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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९५)

मट्टीके ढेलेके समान मानता है और वीरोंको तो कुछ गिनताही नहीं है जब उसने सब लोकोंको त्रास देना आरंभ किया ॥ ६४ ॥

तदा पितामहोऽभ्येत्य पुलस्त्यो विश्रवास्तथा ॥ न्यवारयन्यत्न-
स्ततं तातवत्सेति भाषकः ॥ ६५ ॥ एवं स रावणो देवि सहस्र वदनो
महान् ॥ पुष्करद्वीपमासाद्य वर्तते जनकात्मजे ॥ ६६ ॥

तब पितामह पुलस्त्य और विश्रवाने आकर तात, वत्स आदि सम्बोधन देकर यत्नसे उसे निवारण किया ॥ ६५ ॥ हे देवी ! इस प्रकारका वह सहस्र वदन रावण पुष्करद्वीपमें निवास करता है ॥ ६६ ॥

तस्यानुजो दशास्योऽयं लंकायां जानकि स्थितः ॥ ६७ ॥
चित्राणीत्यादीनि मे शंसयित्वा विप्रो मासांश्चतुरो यापयित्वा ॥
राजानं मां चाशिषा योजयित्वा जगामैकः प्रोषितस्तीर्थयात्राम् ॥ ६८।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे सीताभाषणं नाम
सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

हे जानकि ! उसका छोटा भाई लंकापुरीमें निवास करता है ॥ ६७ ॥ इस प्रकार और भी विचित्र कथा कह चार महीने निवास कर राजा और मुझको आशीर्वाद देकर वह ब्राह्मण तीर्थयात्राको चला गया ॥ ६८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आदि. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां
सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादश सर्ग

रावणकी सेनाका निकलना

एवं स रावणो विप्राः सहस्रवदनो महान् ॥ प्रोक्तस्तेन द्विजेनाहं
श्रुत्वाश्चर्यं च विस्मिता ॥ १ ॥ अद्यापि तन्मय हृदि जागरूकं हि
वर्तते ॥ पत्या मे बाहुवीर्येण दशास्यो रावणो हतः ॥ २ ॥

हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार उस ब्राह्मणने मुझसे सहस्र मुखवाले रावणकी कथा कही थी, जिसे सुनकर मुझे बडा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ अबतक वह मेरे हृदयमें जागते हुएके समान वर्तता है मेरे स्वामीने भुजबलसे दशशिरवाले रावणको मारा है ॥ २ ॥

(९६) अद्भुतरामायण [अष्टादश-

सानुगः ससुतामात्यः सभ्रातृकः सबान्धवः ॥ मत्कृते च पुरी दग्धा सेतुर्बद्धश्च वारिधौ ॥ ३ ॥ सुग्रीवेण सहायेन तथा हनुमदा-
दिना ॥ इदं लोकोत्तरं कर्म कृतं लोकहितं महत् ॥ ४ ॥
पुत्र अनुचर भाई बन्धुओंके सहित उसे मेरे निमित्त मारकर लंकापुरी जलायी, सागरमें पुल बांधा ॥ ३ ॥ सुग्रीव और हनुमानाजीकी सहायता लेकर यह लोकके निमित्त बडा चमत्कारी कर्म किया है ॥ ४ ॥

तथापि हृदि मे नैतदाश्चर्यं प्रतिभाति हि ॥ यदि तस्य वधं कुर्याद्रावणस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥ तदा संभाव्यते कीर्त्तिर्जगत्स्वास्थ्यम-
वाप्नुयात् । अतो मे हसितं विप्राः क्षमध्वं ज्वलनोपमाः ॥ ६ ॥
. परन्तु तथापि मेरे हृदयमें कुछ आश्चर्य नहीं विदित होता है, जो इस दुरात्मा रावणका वध किया तब आपकी महान् कीर्ति फैलकर जगत् स्वस्थ हो जाय, हे अग्नितुल्य ब्राह्मणो ! इस कारण आप मेरे हास्यको क्षमा करो । ५ । ६

आकर्ण्य मुनयः सर्वे साधु साध्विति वादिनः । जानकीं प्रशंसंसुस्ते सर्वलोकहितैषिणीम् ॥ ७ ॥ राघवो वचनं श्रुत्वा सीताया वीर्यवर्द्धनम् सिंहनादं विनद्योच्चैः सर्वाना ज्ञापयत्प्रभुः ॥ ८ ॥
यह वचन सुनकर सब मुनि धन्य धन्य कहने लगे, और सब जगत्की हित-कारिणी जानकीकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र सीताके वीर्यवर्द्धक वचन सुनकर सिंहनाद कर सबको आज्ञा देने लगे ॥ ८ ॥

मुनयोऽद्यैव गंतव्यं रावणस्य जयाय वै । लक्ष्मणं भरतं चैव शत्रुघ्नं चादिशत्प्रभुः ॥ ९ ॥ मित्र सुग्रीव हे राजन्सर्वे जांबवदादयः ।
गच्छामः सहितास्तत्र सैनिकैः सह मंत्रिभिः ॥ १० ॥
हे मुनियो ! आजही हम रावणको जीतने जाते हैं लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको प्रभुने आज्ञा दी ॥ ९ ॥ हे राजन् सुग्रीव ! मित्र और सम्पूर्ण सैनिकजनोंके सहित हम वहां जायेंगे ॥ १० ॥

इत्याज्ञाप्य महाबाहुः सस्मार पुष्पकं रथम् । स्मरणादागतस्तत्र पुष्कको रथसत्तमः ॥ ११ ॥ तत्रारुक्षन्महावीरारामाचन्द्रपुरो-
गमाः । भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्चामितद्युतिः १२ । -
वह महाबाहु इस प्रकार कहकर पुष्पकको स्मरण करते हुए वह पुष्पक .