अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (७१)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (७१)
त्रयोदश सर्ग
रामका भक्तियोग कहना
वक्ष्ये समाहितमनाश्शृणुष्व पवनात्मज ॥ येनेदं लभ्यते रूपं येनेदं संप्रवर्तते ॥ १ ॥ नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन च चेज्यया ॥ शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम् ॥ २ ॥
हे महावीर ! जो मैं कहता हूँ सो सावधान मन होकर सुनो जिससे यह सब रूप प्राप्त होकर प्रवृत्त होता है ॥ १ ॥ न मैं अनेक प्रकारके तप न दान न यज्ञसे पुरुषोंके द्वारा जाना जाता हूं केवल जो मेरी भक्ति करते हैं वही मुझको प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
अहं हि सर्वभावानांमंतस्तिष्ठासि सर्वगः ॥ मां सर्वसाक्षिणं लोका न जानंति प्लवंगम ॥ ३ ॥ यस्मांतरा सर्वमिदं यो हि सर्वांतर परः ॥ सोऽहं धाता विधाता च लोकेऽस्मिन्विश्वतोमुखः ॥ ४ ॥
मैं सर्वगामी सब भावोंके अन्तमें स्थित रहता हूँ हे वीर सर्वसाक्षी मुझको लोक जाननेमें समर्थ नहीं होते ॥ ३ ॥ जिसके अन्तरमें यह सब हैं और जो सर्वांतर्यामी परेसे परे हैं वह मैं धाता विधाता इस लोकमें सब स्थित हो रहा हूँ ॥ ४ ॥
न मां पश्यंति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः ॥ ब्राह्मणा मनवः शक्रा ये चान्ये प्रथितौजसः ॥ ५ ॥ गृणंति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम् । जयन्ति विविधैरंगिन ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः ॥ ६ ॥
सब देवता और मुनि मुझे देखनेसे समर्थ नहीं होते हैं ब्राह्मण मनु इन्द्र तथा और देवता हैं ॥ ५ ॥ सब वेद मुझही एक परमेश्वरका निरन्तर यजन करते हैं, और कहते हैं ब्राह्मण अनेक यज्ञोंसे मेरा यजन करते हैं ॥ ६ ॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मलोके पिता महम् । ध्यायंति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम् ॥७॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रद ॥ सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्व संस्तुतः ॥ ८ ॥
सब लोक ब्रह्मलोकमें पितामहको नमस्कार करते हैं योगी भूताधिपति ईश्वरको नित्य ध्यान करते हैं ॥ ७ ॥ मैं सब यज्ञोंका भोक्ता और फलका
(७२) अद्भुतरामायण [ त्रयोदश-
देनेवाला हूँ सब देवका शरीर होकर सर्व आत्मा सबसे स्तुतिको प्राप्त होता हूँ ॥ ८ ॥
मां पश्यंतीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः । तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते ॥९॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते । तेषां ददामि तत्स्थानमानंदं परमं पदम् ॥ १० ॥
धर्मात्मा वेदवादी विद्वान् मुझको देखते हैं, जो भक्त मेरी उपासना करते हैं मैं सदा उनके निकट निवास करता हूँ ॥ ९ ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य धर्मात्मा मेरी उपासन-करते हैं, उनको मैं आनंदमय परम पदका स्थान देता हूँ ॥ १० ॥
अन्येऽपि ये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीच जातयः । भक्तिमंतः प्रमुच्यंते कालेन मयि संगताः ॥ ११ ॥ न मद्भक्ता विनश्यंते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ॥ आदावेतत्प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ १२ ॥
और भी जो शूद्रादि नीच जाति विकर्ममें स्थित हैं वे भक्ति करनेके समय मेरे निकट प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥ मेरे भक्त पाप रहित हो जाते हैं, उनका नाश नहीं होता यह पहलेहीसे मेरी प्रतिज्ञा है कि, मेरे भक्त नाश नहीं होते ॥ १२ ॥
यो वा निंदति तं मूढो देवदेवं स निंदति ॥ यो हि तं पूजयेद्भक्त्या स पूजयति मां सदा ॥ १३ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकार- णात् ॥ यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः ॥ १४ ॥
जो मूढ मेरे भक्तकी निन्दा करता है वह देवदेवकी निन्दा करता है और जो उनको भक्तिसे पूजन करता है वह मेरा पूजन करता है ॥ १३ ॥ जो मेरे पूजनको पत्र पुष्प फल जल प्रदान करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्रिय है ॥ १४ ॥
निधाय दत्तवान्वेदानशेषान्नास्य निःसृतान् ॥ १५ ॥ अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः ॥ धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेद विद्विषाम् ॥ १६ ॥
में जगत्के आदिमें ब्रह्मा परमेष्ठीका निर्माण कर सम्पूर्ण वेदोंको प्रदान करता हुआ, जो मेरे मुखसे निकले हैं ॥ १५ ॥ मैं ही सम्पूर्ण योगियोंका अविनाशी गुरु हूँ धर्मात्माओंका रक्षक और वेदद्वेषियोंका नाशक हूँ ॥ १६ ॥