अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२७)
सारस्वत वैश्य चित्रमाल शिशु इसी कौशिकके वचनोंको राजासे कहते हुये ॥ १९ ॥ और इसी प्रकार विष्णुभक्त श्रीकर राजासे कहने लगे हे राजन् ! हमारे कर्ण एक नारायणके गुणानुवादही सुनते हैं अन्यके नहीं ॥ २० ॥
मा ते कीर्ति वयं तस्माच्छृणुमो नैव वा स्तुतिम् । तच्छ्रुत्वा पार्थिवो रुष्टो गीयतामिति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥ स्वभृत्यान्ब्राह्मणा ह्येते कीर्ति शृण्वंति वै यथा । न शृण्वंति कथं तस्माद्गीयमानां समंततः ॥ २२ ॥
इस कारण हम आपकी कीर्ति वा स्तुति नहीं सुन सकते हैं यह सुन राजा रुष्ट हुआ और अपने भृत्योंको गानेको कहा ॥ २१ ॥ जैसे यह ब्राह्मण अपनी कीर्ति श्रवण करे यह हमारी कीर्ति क्यों नहीं सुनते ॥ २२ ॥
एवमुक्तास्ततो भृत्या जगुः पार्थिवसत्तमम् । निरुद्धकर्णा विप्रास्ते गाने वृत्ते सुदुःखिताः ॥ २३ ॥ काष्ठशंकुभिरन्योन्यं श्रोत्राणि बिभिदुः किल । कौशिकाद्यास्तु तां ज्ञात्वा मनोवृत्तिं नृपस्य वै ॥ २४ ॥
राजाके सेवक राजाज्ञासे गान करने लगे तब उन ब्राह्मणोंने दुःखी हो अपने कान बंद कर लिये ॥ २३ ॥ इनके कान लोहकीलसे भेदन कर दूं इस प्रकार राजाकी चेष्टा जानकर कौशिकादि ब्राह्मण ॥ २४ ॥
निर्बन्धं कुरुते कस्मात्स्वगानेऽसौ नृपः स्थिरम् । इत्युक्त्वा ते सुनियता जिह्वाग्रं चिच्छिदुः स्वकम् ॥ २५ ॥ ततो राजा सुसंक्रुद्धः स्वदेशात्तान्व्यवासयत् । आदाय वित्तं सर्वेषां ततस्ते जग्मुरुत्तराम् २६
कि, यह राजा क्यों गानेमें हठ करता है अपनी जिह्वा छेदन करते हुए ॥ २५ ॥ तब राजाने क्रोध कर उनको अपने देशसे निकाल दिया और उन सबका धन ले लिया तब वे उत्तरदिशाको चले गये ॥ २६ ॥
दिशामसाद्य कालेन कालधर्मेण योजिताः । तानागतान्यमो दृष्ट्वा किंकर्तव्यमिति स्म ह ॥ २७ ॥ विस्मितस्तत्क्षणे विप्र ब्रह्मा प्राह सुराधिपान् । कौशिकादीन्द्विजानद्य वासुदेवपरायणान् ॥ २८ ॥
और समयपर कालधर्मसे योजित हुए यमने उनको आता देखकर विचार किया कि, हमको अब क्या कर्तव्य है ॥ २७ ॥ उस समय उनको विस्मित देख ब्रह्माजीने देवाधिपतियोंसे कहा जो कि कौशिकादि ब्राह्मण वासुदेवपरायण थे ॥ २८ ॥
(२८) अद्भुतरामायण [पंचम-
गानयोगेन ये नित्यं पूजयंति जनार्दनम् । तानादाय भद्रं वो यदि देवत्वमिच्छथ ॥ २९ ॥ इत्युक्ता लोकपालास्ते कौशिकेति पुनः पुनः । मालतीति तथा केचित्पद्माक्षीति तथापरे ॥ ३० ॥
जो नित्य गानयोगसे जनार्दनकी पूजा करते हैं जो देवत्वकी इच्छा करें तो उनको हमारे पास ले आओ ॥ २९ ॥ ऐसा कहनेपर हे लोकपाल, हे कौशिक, हे मालती, हे पद्माक्षी ! ऐसा बारंबार कहने लगे ॥ ३० ॥
क्रोशमानाः समभ्येत्य तानादाय विहायसा । ब्रह्मलोकं गताः शीघ्रं मुहूर्त्ताद्धेन वै सुराः ॥ ३१ ॥ कौशिकादींस्तथा दृष्ट्वा ब्रह्मा लोक-पितामहः । प्रत्यागम्य यथान्यायं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार उनको सम्बोधन देकर आकाश मार्गसे एक आधे मुहूर्त्तमात्रमें ब्रह्मलोकको लेगये ॥ ३१ ॥ लोकपितामह ब्रह्माजी कौशिकादिको देखकर यथायोग्य आगत स्वागतसे उनकी पूजा करते हुए ॥ ३२ ॥
ततः कोलाहलश्चाभूदतिगौरवमुल्बणम् । ब्रह्मणा च कृतं दृष्ट्वा देवानां द्विजसत्तम ॥ ३३ ॥ हिरण्यगर्भो भगवांस्तान्निवार्य सुरोत्त-मान् । कौशिकादींस्तदादाय मुनिर्देवैः समावृतः ॥ ३४ ॥
तथा बड़ा भारी कोलाहल होने लगा, ब्रह्माजीका किया सत्कार देख कर ॥ ३३ ॥ हिरण्यगर्भ भगवान् सर्व देवताओंको निवारण कर कौशिकादिको लेकर मुनि देवताओंके साथ ॥ ३४ ॥
विष्णुलोकं ययौ शीघ्रं वासुदेव परायणः । तत्र नारायणो देवः श्वेतद्वीपनिवासिभिः ॥ ३५ ॥ ज्ञानयोगेश्वरैः सिद्धैर्विष्णुभक्तिपरा-यणैः । नारायणसमैर्दिव्यै श्चतुर्बाहुधरैः शुभैः ॥ ३६ ॥
वह वासुदेव परायण शीघ्र विष्णुलोकको चले गये । वहाँ नारायणदेव श्वेतद्वीपनिवासियोंके साथ ॥ ३५ ॥ ज्ञानयोगेश्वर सिद्ध और विष्णुभक्ति-परायण तथा नारायणके समान नित्य दिव्य चार भुजा धारण किये ॥ ३६ ॥
विष्णुचित्तसमापन्नैर्दीप्यमानैरकल्मषैः । अष्टाशीतिसहस्रैस्तु सेव्यमानो मनोजवैः ॥ ३७ ॥ अस्माभिर्नारदाद्यैश्च सनकाद्यैरक-ल्मषैः ॥ भूतैर्नानाविधैश्चैव दिव्यस्त्रीभिः समंततः ॥ ३८ ॥