अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९)
हे गोविन्द मैं आपकी शरण हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये, आपके सिवाय मेरी अन्यगति नहीं है मैं आपकी शरण हूँ ॥ ३५ ॥ तब भगवान् विष्णुने कहा तुम्हारी क्या इच्छा है ? वह मैं सब तुम्हें दूंगा कारण कि, तुम मेरे भक्त हो ॥ ३६ ॥
भक्तप्रियोऽस्मि सततं तस्माद्दातुमिहागतः । अंबरीषस्तु तच्छ्रुत्वा हर्षगद्गदयागिरा ॥ ३७॥ प्रोवाच परमात्मानं नारायणमनामयम् । त्वयि विष्णौ परानंदे नित्यं मे वर्त्ततां मतिः ॥ ३८ ॥
मैं निरन्तर भक्तप्रिय हूँ इस कारण तुमको यथेच्छ फल देनेको आया हूँ, तुम मेरे भवत हो, यह वचन सुन अम्बरीष हर्षसे गद्गद हो ॥ ३७ ॥ परमात्मा अनामय नारायणसे कहने लगे हे विष्णो ! आपमें निरन्तर मेरी भक्ति हो । ३८ ।
भवेयं त्वत्परो नित्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः । पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत् ॥ ३९ ॥ यज्ञहोमार्चनैश्चैव तर्पिष्यामि सुरोत्तमान् । वैष्णवान्पालयिष्यामि हनिष्यामि च शात्रवान् ॥ ४० ॥
मन वचन कर्मसे नित्य मैं आपकी सेवा करके पृथिवीको विष्णुभक्त करदूंगा ॥ ३९ ॥ यज्ञ होम अर्चनसे देवताओंको तृप्त कर वैष्णवोंको पालकर असुरोंको नष्ट करूंगा ॥ ४० ॥
एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाच नृपोत्तमम् । एवमस्तु तवेच्छा वै चक्रमेतत्सुदर्शनम् ॥४१॥ पुरारुद्रप्रभावेण लब्धं वै दुर्लभं मया । ऋषिशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा ॥ ४२ ॥
यह सुनकर भगवान्ने राजासे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है वह होगा और यह सुदर्शन चक्र ॥ ४१ ॥ जो प्रथम हमने रुद्रके प्रभावसे प्राप्त किया है यह ऋषिके शाप, दुःख, शत्रु, रोगादि ॥ ४२ ॥
निहनिष्यति ते दुःखमित्युक्त्वांतरधीयत । ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम् ॥ ४३ ॥ प्रविश्य नगरीं दिव्यामयोध्यां पर्यपालयत् । ब्राह्मणादींस्तथा वर्णान्स्वेस्वे कर्मण्ययोजयत् ॥ ४४ ॥
आपके दुःख दूर करेगा ऐसा कहकर अन्तर्धान होगये, तब प्रसन्न हो राजा नारायण प्रभुको प्रणाम कर ॥ ४३ ॥ दिव्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके उसकी पालना करने लगा ब्राह्मणादि वर्णोंको भी अपने २ कर्ममें लगाता हुआ ॥ ४४ ॥
(१०) अद्भुतरामायण [तृतीय-
नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान् । पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः ॥ ४५ ॥ अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतैानि च । पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम् ॥ ४६ ॥
नित्य नारायणमें तत्पर विष्णुभक्तोंको विशेष कर पालन करता हुआ ॥४५॥ सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ करके सागरपर्यन्त पृथ्वीका पालन करता हुआ ॥ ४६ ॥
गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे । नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च ॥ ४७ ॥ अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन्त्राज्यं प्रशासति ॥ नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता ॥ ४८ ॥
उस समय घर घर नारायण और वेदका उच्चारण होता था, नारायणका नाम और यज्ञका शब्द घर घर होता था ॥ ४७ ॥ उसके राज्यमें इस प्रकारसे कार्य होते थे, उसके राज्यमें भूमि तृण अन्नसे युक्त थी, दुर्भिक्षादि नहीं था ॥ ४८ ॥
रोगहीना प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिता । अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४९ ॥ स वै महात्मा सततं च रक्षितः सुदर्शनेनातिसुदर्शनेन । शुभां समुद्रावधि संततां महीं सुपालयामास महीमहेन्द्रः ॥ ५० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेऽद्भुतोत्तरकांडे अम्बरीषवरप्रदानं
नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
नित्य प्रजा रोगहीन और सब उपद्रवोंसे रहित थी, इस प्रकार महाराज अम्बरीष पृथिवीका पालन करते थे ॥ ४९ ॥ इस प्रकार वह महात्मा सुदर्शनचक्रसे रक्षित हो कर सागरपर्यन्त इस पृथिवीको पालन करता हुआ ॥५०॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां अम्बरीषवरप्रदानं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीय सर्ग
नारदपर्वतका राजसभामें आना
तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना । श्रीमतीनामविख्याता सर्वलक्षणशोभिता ॥ १ ॥ तस्मिन्काले मुनिःश्रीमान्नारदोऽभ्यागतो गृहम् । अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महाद्युतिः ॥ २ ॥