नाम सीता होगा ॥ ४१ ॥ इसे अपनी कन्या मानो, यह कह वाणि तिरोहित हुई; यह सुन प्रसन्न हो राजाने महाधनयुक्त यज्ञ सम्पादन किया ॥ ४२ ॥
जगाम सीतामादाय महर्षिभ्यश्च तां ददौ ॥ एतत्ते कथितं विप्र सीताजन्मैककारणम् । श्रुत्वैतत्सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ४३
जनकदुहितृजन्म श्रावयित्वा तु श्रुत्वा न पुनरिह जन्म प्राप्नुयात्पुण्यवांश्च । दशरथसुतकांता तस्य गेहं कदाचिद्विसृजति नहि सर्वैः पातकैर्मुच्यते च ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीसीतो-
त्पत्तिर्नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
और सीताको लेकर महर्षियोंको दिया, यह आपसे जानकीके जन्मका कारण कहा, इसके सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ४३ ॥ जानकीके जन्मकी कथा सुननेसे फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता है, प्राणी पुण्यवान् होता है, लक्ष्मी उसके घरसे नहीं जाती, तथा वह सब पापोंसे छूट जाता है ।४४।
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आ. भाषाटीकायां सीतोत्पत्तिर्नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥