अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६३)
जैसे लोकमें छाया और वृक्ष परस्पर विलक्षण हैं इसी प्रकार प्रपंच और पुरुष परमार्थसे भिन्न हैं ॥ १३ ॥ जो आत्माकी मलिन अवस्था है जो स्वभावसे विकारी हो तो सौ जन्ममें भी मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १४ ॥
पश्यंति मुनयो मुक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः । विकारहीनं निर्दुःखमानंदात्मानमव्ययम् ॥ १५ ॥ अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः । साप्यहंकृतिसम्बन्धादात्मन्यारोप्यते जनैः । १६ ।
मुनिजन परमार्थसे अपने आत्माको मुक्त देखते हैं, विकारहीन दुःखरहित आनंद अविनाशी देखते हैं ॥ १५ ॥ मैं कर्ता सुखी दुखी हूं, स्थूल कृश हूँ, यह बुद्धि अहंकारके सम्बंधसे प्राणी आत्मामें आरोपण करते हैं ॥ १६ ॥
वदंति वेद विद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्। भोक्तारमक्षयं बुद्ध्वा सर्वत्र समवस्थितम् ॥ १७ ॥ तस्मादज्ञान मूलोयं संसारः सर्व देहिनाम् । अज्ञानादन्यथा ज्ञातं तच्च प्रकृतिसङ्गतम् ॥ १८ ॥
वेदके जाननेवाले उसको प्रकृतिसे परे कहते हैं, वही भोक्ता अक्षय सर्वत्र स्थित है ॥ १७ ॥ इस कारण सब देहधारियोंको यह संसार अज्ञानसे प्रतीत होता है, ज्ञानसे अन्यथा दीखता है और वहभी प्रकृतिसे संगसे ऐसा है ॥ १८ ॥
नित्योदितः स्वयंज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः । अहं काराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते ॥ १९ ॥ पश्यंति ऋषयो व्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः ॥ २० ॥
वह सर्वांतर्यामी पुरुष नित्य उदित स्वयं ज्योति सर्वगामी पुरुष पर है, उसके विना जाने यह पुरुष अहंकारके विवेक करनेसे अपने आपको कर्ता मानता है ॥ १९ ॥ ऋषिजन उस सदात्मक सर्वगामी चैतन्यको यथार्थ देखते हैं, ब्रह्मवादी उस प्रधान प्रकृति कारण ब्रह्मको जानकर मुक्त होते हैं २०
तेनात्र सङ्गतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरंजनः । आत्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्यंति तत्त्वतः ॥ २१ ॥ अनात्मन्यात्मविज्ञानांतस्माद्दुखं तथेतरत् । रागद्वेषादयो दोषाः सर्वभ्रांतिनिबंधनाः ॥ २२ ॥
उससे संगतिको प्राप्त हुआ कूटस्थ निरंजन पुरुष तत्त्वसे अक्षर ब्रह्मरूप अपने आत्माको नहीं जानता है ॥ २१ ॥ अनात्मामें आत्माको जानकर दुःखी होता है, राग द्वेषादि यह सब भ्रांतिके निबंधन हैं ॥ २२ ॥
(६४) अद्भुतरामायण एकादश-
कार्य्ये ह्यस्य भवेदेषा पुण्यापुण्यमिति श्रुतिः । तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः ॥ २३ ॥ नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः । एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः ॥ २४ ॥
इसी कार्यमें यह पुण्य अपुण्य देखा जाता है ऐसी श्रुति है, इसीके वशसे सब देहधारियोंके देहकी उत्पत्ति है ॥ २३ ॥ आत्मा नित्य और सर्वत्रगामी है, कूटस्थ दोषसे वर्जित एकही वह अपने मायास्वभावसे अनेक प्रकारका दीखता है ॥ २४ ॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः । भेदोऽव्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया ॥ २५ ॥ यथा हि धूमसंपर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत् । अंतःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्नलिप्यते ॥ २६ ॥
इस कारणसे मुनिजन परमार्थसे अद्वैतही कहते हैं, स्वभावसे जो अव्यक्तका भेद है वह माया है ॥ २५ ॥ जैसे धूमके सम्पर्कसे आकाशमें श्यामता दीखती है, आकाशमें दोष नहीं आता इसी प्रकार अन्तःकरणके भावोंमें आत्मा मलिन नहीं होता है ॥ २६ ॥
यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोपलः । उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २७ ॥ ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः । अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुबुद्धयः ॥ २८ ॥
जैसे स्फटिक मणी केवल अपनी कांतिसेही शोभाको प्राप्त होती है उपाधिहीन होनेसे निर्मल है उसी प्रकार आत्मा प्रकाशित होता है ॥ २७ ॥ बुद्धिमान् इस जगत्को ज्ञानरूप कहते हैं, कुबुद्धि अज्ञानी इसको अर्थस्वरूप देखते हैं ॥ २८ ॥
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः । दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २९ ॥ यथा संलक्ष्यते व्यक्तः केवलः स्फटिको जनैः । रक्तिकाव्यवधानेन तद्वत्परम पूरुषः ॥ ३० ॥
वह कूटस्थ निर्गुण व्यापी आत्मा स्वभावसे चैतन्य है, भ्रांति दृष्टिवाले पुरुषोंको यह अर्थरूप दीखता है ॥ २९ ॥ जैसे मनुष्योंको केवल स्फटिक प्रत्यक्ष दीखता है और व्यवधानसहित होनेसे लालिमा आदि दीखती है इसी प्रकार परम पुरुष है पृथक् शुद्ध है देहमें व्याप्त होनेसे उपाधिमान् दीखता है ॥ ३० ॥