अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२५)
हे भरद्वाज ! अब सीताके जन्मका कारण सुनो, त्रेतायुगमें एक कौशिक नाम ब्राह्मण था ॥ १ ॥ वह सदा वासुदेवपरायण नामगानमें रत भोजन अशन शय्यामें सदा हरिमें मन लगाये रहता था और विष्णुके उदार चरित्रोंका वारंवार गान करता था ॥ २ ॥
विष्णुस्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम् । अगायत हरिं तत्र तालवलगुल्यान्वितम् ॥ ३ ॥ मूर्च्छनामूर्च्छायोगेन श्रुतिमंडलवेदि- तम् । भक्तियोगसमापन्नो भिक्षामश्नाति तत्र वै ॥ ४ ॥
विष्णुके स्थल नारायणके क्षेत्रको प्राप्त होकर मनोहर ताल लयादिसे नारायणके चरित्र गाता ॥ ३॥ मूर्छना मूर्छाके योगसे श्रुति मंडलसे वेदित भक्तियोगको प्राप्त हो भिक्षाका भोजन करता था ॥ ४ ॥
तत्रैनं गायमानं च दृष्ट्वा कश्चिद्द्विजस्तदा । पद्माक्ष इत विख्यात- स्तस्मै चान्नं ददौ सदा ॥ ५ ॥ सकुतुंबो महातेज अश्नन्नन्नं च तस्य वै । कौशिको तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरिं प्रभुम् ॥ ६ ॥
कोई ब्राह्मण इस प्रकारसे इसको गाता देखकर उसको बहुतसा अन्न देता हुआ, इसका नाम पद्माक्ष था ॥ ५ ॥ वह महातेजस्वी कुटुंबसहित उसका अन्न खाता हुआ प्रसन्नतासे गान करता था ॥ ६ ॥
शृण्वन्नास्ते स पद्माक्षः काले काले च भक्तितः । कालयोगेन संप्राप्ताः शिष्या वै कौशिकस्य च ॥७॥ सप्तराजन्यवैश्यानां विप्राणां कुलसं- भवाः । ज्ञानविद्याधिका शुद्धा वासुदेवपरायणाः ॥ ८ ॥
और वह पद्माक्ष समय समय भक्तिपूर्वक उसको श्रवण करता था कुछ समयके उपरान्त वह कौशिकका शिष्य होगया ॥ ७ ॥ सात क्षत्रिय वैश्य और ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न हुए ज्ञानविद्यामें अधिक शुद्ध वासुदेवपरायण हुए ॥ ८ ।
तेषा मपि तथान्नाद्यं पद्माक्षः प्रददौ स्वयम् । शिष्यैश्च सहितो नित्यं कौशिको हृष्टमानसः ॥९॥ विष्णुस्थले हरिं तत्र आस्ते गाय- न्यथाविधि । तत्रैव मालवो नाम वैद्यो विष्णुपरायणः ॥ १० ॥
पद्माक्ष उनके निमित्त भी अन्नप्रदान करता था शिष्यों सहित कौशिक नित्य प्रसन्न रहता ॥ ९ ॥ और विष्णुके मंदिरमें नित्य नारायणका विधिपूर्वक गान करता वहाँ एक मालव नाम वैद्य विष्णु भक्तिपरायण था ॥ १० ॥
(२६) अद्भुतरामायण [ पञ्चम-
दीपमालां हरेर्नित्यं करोति प्रीतमानसः। मालतीनाम भार्यासीत्तस्य नित्यं पतिव्रता ॥ ११ ॥ गोमयेन समालिप्य हरेः क्षेत्रं समंततः । भर्त्रा सहास्ते संप्रीता शृण्वती गानमुत्तमम् ॥ १२ ॥
सदैवकाल प्रीतमनसे नारायणके मंदिरमें दीपक बालता, उसकी नित्य पतिव्रता मालतीनाम भार्या थी ॥ ११ ॥ वह हरिक्षेत्रको सब ओर गोबरसे लीपकर भर्ताके सात गान सुनती प्रसन्न मन रहती थी ॥ १२ ॥
कुशस्थलीसमुत्पन्ना ब्राह्मणाः शंसितव्रताः । पंचाशद्वै समापन्ना हरेर्गानार्थमुत्तमाः ॥ १३ ॥ साधयंतो हि कार्याणि कौशिकस्य महात्मनः । गानविद्यार्थतत्त्वज्ञाः शृण्वंतो ह्यवसंस्तु ते ॥ १४ ॥
कुछ कुशस्थलीके उत्पन्न हुए शोभनव्रतवाले पचास ब्राह्मण नारायणका गान करने आये ॥ १३ ॥ वे महात्मा कौशिकका कार्य साधन करने वाले थे गानविद्याको वे तत्त्व ज्ञानी सुनते हुए वहां स्थित हुए ॥ १४ ॥
ख्यातमासीत्तदा तस्य गानं वै कौशिकस्य च । श्रुत्वा राजा समभ्येत्य कालिंगो वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥ कौशिकाद्यगणैः सार्धं गायस्वेह च मां पुनः । शृणुध्वं च तथा यूयं कुशस्थलजना अपि ॥ १६ ॥
इस प्रकार उस कौशिकका गान लोकमें विख्यात होगया राजसभामें कलिंगराज यह वचन सुनकर कहने लगा ॥ १५ ॥ कि, कौशिक अपने गणोंके सहित हमारा गान करे और तुम कुशस्थलीवासी सब ब्राह्मण उसको श्रवण करो ॥ १६ ॥
तच्छ्रुत्वा कौशिकः प्राह राजानं सां त्वयन्गिरा । न जिह्वाग्रे महाराज वाणी च मम सर्वदा ॥ १७ ॥ हरेरन्यमपींद्रं वा स्तौति नापि न वक्ति च । एवमुक्ते च तच्छिष्या वसिष्ठो गौतमोऽरुणः ॥ १८ ॥
तब कौशिक वाणीसे राजाको सान्त्वन करता हुआ बोला-हे महाराज ! मेरी जिह्वाके आगे वाणी स्फुरायमान नहीं होती है ॥ १७ ॥ और तो क्या नारायणको छोड इन्द्रकी स्तुतिमें भी मेरी वाणी चलायमान नहीं होती यह कहनेपर उनके शिष्य गौतम अरुण ॥ १८ ॥
सारस्वतस्तथा वैश्यश्चित्रमालस्तथा शिशुः । ऊचुस्तं पार्थिवं तत्त्वं यथा प्राह स कौशिकः ॥ १९ ॥ श्रीकराश्च तथा प्रोचुः पार्थिवं विष्णुतत्पराः । श्रोत्राणीमानि शृण्वंतिहरेरन्यं न पार्थिवम् २०