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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 173 में से

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पृष्ठ 15

(८) . अद्भुतरामायण [ द्वितीय-

नाहं त्वामभिसंधाय तप आस्थितवानिह । त्वया दत्तं च नेच्छामि
गच्छ शक्र यथासुखम् ॥ २७ ॥ मम नारायणो नाथस्त्वां न तोष्येऽ-
मराधिप । व्रजेन्द्र मा वृथास्त्वत्र ममाश्रमविलोपनम् ॥ २८ ॥

कि, मैंने आपके उद्देशसे तप नहीं किया है । आपकी दीहुई वस्तुकी मुझे
इच्छा नहीं, आप यथेच्छ गमन करिये ॥ २७ ॥ हे इन्द्र ! मेरे स्वामी नारायण
हैं मैं आपसे कुछ नहीं चाहता, आप पधारिये इस आश्रममें वृथा कालका
व्यय न कीजिये ॥ २८ ॥

ततः प्रहस्य भगवान्स्वरूपमकरोद्धरिः । शार्ङ्गचक्रगदापाणिः
शंखहस्तो जनार्दनः ॥ २९ ॥ गरुडोपरि विश्वात्मा नीलाचल इवा-
परः । देवगन्धर्वसंघैश्च स्तूयमानः समंततः ॥ ३० ॥

तब नारायणने हँसकर अपना स्वरूप प्रगट किया । शार्ङ्ग, चक्र, गदा और
शंख, हाथमें लिये ॥ २९ ॥ जनार्दन विश्वात्मा गरुडपर दूसरे नीलाचलके
समान देव और गन्धर्वोके समूहोंसे सब और स्तुतिको प्राप्त हुए भगवान्को
देख ॥ ३० ॥

प्रणम्य राजा संतुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम् । प्रसीद लोकनाथस्त्वं
मम नाथ जनार्दन ॥ ३१ ॥ कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ सर्वलोकनमस्कृत ।
त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः ॥ ३२ ॥

राजा प्रणाम कर गरुडध्वजको सन्तुष्ट करने लगा, मेरे नाथ ! जनार्दन,
लोकनाथ ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हूजिये ॥ ३१ ॥ हे कृष्ण, हे कृष्ण !
हे जगन्नाथ हे सर्वलोकसे नमस्कृत, आदि अनादि, अनंत, प्रभु हो ॥ ३२ ॥

अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः । महेश्वरांशजो मध्यः
पुष्करः खगगः खगः ॥ ३३ ॥ कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः
प्रभंजनः । आदिदेवः क्रियानंदः परमात्मनि संस्थितः ॥ ३४ ॥

अप्रमेय विभु विष्णु गोविन्द कमलोचन महेश्वर अंशोत्पन्न मध्यपुष्कर
और अनन्त पुरुष प्रभु हो ॥ ३३ ॥ आप कव्यवाह, कपाली हव्यवाह प्रभंजन
हो, आप आदिदेव, क्रियानन्द परमात्मामें स्थित हो ॥ ३४ ॥

त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविंद पाहि मां पुष्करेक्षण । नान्या गति-
स्त्वदन्या मे त्वामेव शरणं गतः ॥ ३५ ॥ तमाह भगवान्विष्णुः किं
ते हृदि चिकीर्षितम् । तत्सर्वं संप्रदास्यामि भक्तोऽसि मम सुव्रत ॥ ३६ ॥