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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग हिन्दीटीकासहित (६१)

सर्ग हिन्दीटीकासहित (६१)

अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान्नाम वानरः । सुग्रीवेण प्रेषितोऽहंयुवां कौ ज्ञातुमागतः ॥ १९ ॥
दृष्ट्वा युवां च द्विभुजौ चापबाणधरौ परम् । आगत्य चान्यथा दृष्टं वद मे को भवानिति ॥ २० ॥
में सुग्रीवका मंत्री हनुमान् नाम वानर हूँ, सुग्रीवने भेजा है देखियो कि, यह कौन हैं ? ॥ १९ ॥ आपको धनुषबाण धारण किया देखकर अगर कुछ और ही प्रकारसे देखा, कहिये आप कौन हैं। ॥ २० ॥

इति पवनसुतं तं व्याकुलं व्याहरन्तं किमिति कथमितीदं कंपमानं प्लवंगम्।।
कृतकरपुटमौलिं संविधेयं ब्रुवन्तं मधुरतर मुदारं रामचन्द्रोऽब्रवीत्तम् ॥ २१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीराम-चतुर्भुजरूपदर्शनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥

इस प्रकार व्याकुलतासे कहते महावीरके वचन सुन यह क्या है इस प्रकार कहकर कंपित होते हुए और हाथ जोडकर शिर झुकाये वचन कहते महावीर-वीरजीसे उदारतापूर्वक रामचन्द्र बोले ॥ २१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. अ. भाषाटीकायां चतुर्भुजरूपदर्शनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥


एकादश सर्ग

रामका सांख्ययोग वर्णन करना

रामःप्राह हनूमन्तमात्मानं पुरुषोत्तमः ॥
वत्स वत्स हनूमंस्त्वं भक्तोयत्पृष्टवानसि ॥ १ ॥
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मम ॥
अवाच्यमेतद्विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् ॥ २ ॥

पुरुषोत्तम राम हनुमान्‌से अपना वर्णन करने लगे, हे वत्स हनुमान् ! हमारे भक्त तुम जो हमसे पूछते हो ॥ १ ॥ सो मैं कहता हूँ तुम सावधान होकर सुनो यह आत्मगुह्य सनातन ज्ञान किसीसे कहना नहीं चाहिये ॥ २ ॥

यन्न देवा विजानंति यतन्तोऽपि द्विजातयः ॥
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूताद्विजोत्तमाः ॥ ३ ॥
न संसारं प्रपश्यंति पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः ॥
गुह्याद्गुह्यतमं साक्षाद्गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ४ ॥

५ (६२) अद्भुतरामायण [ एकादश-

जिसको यत्न करनेपर देवता और द्विजातिभी नहीं जानते हैं, इस ज्ञानको प्राप्त द्विजोत्तम ब्रह्ममय हो जाते हैं ॥ ३ ॥ इसके द्वारा पूर्वब्रह्मवादी भी संसारको नहीं देखते हैं यह गुप्तसे गुप्त छिपा रखनेके योग्य है ॥ ४ ॥

वंशे भक्तिमतो ह्यस्य भवंति ब्रह्मवादिनः ॥ आत्मा यः केवलः स्वच्छः शांतः सूक्ष्मः सनातनः ॥ ५ ॥ अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः ॥ सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ॥ ६ ॥

जो जानता है उसके वंशमें महात्मा और ब्रह्मवादी होते हैं, आत्मा केवल स्वच्छ शान्त सूक्ष्म सनातन है ॥ ५ ॥ वह सर्वान्तर साक्षात् चिन्मात्र अन्धकार से परे है, वही अन्तर्यामी पुरुष प्राण और महेश्वर है ॥ ६ ॥

स कालाग्निस्तदव्यक्तं सद्यो वेदयति श्रुतिः ॥ कस्माद्विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते ॥ ७ ॥ मायावी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ॥ न चाप्ययं संसरति नच संसारयेत्प्रभुः ॥ ८ ॥

वही कालाग्नि अव्यक्त है यह वेदश्रुति कहती है, इससे संसार उत्पन्न होकर इसीमें लय हो जाता है ॥ ७ ॥ वही मायावी मायासे बद्ध होकर अनेक शरीर धारण करता है, न कोई इसे चला सकता है न यह चलता है ॥ ८ ॥

नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः ॥ न प्राणो न मनो व्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च ॥ ९ ॥ न रूपरसगन्धश्च नाहङ्कर्ता न वागपि ॥ न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं प्लवंगम ॥ १० ॥

न यह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश प्राण मन अव्यक्त शब्द स्पर्श है ॥ ९ ॥ न रूप रस गन्ध और न अहंकार न वाणी है, हे महावीर ! कर चरण उपस्थ पायुरूप भी नहीं है ॥ १० ॥

न कर्ता न च भोक्ता च न प्रकृतिपूरुषौ ॥ न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः ॥ ११ ॥ तथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धोनोपपद्यते ॥ तद्वदेव न सम्बंधः प्रपञ्चपरमात्मनोः ॥ १२ ॥

कर्त्ता भोक्ता प्रकृति पुरुष माया प्राण भी नहीं है, केवल चैतन्य स्वरूप है ॥ ११ ॥ जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका सम्बन्ध नहीं है इसी प्रकार प्रपंचसे परमात्माका कुछ सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥

छायातरू यथा लोके परस्परविलक्षणौ ॥ तद्वत्प्रपंचपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः ॥ १३ ॥ यद्यात्मा मालिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात्स्वभावतः । नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मांतरशतैरपि ॥ १४ ॥